जून 2026

अध्ययन -कक्षडॉ.पुरुषोत्तम दुबे से डॉ.लता अग्रवाल की बातचीत     Posted: February 1, 2021

लता अग्रवाल: लघुकथा विधा से आप कब से जुड़े है? संक्षेप में जानना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे: सन् 1969-71 के दरम्यान में हिन्दी प्राध्ययन केन्द्र विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहा था। वहाँ के पुस्तकालय में देश-विदेश की कोई 41 मासिक पत्र-पत्रिकाएँ आया करतीं थीं। उनमें से एक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ग्रुप की ‘सारिका’ नामक पत्रिका हुआ करतीं थीं। माना जाता रहा है कि उन दिनों में ‘सारिका’ पत्रिका साहित्य की बहुत ऊँची पसन्द रखने वालों की पहली पंसद थी। ‘अपने अध्ययन की इस अवधि में मैं भी इस पत्रिका को पढ़ने वाले जिज्ञासु पाठकों में से एक था। तब के दिनेां में इसी ‘सारिका’ पत्रिका में महान कथाकार कमलेश्वर के संपादकत्व में’ लघुकथा’ का प्रकाशन भी अनवरत रूप में होने लगा था। तभी से लघुकथा के प्रति नजदीकियां और लघुकथा के विषयक मेरी समझ की ‘अ, ब, स, द’ बढ़ने लगी थी।

लता अग्रवाल: कुछ आपकी रचनाओं के विषय में जानना चाहेंगे?

पुरुषोत्तम दुबे:  उन दिनों विक्रम विश्वविद्यालय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का एक बड़ा आधारभूत प्लेटफार्म हुआ करता था। तब कविकुलगुरु डॉ. शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ यहाँ के कुलपति हुआ करते थे। तब हम विद्यार्थियों में रचनात्मकता का एक बड़ा माहौल था। प्रभाववश मैं भी कुछ नया रचने अथवा पुनःसृजित करने की प्रक्रिया से सम्बद्ध बना रहता था।

मैंने उस समय के दौर में कविताएँ, ग़ज़लें, तथा कुछ समीक्षात्मक आलेख लिखे, जो आज मेरे व्यक्तित्व एवं मेरे कृतित्व की पहचान बनाने में सहायक निरूपित हुए हैं।

लता अग्रवाल: जाहिर है। लघुकथा के उस दौर में और आज के दौर में काफी बदलाव महसूस करते होंगे; इसे किस रूप में लेते हैं?

पुरुषोत्तम दुबे: बीसवीं शती के आठवें दशक का दौर लघुकथा के प्रति उत्कट प्रतिवद्धता का दौर था। तब के लघुकथाकार केवल लघुकथाएँ लिखते ही नहीं थे प्रत्युत लघुकथा के प्रकाशन विषयक आधार खड़ा करने में और लघुकथा के विकास के प्रति चिन्तित दिखाई पड़ते थे। इससे आगे बढ़कर कहूँ तो भारतेन्दु और माधवराव सप्रे ने बुनियादी लघुकथाओं का जो रचनात्मक ढाँचा खड़ा किया था उस पर वस्त्रालंकार पहनाने का काम उस दौर के लघुकथाकारों ने बखूबी किया है।

उस दौर और आज के दौर में लघुकथा लेखन विषयक आये बदलाव को मैं तुलनात्मकता का आश्रय लिए बिना सीधे तौर पर यह कहना चाहूँगा कि आज के दौर की लघुकथा में इन्फ्लेशन (विस्तार) तो काफी आया है परन्तु आज की दौर की लघुकथाएँ सामाजिक समस्याओं का निष्पादन करने में कहीं पिछड़ी हुई मिल रही है।

लता अग्रवाल: समय जितना वाचाल हुआ है उतना ही अभिव्यक्ति की क्षमता और विषय में वृद्धि हुई है। इस दृष्टि से लघुकथा विधा की क्या उपयोगिता देखते हैं?

