जून 2026

अध्ययन -कक्षडॉ.शकुन्तला किरण जी से बातचीत     Posted: August 1, 2021

डॉ. लता अग्रवाल की डॉ.शकुन्तला किरण जी से बातचीत

  कम शब्दों में बहुत-कुछ कहने की कला है लघुकथा—डॉ. शकुन्तला किरण

  [ साथियो ! लघुकथा के क्षेत्र में आदरणीय डॉ॰ शकुन्तला ‘किरण’ जी के  नाम को  किसी परिचय की आवश्यकता नहीं।आप देश के किसी भी विश्वविद्यालय में लघुकथा के लिए पंजीकृत पहली शोधार्थी व पीएच॰ डी॰ शोधोपाधि प्राप्त व्यक्तित्व हैं(जयपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान; सन् 1976 में पंजीकृत व सन् 1982 में पीएच॰ डी॰उपाधि प्राप्त)।इस नाते इस क्षेत्र में आज जो भी इतिहास उपलब्ध है उसमें आपकी बड़ी भूमिका है । आपके द्वारा लिखित आलोचना पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ लघुकथा के महासागर का ऐसा लाइट हाउस है, जिससे हर सदी में उस राह के राहगीर और पोत, दिशा और प्रेरणा पाते रहेंगे ।

सुखद संयोग रहा कि अक्टूबर 2017 में अजमेर यात्रा के दौरान मुझे उनका निकट सान्निध्य मिला । दीदी ने नवें दशक से ही साहित्य पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से स्वयं को दूर रखा था; किन्तु उस दिन मेरे निवेदन पर (जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी, न ही इस तैयारी के साथ उनसे मिलने ग थी) उनकी अनुमति से, जो प्रश्न उस समय मस्तिष्क में आये मैंने उनसे किये और उन्होंने सहर्ष उन सबके जवाब भी दिए। आप सब भी उस ज्ञान से लाभान्वित हो सकें इसलिए आपसे साझा कर रही हूँ।]

 डॉ लता अग्रवाल-दीदी, आप भारत की पहली लघुकथा शोधार्थी रही हैं, इसके लिए बधाई स्वीकार करें।कृपया हमारे लघुकथाकार परिवार को बताएँ कि शोध के लिए ‘लघुकथा’ को विषय के रूप में चुनने का ख्याल आपको कैसे आया ?

डॉ शकुंतला किरण जी – धन्यवाद लता । दरअसल मुझे इसकी प्रेरणा आ० कृष्ण कमलेश जी से मिली । मैंने स्वयं इस सम्बन्ध में कभी नहीं सोचा था; किन्तु जब कमलेश जी ने सुझाव दिया, ‘क्यों न लघुकथा पर शोध करो’ तब लगा, चलो पढ़कर देखते हैं । पढ़ा, तो बहुत रोचक विषय लगा और इस तरह यह मेरे शोध का विषय बना ।

 लता अग्रवाल – लघुकथा की वर्तमान समय में क्या उपादेयता है ?

डॉ शकुंतला किरण – आप देख रही हैं आज हिंदी लघुकथा गद्य के सभी कथात्मक स्वरूपों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में न केवल सक्षम सिध्द हुई है अपितु अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों जैसे, प्रकाशन प्रसारण, मंच, संचार क्रांति आदि पर लिखी और पढ़ी जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय विधा साबित हुई है । यही इसकी उपादेयता सिद्ध करती है ।

आपने अपने समय में देखा होगा—प्रसाद जी की कथा चाहे वह ‘आकाशदीप’ हो या 65-70 के दौर के किसी अन्य कहानीकार की कोई रचना, जब उसमें नायक-नायिका का वर्णन होता है तो प्रकृति-वर्णन के साथ वातावरण को फैलाव दिया जाता था। उस समय अच्छा भी लगता था । आज के पाठक का टेस्ट अलग है ।

पहले लोग ‘चन्द्रकान्ता संतति’ बड़े शौक से पढ़ते थे; किन्तु इस यांत्रिकी युग में पाठक साहित्य का आनन्द भी लेना चाहता है और समय की बचत भी चाहता है । यही सब है, जो लघुकथा की माँग करता है ।

डॉ लता अग्रवाल- साहित्य का उद्देश्य होता है समाज को नीति की राह दिखाना। क्या लघुकथा भी ऐसे ही किसी उद्देश्य को लेकर चलती है ?