पुरुषोत्तम दुबे:इतमीनान के साथ जीवन जीने का समय लद गया है। यह समय घड़ी की सुई के साथ कदम चलाने का है। हम समय में से होकर नहीं निकलेंगे तो समय हममें से होकर गुज़्ार जायेगा। समय की चाल ने हमारी अभिव्यक्ति- कौशल को बढ़ाया है। हममें दक्षता जगाई है। एक समय था जब घटनाएँ हमारे अन्तःकरण को प्रभावित तो करती थीं लेकिन उन घटनाओं का सम्प्रेषण हमसे हो नहीं पाता था। समय ने हमारी मूक अवस्था को वाणी के संस्कार दिए हैं।

वर्तमान में सब तरफ समय का शोर है। समय हिंसा में, अपराध में, जिजीविषा के सवालों में, असहिष्णुता की दरारों में, पंक्तिबद्ध बेरोजगारों में, मुनाफाखोरों में, अकड़ की अफसर शाही में, मूल्यों के अवमूल्यन में, सब जगह पसर चुका है। समय के इन्हीं नानाविध अवतारों से लघुकथा के सृजन की सम्भावनाओं के पट खुले हैं। एक कहानी में अनेक घटनाएँ समाहित नहीं हो सकतीं बरअक्स इसके एक-एक कर अनेक घटनाएँ अनेक लघुकथाओं को जन्म देती है। अतएव सुई की नोंक के बराबर जमीन पर भी यदि कोई घटना घटित होती है तो लघुकथाकार अपने अन्तर चक्षु से उस घटना को पकड़कर सम्वेदनाभाव से विवेचित कर सकता है।

लता अग्रवाल: आप लघुकथा में एक सर्वमान्य भाषा चाहते हैं, इसकी कोई खास वजह?

पुरुषोत्तम दुबे: यह अच्छा सवाल है। विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत में राष्ट्रभाषा विषयक सर्वमान्य स्वीकृति आज भी प्रश्न बनीं हुई हैं। वर्तमान समय में भारत देश के हिन्दी और हिन्दीतर प्रान्तों से बराबर रूप में लघुकथाएँ लिखीं जा रहीं हैं, देश के विभिन्न प्रान्तों के लघुकथाकार अपने-अपने लघुकथा- संग्रहों का हिन्दी में अनुवाद करा रहे हैं। यह बात अच्छी है। लेकिन इसके स्थान पर विभिन्न भाषा-भाषी प्रान्तों के लघुकथाकार स्वयं आगे होकर हिन्दी भाषा को आधार बनाकर हिन्दी में लघुकथाएँ लिखकर प्रकाशित करवाएँगे, तो पहली बात तो यह कि वे ऐसे लघुकथाकार दोहरे खर्च से बच जाएँगे। दूसरे हिन्दी भाषा को अपनी ओर से अनेक पारिभाषिक शब्दों का अवदान देकर हिन्दी का उन्नयन कर उसे राष्ट्रभाषा का अर्थ प्रदान करने में अपनी गैर राजनीतिक भूमिका अदा कर पायेंगे।

लता अग्रवाल: अगर कोई सर्वमान्य भाषा बनती है तो वह लघुकथा को एक कटघरे में बाँध देने जैसा नहीं होगा…. इससे विविधता का रस पाठक नहीं ले पायेंगे?

पुरुषोत्तम दुबे: कदाचित नहीं। भावों की उपस्थिति से ही भाषा का शृंगार सजता है। भाषा का रूप-लावण्य बढ़ाने में अनेक अनुकरणात्मक शब्द, देशज शब्द, सह प्रयोग (जैसे डाकघर) विदेशी शब्द (जैसे अलमारी, अस्पताल, अदालत, अखबार, ऐनक, औलाद, खत, गमला, चाकू, चाबी इत्यादि) ऐसे अनेक शब्द हैं जिसका प्रयोग हर प्रान्त का लघुकथाकार अपनी प्रान्तीय भाषा में लघुकथा लिखने में करता है/करता आया है। मेरा मानना है कि अलहदा भाषा का लघुकथाकार हिन्दी भाषा में लघुकथा लिखकर सम्प्रेषित करेगा तो इस तारतम्य से ऐसे लघुकथाकार का कद और बढ़ेगा। साथ ही हिन्दी भाषा के प्रति उसका प्रदाय उसे राष्ट्रीय लघुकथाकार होने के तमगे से नवाज़ेगा।

इसी सवाल के दूसरे छोर के सम्बंध में बात कहना चाहूँगा कि सम्वेदना सदैव ही कहने वाले के लहज़े में होती है। कहानी, कविता अथवा लघुकथा में नहीं? सम्वेदना खुद एक जुबान होती है, जिसका भाषागत् व्यवहार से कोई रिश्ता नहीं होता।

लता अग्रवाल: एक लेख में आपका एक और कथन ‘‘भाषा तो रचना व्यवहार की सरितातट पर पड़े षट्कोणी पत्थर की भाँति होती है।’’ इस कथन का स्पष्टीकरण चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे: हाँ, कहीं एक आलेख में मैंने ऐसा लिखा है। असल में जीवन और समाज के संचालन में भाषा की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भाषा जितनी व्यवहार में आएगी उसका रूप उतना प्रांजल, उतना उत्कृष्ट होगा। निरन्तर रचनारत रहते हुए ही भाषा की सृजनात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। गर्मियों में तन्वंगी बनीं नदी के तट का षट्कोणी पत्थर वर्षाकाल में नदी के फैलाव के साथ जब खुद भी तरंगायीत हो जाता है, तो तीव्र लहरों के थपेड़े खा-खाकर वह पूजने योग्य ‘शालिग्राम’ बन जाता है। भाषा जितनी लोक व्यवहार से पारित होगी, उतनी अर्थसम्पन्न और रूप सम्पन्न बनेंगी।

लता अग्रवाल: अक्सर लघुकथा में ‘मारक’ शब्द का प्रयोग सुना है, मगर आपने ‘तारक’ शब्द का प्रयोग भी किया है। ये ‘मारक’ और ‘तारक’ शब्द को आपसे समझना चाहेंगे?

पुरुषोत्तम दुबे:   साहित्य किसी भी विधा में रचा गया हो, उसमें कथ्य की लयबद्धता होती है। कथन की यही लयकारी साहित्य में संगीत है, जिसे जो किनारे बैठकर सुनता है, वह उसमें डूब जाता है और जो डूब कर सुनता है, वह ‘पार’ उतर जाता है। लोक मंगल की धारणा जीवन को ‘पार’ उतारने वाले साहित्य में ही निहित है। इसीलिए मैं कहता रहा हूँ कि लघुकथा में भी ‘तारक’ शक्ति होती है। इससे उलट यह बात तो सर्वमान्य है कि लघुकथा के अन्त में जो पंचलाईन होती है, उसे ‘मारक’ शक्ति कहा जाता है।

लता अग्रवाल:   लघुकथा की प्रतीकात्मकता पर बात करते हुए आपने काफ्का की पंक्ति को उद्घृत किया है ‘शोर रचना की प्रभावोत्पादकता की राह में सबसे बड़ी बाधा है।’ पाठक इस शोर को विस्तार से समझना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:   काफ्का बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ जर्मन लेखक थे। सांस्कृतिक रूप से अत्यन्त प्रभावशाली रचनाकारेां में उनका नाम शुमार है। काफ्का के युग में आधुनिकता के विचारों का पनपना आरम्भ हुआ था। नई आत्मचेतना, नएपन की चेतना के प्रादुर्भाव का यह समय था। काफ्का का एक महत्त्वपूर्ण कथन यह भी था कि, ‘‘पुस्तक को हमारे भीतर जमें हुए समुद्र के लिए कुल्हाड़ी का कार्य करना चाहिए।’’

साहित्य से जीवन का जुड़ना ही आधुनिकता है। आधुनिकता एक वैचारिक क्रांन्ति है। लघुकथा में जितनी अधिक वैचारिक प्रधानता होगी, वह जीवन और समाज के उतनी समीप होगी। वाक्य-विन्यास के अनावश्यक झमेले, कथन के दुहराव, शिल्पाधिक्य, वस्तु के नियोजन में काल्पनिक उडानें ही ऐसे कारक हैं जो लघुकथा के प्रणयन में शोर का अप्रीतिकर रूप खड़ा करते हैं। मैं इस बात को इस अन्दाज़् में ऐसे कहना चाहूँगा कि किसी लघुकथा की सापेक्ष गति के विपरीत लघुकथाकार लघुकथा में अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करता है, तो वह लघुकथा के सत्त्व (अस्तित्व) को निगल जाने वाला शोर ही होगा।

लता अग्रवाल: लघुकथा में व्यंग्य की प्रधानता में व्यंग्य की कितनी हिस्सेदारी हो ताकि कथातत्व बचा रहे।