डॉ शकुंतला किरण – इसे मैं इस तरह कहूँगी की साहित्य सदैव अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान में बदली हुई मानसिकता के साथ कथा-साहित्य का उद्देश्य भी शिक्षात्मक एवं मनोरंजन के साथ यथार्थ से समाज को अवगत कराना भी हो गया है,जिसके अंतर्गत गलत व्यवस्थाओं पर चोट करना, समाज के साथ व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक परिवेश की विकृतियों पर चोट करना, ओढ़े हुए मुखौटों को नोच फेंकना हो गया है। लघुकथा इन सब उद्देश्यों की पूर्ति करती है ।

डॉ लता अग्रवाल-‘लघुकथा अपने समापन के बाद पाठक के मस्तिष्क में खुलती है’ आपके हीइस कथन पर आपके विचार चाहेंगे।

डॉ शकुंतला किरण – कथा पाठक को कुछ सोचने पर विवश करे। जैसे आपकी लघुकथा ‘गरीब का लंच बॉक्स’ सोचने पर विवश करती है कि हमारे बाहरी आवरण कितने खोखले हो गये हैं । हम मासूम बच्ची को भी अपनी संवेदनहीनता का शिकार बनाने से नहीं चूक रहे । मैं यह नहीं कहती कि कथा आन्दोलन हेतु ही विवश करे, किन्तु कम से कम पाठक के हृदय को चिन्तन हेतु विवश तो करे ।

डॉ लता अग्रवाल-   लघुकथा के स्वरूप में कथ्य और तथ्य में परस्पर  तादात्म्य  कहाँ तक होना चाहिए ?

डॉ शकुंतला किरण – दोनों का समान रूप से महत्त्व है । देखिए, तथ्य और कथ्य दोनों लघुकथा के महत्वपूर्ण अंग हैं । आपके पास तथ्य है तो उसे कथा में ढालने के लिए कथ्य की आवश्यकता होती है । इसके लिए आपको प्रभावी प्रस्तुतीकरण  हेतु समस्त परिस्थितियों का निर्माण करना होगा ताकि तथ्य प्रभावशाली बने । पुन: तुम्हारी लघुकथा ‘गरीब का लंचबॉक्स’ से समझने का प्रयास करते हैं ।आपके पास तथ्य है—‘एक गरीब लड़की’, जिसे सरकारी योजना के तहत एक निजी स्कूल में प्रवेश मिलता है किन्तु स्कूल के तथाकथित शिक्षक और छात्र उसे स्वीकार नहीं करते ।’ यह तथ्य है। इसे सीधे-सीधे कहने पर यह बात पाठकों को इतनी प्रभावित नहीं करती । तुमने इसके लिए स्कूल का माहौल रचा, मीरा और कुछ पात्र तैयार किए उनमें एक निक्कू भी है । फिर लंच बॉक्स को लेकर एक शिक्षक के द्वारा संवाद कहलवाए और अंत में कथा को चरमोत्कर्ष देने के लिए निक्कू के ड्राइवर द्वारा वह लंचबॉक्स देना, जो पाठक के मन में मीरा के प्रति गहरी संवेदना छोड़ गया । जो पाठक के मुंह से ‘उफ़ !’, ‘ओह!’, ‘हाय रे !’ शब्द निकलवा ही लेता है। यह है तथ्य और कथ्य का संतुलन। यदि केवल तथ्य या फिर कथ्य ही होगा तो बात पाठक के मर्म को नहीं छुएगी ।  

डॉ लता अग्रवाल-आजकल लघुकथा के शब्द सीमा में निरंतर विस्तार हो रहा है इससे नव लेखकों में बहुत भ्रम की स्थिति है ।क्या इसका कोई निश्चित प्रारूप या शब्द सीमा है आपकी दृष्टि में ?

डॉ शकुंतला किरण जी – मेरी दृष्टि में, कभी कोई  लघुकथा शब्द सीमा में नहीं बांधी जाती । यह तो कथ्य की मांग पर निर्भर होती है। आपको मकान बनाना है या अस्पताल—यह पहले तय करना होगा; उसी के अनुरूप ही आप भूमि का चयन करेंगे न ? यह कथ्य की मांग पर निर्भर करता है। हाँ ! इतना अवश्य कहूँगी कि प्रत्येक कथ्य के लिए विधा है। यदि कथ्य लम्बे हैं तो कहानी चुनें, यदि मनोरंजन प्रधान हैं तो चुटकुले हैं, तीखेपन के लिए व्यंग्य है। हर कथ्य लघुकथा के लिए उपयुक्त नहीं है। पाठक चाहेगा बात संक्षिप्त और प्रभावशाली हो। शब्दों के आडम्बर से दूर ।

डॉ लता अग्रवाल- क्या कहानी का ही संक्षिप्त रूप माना जा सकता है लघुकथा को ?

डॉ शकुंतला किरण । – ‘कथ्य’ किसी भी रचना की आत्मा होता है । कहानी और लघुकथा के कथ्य में प्रवृत्तियों और विस्तार की संभावनाओं का अंतर होता है । आप कहेंगे हाथी और चींटी की आत्मा में भला क्या अंतर ? तो कहानी का कथ्य बहिर्मुखी होता है—कमल के फूल की तरह, वहीँ लघुकथा अन्तर्मुखी होती है ठीक आक के फूल की तरह । विस्तार की सम्भावना कथ्य में निहित होती है । जैसे बीज पर निर्भर होता है कि वह दो फीट का गुलाब बनेगा या बीस-तीस फीट का देवदार। हम गुलाब को देवदार नहीं बना सकते, न ही देवदार का आकर गुलाब जितना छोटा कर सकते हैं, यदि किसी तरह प्रयास भी किया तो यह उसकी नैसर्गिकता को समाप्त करना हुआ  ।

लघुकथा और कहानी में वही अंतर है जो एक तार और पत्र में है। पत्र की तुलना में तार में बहुत कम, सीमित और सार्थक शब्द होते हैं; किन्तु उनका प्रभाव पत्र से ज्यादा होता है । इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कहानी एक पत्र है और लघुकथा तार ।

डॉ लता अग्रवाल- अक्सर नव लघुकथाकार कहानी के विषय को लेकर ही लघुकथा रच डालते हैं इससे कैसे बचें ?

डॉ शकुंतला किरण –  बहुत आसन है। देखिये,जिस तरह एक कमरे की दीवार पर बल्ब लगते हैं तो उसका प्रकाश पूरे कमरे में बिखर जाता है; परन्तु प्रकाश की तीव्रता भी बँट जाती है । वहीँ वह बल्व यदि टेबल लेम्प पर लगाया जाय तो प्रकाश का घनत्व सिमटने के कारण चीजें और अधिक स्पष्ट हो जाएँगी । वैसे ही, कहानी में जीवन की कई घटनाएँ जुडी होती हैं या हो सकती हैं अत: सभी घटनाओं को साधारण तरीके से प्रस्तुत किया जाता है; वहीं, लघुकथा एक काल-विशेष की घटना को समग्र प्रभाव से प्रस्तुत करती है ।

डॉ लता अग्रवाल-   आपकी दृष्टि में एक सार्थक लघुकथा की क्या कसौटी है ?

डॉ शकुंतला किरण –जो पाठकीय सोच को चिन्तन दे, अंतर्मन को झकझोर दे; सोचने पर विवश करे वही सार्थक लघुकथा है मेरी दृष्टि में । बस शब्द कम से कम हों, शैली प्रभावशाली हो, कथ्य और तथ्य का सुंदर समन्वय हो । यहाँ सतीश दुबे । की एक लघुकथा ‘पासा’ का जिक्र करना चाहूँगी—पत्नी द्वारा घरेलू बातों के जवाब में पति के हाँ,हूँ के कारण महज औपचारिक संवाद लगते हैं; किन्तु जैसे ही पत्नी कहती है—‘तुम्हारी क्लास फैलो कुसुम आई थी’ पति के जिव्हा पर लगा कर्फ्यू हट जाता है और वह उसके बारे में सब-कुछ जानने के लिए पत्नी पर प्रश्नों की झड़ी लगा देता है । उत्तर में पत्नी का एक वाक्य—‘मैंने उससे ये सभी बाते पूछी थी मगर वह भी हाँ,हूँ करती रही’ ।

 पति,पत्नी के संक्षिप्त संवाद और भाषा की ऐसी कसावट कि एक शब्द भी वाक्य से हटा लिया जाय तो पूरी कथा लड़खड़ा जाए। किन्तु इस छोटी-सी कथा में कई पहलू जीवन के खुलकर पाठक के सामने आ जाते हैं । कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला है लघुकथा ।

डॉ लता अग्रवाल- अपने शोध ग्रन्थ में आपने कहा है– “लघुकथा एक प्रकार से कम आय वाले अर्थशास्त्री का अपना निजी बजट है जिसे वह प्रबुद्धता के साथ बहुत सोच-समझकर इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का सदुपयोग हो।” यह पैसे के सदुपयोग की कला के बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?