पुरुषोत्तम दुबे:   मैं व्यक्तिगत रूप में व्यंग्य को भाषा का खिलन्दड़ मिजाज़् मानता हूँ। लेकिन यह आपके सवाल का जवाब नहीं है! दरअसल, लघुकथा लेखन एक साधना है। माना जाता है कि, ‘‘एक ही कालखण्ड यानी एक ही क्षण में यथार्थ के धरातल पर घटित घटना के जरिए कथ्य को कहने की विधा लघुकथा है।’’ अतएव लघुकथा में कंटेंट को चरितार्थ करने में सपाट भाषा को महत्व देना पढ़ेगा, व्यंग्यपूर्ण भाषा को नहीं। लेकिन हाँ, लघुकथा में जरूरत के हिसाब से संवादों की आमद को दिखाया जाता है, तो आशिक रूप में सम्वादों की कमर कसने बाबत व्यंग्य-प्रयोग किया जा सकता है। लघुकथा-लोक में व्यंग्य की प्रधानता को वटवृक्ष की तरह मानकर बढेंगे तो लघुकथा का पौधा पनप नहीं पाएगा।

लता अग्रवाल: लघुकथा में निहित परिवेश व्यक्ति जन्य होना चाहिए या स्थिति जन्य? तथा इसका अनुपात कितना हो।

पुरुषोत्तम दुबे:यह इस बात पर निर्भर करता है कि लघुकथा में वेष्टन अथवा परिधि का अवतार किस देश-काल के परिणाम स्वरूप है। व्यक्तिजन्य परिवेश सदैव ही गतिशील होता है जबकि स्थिति जन्म परिवेश में ठहराव होता है। गतिशीलता समाज की सुविचारित धारणा रही है। अतः व्यक्ति निर्मित परिवेश सदासर्वदा चेतन बना रहता है। ऐसे परिवेश से संश्लिष्ट होकर ही लघुकथा में कथ्य का प्राणतत्व  विकसित होता है। परन्तु फिर भी स्थिति जन्य परिवेश के चित्रण से लघुकथा में हमारे सांस्कृतिक एवं पारम्परिक मूल्यों का स्थापन दृढ़ता के साथ किया जा सकता है। परम्परा के साथ आधुनिकता को जोड़कर ही हम लघुकथा में व्यक्तिजन्य परिवेश और स्थिति जन्य परिवेश का आनुपातिक साम्य बैठा सकते हैं। तथा ऐसा किया जाना लघुकथा को आकार में लाने वाली अन्तर्वस्तु पर निर्भर है।

लता अग्रवाल:   एक जगह पर आपने ‘लघुकथा में व्यक्ति सापेक्ष और निरपेक्ष उपस्थित की बात की है।’ … इसे समझना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:   दरअसल इस ढंग का विभेद बड़ा महीन है। देखना होगा कि लघुकथा की अन्तर्वस्तु का गठन सिद्ध करने में जिस व्यक्ति का आश्रय लिया गया है वह दूसरे पर अवलम्बित है अथवा परस्पर विरोधी पक्षेां से अलग रहने वाला है। लघुकथा में परावलम्बित व्यक्ति की उपस्थिति सापेक्ष मानी जाएगी और किसी की चिन्ता या परवाह न करने वाले व्यक्ति की उपस्थिति निरपेक्ष।

लता अग्रवाल:   आपने कहा, ‘‘आज लघुकथा लेखन के आचरण में सेंध लगाई जा रहीं हैं? यह सेंध और इस सेंध से लघुकथा पर क्या प्रभाव देखते हैं।

पुरुषोत्तम दुबे:   किसी लघुकथाकार की अच्छी लघुकथा से प्रभावित होकर, अच्छी लघुकथा लिखने का निर्णय खुद से लेना, अच्छी बात है! हो यह रहा है कि किसी एक की अच्छी लघुकथा की झप्पी लेकर उसकी अन्तर्वस्तु पर डाका डालते हुए समान ध्वनित लघुकथा की रचनाकर अपने नाम से परोसना, सेंध नहीं है तो और क्या है। सेंधमारी के बूते से बहुतायत में आ रही लघुकथाएँ हीं लघुकथा विधा के लिए खतरा बन रहीं हैं।

लता अग्रवाल:   लघुकथा की अपनी चाल है; इसे खाली चाल मत बनाइए? वाक्य को समझना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:   चयनित अन्तर्वस्तु (कंटेंट) को उचित आकार, शिल्पानुशासन, शैलीगत व्यवहार, प्रभावोत्पादकता, शब्द नियोजन तथा सम्प्रेषण कला इत्यादि को कथा-सूत्र में पिरोना ही लघुकथा की चाल है। इस अनुशासन से असम्बद्ध होकर रची जाने वाली लघुकथा निरर्थक और बेचाल की चाल मानी जाएगी।

लता अग्रवाल: पाठकों को पाठक ही रहने दीजिए, उन्हें आलोचना की देहरी मत चढ़ाइए, इससे लघुकथा लेखन को नुकसान होगा। किस तरह का नुकसान समझना चाहेंगे?