डॉ शकुंतला किरण – । यहाँ दो बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगी—प्रथम, कम आय वाला और अर्थशास्त्री; दूसरा, उसका अपना निजी बजट, सरकारी नहीं। एक तो वह अर्थशास्त्री है, मतलब सोच-समझ कर चलने वाला; दूसरा यह बजट उसका अपना है, सरकारी नहीं। अमूमन लोग सरकारी पैसे के लिए इतने गंभीर नहीं होते। पता है—पैसा सरकार का है। यहाँ अपने जेब से खर्च की बात है तो स्वत: ही सावधान रहता है ।जैसे, एक व्यक्ति, जिसकी आमदनी कम है, वह परिवार को चलाने के लिए एक-एक पैसे का सदुपयोग करता है । वह पैसे खर्च करता है उन्हें उड़ाता नहीं है। लघुकथाकार भी शब्दों का अर्थशास्त्री है। उसके पास कहानी और उपन्यास की तरह शब्दों की संपदा तो है; लेकिन वह मितव्ययी है, उन्हें उड़ाने में विश्वास नहीं करता।

डॉ लता अग्रवाल-कथ्य में विविधता लाने के लिए नव लघुकथाकारों को कोई नुस्खा ?

डॉ शकुंतला किरण – विषय में वैविध्य तो है, बस आवश्यकता है लेखक की दृष्टि वहाँ पहुँचनी चाहिए । यह विषय उसके अनुभव से उपजे होने चाहिएँ, कोरी कल्पना के आधार पर न हों ।

डॉ लता अग्रवाल-.  लघुकथा की भाषा कैसी होना चाहिए ?

डॉ शकुंतला किरण जी – आम आदमी की भाषा जिसे आसानी से समझा जा सके, साथ ही पात्रगत भाषा हो । आप स्वयं सोचिये—एक अनपढ़ व्यक्ति के मुख से पंडिताऊ भाषा, एक बुजुर्ग ग्रामीण महिला के मुख से अंग्रेजी के शब्द, एक शराबी अथवा निम्न तबके के व्यक्ति द्वारा शालीन भाषा क्या सहज लगेगी …? नहीं न। इससे कथा में स्वाभाविकता का वो रस नहीं आ पायेगा। शराबी है या निम्न प्रवृत्ति का व्यक्ति है तो वैसे शब्द हमें लेने होंगे । यथा, ‘चल बे साले …उल्लू के पट्ठे …या फिर अनपढ़ व्यक्ति द्वारा—माई बाप ! म्हारी मजबूरी समझो को नी; ग्रामीण महिला—‘म्हारी तो किस्मत ई बदल गी’ कथा को गतिशीलता देने के लिए यह पात्रगत भाषा बहुत आवश्यक हो जाती है।

डॉ लता अग्रवाल-.   लघुकथा में बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग को आप कहाँ तक आवश्यक मानती हैं ?

डॉ शकुंतला किरण – प्रतीक और बिम्ब का प्रयोग उतना ही हो जितना आवश्यक हो,सहजता से आयें । बात को घुमावदार और कथा में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए इनका सायास प्रयोग मैं आवश्यक नहीं मानती ।

डॉ लता अग्रवाल-   फेंटेसी का लघुकथा में क्या स्थान है ?

डॉ शकुंतला किरण जी – मैं लघुकथा में कल्पनावाद के पक्ष में नहीं। कारण, इसका स्वरूप छोटा है कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है । छोटे से रूप में आप क्या कल्पना करेंगे । यह तो लेखक को तय करना है कि वह क्या कहना चाहता है ? छोटी बात है तो लघुकथा, उससे छोटी है तो हायकू हैं । अगर उसके मस्तिष्क में कल्पना-लोक की अनुभूति है तो इसके लिए कहानी और उपन्यास हैं न । वैसे भी, आज पाठक का अधिकांश समय तो लेपटोप और कम्प्यूटर ने ले लिया है। आप यह सोचिये—कम समय में, कम शब्दों में, प्रभावी तौर पर आप क्या दे सकते हैं पाठक को ।

डॉ लता अग्रवाल-संवाद को रोचक और जीवंत बनाने के लिए कोई मार्गदर्शन दें ?

डॉ शकुंतला किरण जी – पुन: कहूंगी पात्र के व्यक्तित्व को मद्देनजर संवादों की रचना की जाय। उन्हें संक्षिप्त करने के लिए थोड़ा-सा होमवर्क किया जाय तो निश्चित ही संवाद अच्छे बन पड़ेंगे ।

डॉ लता अग्रवाल-.  कथा में पात्र प्रमुख होना चाहिए या घटनाएँ ?

डॉ शकुंतला किरण – घटना नहीं है तो पात्र क्या कहेंगे ? यदि पात्र नहीं है तो घटना कैसे दर्शाई जाएगी ? यह वही बात हो गई—एक राजा था, एक रानी थी दोनों मर गये खत्म कहानी थी । घटना में जीवन्तता लाने के लिए पात्रों की रचना करनी होती है । पात्रों से कहलवाने के लिए घटना गढ़नी पड़ती है । तभी कोई बात पाठक को प्रभावित करती है । दोनों तराजू के दो पलड़ों की तरह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं ।

डॉ लता अग्रवाल-आंचलिक परिवेश को चित्रित करते समय लेखक को किन बातों की सावधानी रखना चहिए ?

डॉ शकुंतला किरण जी – आंचलिक परिवेश पाठक को नजर भी आना चाहिए । लघुकथा दृश्य सामग्री तो है नहीं, इसे केवल पात्रों के माध्यम से ही अनुभव कर सकते हैं । अत: पात्रों के संवाद के साथ उनके परिधान एवं परिवेश को लेखक जितने कौशल के साथ प्रस्तुत करे उतना ही अंचल दिखाई देगा ।

डॉ लता अग्रवाल-शीर्षक का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान  रखना चाहिए ?

डॉ शकुंतला किरण –  आज की दुनिया विज्ञापन की दुनिया है। जितना आकर्षक पॅकेज होगा, ग्राहक उतना ही वस्तु की ओर आकर्षित होगा। ठीक वैसे ही लघुकथा का शीर्षक प्रभावशाली हो, कथ्य से जुड़ा हो, उसमें थोडा कौतूहल (सस्पेंस) भी हो ।

डॉ लता अग्रवाल-नवांकुर लघुकथा लेखकों के लिए क्या सन्देश है ?

डॉ शकुंतला किरण – केवल इसलिए लिखें की लिखना है की बजाय जो बात,घटना आपको भीतर तक कचोटे; लगे कि इसे आवाज देना ही पड़ेगा, तब लिखें।

डॉ लता अग्रवाल-लघुकथा का उद्देश्य चरित्र एवं विसंगतियों की ओर संकेत करना मात्र है न कि उनका उपचार बताना । ऐसा क्यों ? साहित्य का लक्ष्य तो सर्व कल्याण होता है।

डॉ शकुंतला किरण – इसके लिए हितोपदेश की कहानी, वेद पुराण नैतिक कथाएँ हैं जो चरित्र निर्माण को आधार बनाकर लिखी गई हैं । दूसरे, जरा गौर से देखें तो इन कथाओं में जब पाठक की अंतर्चेतना झकझोरती है तो अपने आप वह समस्या के समाधान के बारे में सोचता है । यह काम पाठक को सौंपे तो बेहतर है ।

डॉ लता अग्रवाल-नव लघुकथाकारों से किस नवाचार की अपेक्षा आप रखते हैं ?

डॉ शकुंतला किरण – उनके अपने अनुभव हैं, अनुभूतियाँ है जो उन्हें  विवश करेंगी। अनुभूति का वेग जितनी तीव्रता लिए होगा, उतना सार्थक लेखन होगा । लेखन में कोई क्षेत्र निश्चित हो, यह मैं उचित नहीं मानती । लेखन को टारगेट बनाकर या सीमा में बांधकर नहीं लिखना चाहिए ।

डॉ लता अग्रवाल-लघुकथा का भविष्य कैसा देख रही हैं आप ?

डॉ शकुंतला किरण -आज लघुकथाओं को लेकर बहुत प्रतियोगिताएं हो रही हैं, लोग इस बारे में सोच रहे हैं, कम्फर्टेबल लग रही है, भले ही वह लेखक बनने की धुन में हो रही है, हलचल तो हो रही है । मतलब लघुकथा प्रभावित कर रही है लेखक और पाठक दोनों को । तो निश्चय ही इसका भविष्य उज्ज्वल लग रहा है ।

-0-डॉ लता  अग्रवाल,30 यश विला , एमआईजी , अप्सरा कॉम्प्लेक्स –A सेकटर

इन्द्रपुरीभोपाल -462022

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