पुरुषोत्तम दुबे:   जवाब यह है कि ‘सब पृथ्वी के देव बन जाऐंगे तो उनको बैठने के इतने आसन कहाँ से जुटा पाएँगे! दशकों पूर्व हिन्दी उपन्यासों का बड़ा पाठक वर्ग था, जिसके चलते हुए धर्मवीर भारती अपने उपन्यास’ ‘गुनाहों का देवता’ को लेकर रातों रात बड़े उपन्यासकार सिद्ध हो गए। जितने अधिक पाठक लघुकथा की झोली में होंगे, लघुकथाएँ उतनी चर्चित होंगी। यदि लघुकथा के पाठक ही आलोचकों की भूमिका निभाने लगेंगे; तो फिर वे लघुकथाएँ कहाँ जायेंगी, जो पाठकों को ध्यान में रखकर पटल पर आ रही है।

लता अग्रवाल:लघुकथा में अनावृत कथन की अपेक्षा की जाती है, अनावृत से आपका आशय समझना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:अनावृत यानी जो ढका न हो अर्थात् खुला। लघुकथा में वाक्य सरल और स्पष्ट होना चाहिए। संकेतों की भरमार, द्विअर्थीं शब्दों का व्यवहार, मिश्र वाक्यों के उपयोग में व्याकरण की अवहेलना आदि कारक है जो लघुकथा में समाहित कथ्य पर परदा डालते हैं। लघुकथाकार पाण्डित्य का प्रदर्शन किए बिना कथा की वस्तु को सहज रूप में निःसृत होने देता है वही लघुकथा पाठकीय तादाम्य की अवस्था तक पहुँच पाएगी।

लता अग्रवाल:सांकेतिकता का अधिकतम व्यापार भी लघुकथा के कैनवास को ढक देता है।’’ आपकी बात से सहमति रखती हूँ। पाठकों को क्या कहना चाहेंगे, कितनी सांकेतिकता उचित है?

पुरुषोत्तम दुबे:लघुकथा का आकारगत सवाल ज्यों का त्यों अटका हुआ है। फिर भी इधर आदर्श आकार की लघुकथाएँ लिख रहे हैं। इसके अलावा लघुकथा में सांकेतिकता का होना एक स्थायी गुण माना जा रहा है। छोटे-छोटे वाक्येां से लघुकथा की अन्तर्वस्तु का निस्तारण (निकालने की क्रिया) किए जाने में उपयोगी संकेतों का माँग-पूर्ति के हिसाब से लघुकथा लेखन का उद्देश्य सिद्ध किया जा सकता है।

लता अग्रवाल: आजकल लघुकथा में जो अधूरापन छोड़ दिया जाता है उसे आप लघुकथा के हित में देखते हैं या अहित में।

पुरुषोत्तम दुबे:बहुत अच्छा सवाल किया है आपने लता जी। लघुकथा में अधूरेपन को छोड़ देना, यह लघुकथाकार की निजी व्याकुलता का परिणाम है। इसे लघुकथाकार की ‘आतुर होने की अवस्था’ भी कह सकते हैं। असल में जब कोई लघुकथाकार कथा के कण्टेण्ट को व्यक्त करने में अत्यधिक वैचारिक मंथन करता है; इस अवधि में एक स्थान पर उसके सम्मुख दुविधा खड़ी हो जाती है, यह कि वह इस वस्तु को लेकर लघुकथा लिखे अथवा नहीं लिखे? तब उसके विचार में उसके हाथ आया ‘कथ्य’ अकथित रह जाता है। लेकिन उसके भीतर की कश्मकश इतनी तीव्र होती है कि वह तब तक दम नहीं लेती जब तक उसका कथ्य, चाहे फिर अधूरे रूप में सही लघुकथा में जन्म न ले ले।

बावजूद इसके लघुकथा में अधूरापन का रह जाना कोई फैशन नहीं प्रत्युत पलायन की बात है। लघुकथा में अधूरापन पाठकों को भी खलता है क्योंकि पाठकगण साहित्य के समीप अपनी समस्याओं का निदान पाने में आते हैं।

लता अग्रवाल:आपका लिखा, ‘हिन्दी लघुकथा का दिल्ली दरवाजा’ नामक आलेख पढ़ने में आया है। ‘‘इस आलेख में आयी कोई एक महत्वपूर्ण बात पर प्रकाश डालिए।

पुरुषोत्तम दुबे:वैसे तो यह आलेख सम्पूर्ण रूप में दिल्ली के लघुकथाकारों की लघुकथा विषयक चेतना के सन्दर्भ में लिखा गया है। जो इसी शीर्षक से डॉ. बलराम अग्रवाल की ब्लॉग-पत्रिका ‘जनगाथा’ में 2 सितम्बर 2015 में प्रकाशित हो चुका है। इस आलेख में लघुकथा को लेकर कई मुद्दे मैंने उठाए है। एक प्रमुख बात इसमें लघुकथाकारों की बीच उभरने वाली खेमेबाजियाँ पर भी प्रसंगवशात् आई है। इसमें मैंने लघुकथाकार की सृजनात्मक ईमानदारी के पक्ष में एक बात लिखी है कि खेमेबाजियाँ और झण्डावरदारी के आरोप-प्रत्यारोप किस युग में नहीं लगे। लेकिन परिपक्व लेखन पर कभी कोई उँगली उठ सकी?

लता अग्रवाल: लघुकथा आलोचना में ढोंग ढठुरे पर विस्तार से जानना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:8 मार्च 2018 को जनगाथा – ब्लॉग पत्रिका मैं प्रकाशित मेरा आलेख, ‘‘हिन्दी लघुकथा और आलोचना के ढोंग-ढठुरे’’ में इस सम्बन्ध में एक पारदर्शी मन्तव्य मैंने दिया है। इसका यहाँ कह देना ही स्वयं मे  सवाल का जवाब होगा, ‘‘जब कभी मैं किसी लघुकथाकार की लघुकथाओं पर लिखी गई आलोचना पढ़ता हूँ, और इत्तफाकन उस लघुकथाकार की लघुकथाएँ भी पढ़ता हूँ, तब मुझे तद्विषयक की हुई आलोचना के स्वरूप पर तरस आता है। भई, यह आलोचना हुई कि लघुकथाकार से तथाकथित आलोचक द्वारा दोस्ती का निर्वहन-शर्म-संकोच-डर!’

लता अग्रवाल:हिन्दी और हिन्दीतर क्षेत्र की लघुकथा में क्या अन्तर पाते है।

पुरुषोत्तम दुबे:कदाचित अधिक अंतर नहीं है। विश्वमानवता के नारे का प्रबल होना, तथा बाजारवाद और उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप सार्वभौमिकता का रूप मुखर हुआ है। फलस्वरूप आज हिन्दी और हिन्दीतर क्षेत्र से आने वाली लघुकथाओं की अन्तर्वस्तु (कण्टेण्ट) प्रायः एक जैसे प्रतीत होते हैं। केवल भाषा और परिवेश की बहाली जुदा-जुदा है।

लता अग्रवाल:अन्तिम सवाल लघुकथा की बेहतरी के लिए सभी लघुकथाकारों को अपने अनुभव से कुछ कहना चाहेंगे।

पुरुषोत्तम दुबे:यह समय ऐसा है कि आज हर कोई अपनी बात कहने में आगे है लेकिन सुनने में कानों में अँगुली डाले हुए है। तभी तो आज हम देख रहे है कि लघुकथा का आकार-प्रकार, उसकी शब्द सीमाएँ, उसमें सांकेतिकता की उपस्थिति की स्थिति के साथ लघुकथा की दशा, दिशाएँ और सम्भावनाओं पर चर्चा करने कोई भी एक जाजम पर बैठा हुआ नहीं मिलता है। लघुकथा की यात्रा को एक सौ बीस-तीस वर्ष बीत चुके हैं, इस विशाल काल-क्रम में हमने लघुकथा के तारतम्य में क्या खोया है और क्या पाया है, उस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

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