जून 2026

अध्ययन -कक्षडॉ. सतीशराज पुष्करणा : लघुकथा के पुरोधा     Posted: October 1, 2022

जब हम हिन्दी लघुकथा पर विचार करते हैं, तो आधुनिक लघुकथा के बीज हम भारतेन्दु हरिश्चंद्र की लघुकथाओं में पाते हैं। 1874 ई. का वह समय जब हमारा देश परतंत्रता का संकट झेल रहा था, उस समय की स्थितियों एवं परिस्थितियों को केंद्र बनाकर लघुआकारीय कथात्मक रचनाएँ लिखी गईं, जिनमें व्यंग्य का उपयोग बहुत ही सटीक ढंग से किया गया था। इसके पश्चात् खलील जिब्रान से प्रभावित दार्शनिक लघुकथाओं का सृजन किया जयशंकर ‘प्रसाद’ ने। इसके बाद तो फिर तत्कालीन अनेक कथाकारों ने अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र लघुकथा को बनाया जिनमें प्रेमचंद, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’। आचार्य जगदीशचंद्र मिश्र, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’, रामेश्वरनाथ तिवारी, भवभूति मिश्र, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, कामता प्रसाद सिंह ‘काम’, श्यामनन्दन शास्त्री, भृंग तुपकरी, रावी, रामवृक्ष बेनीपुरी, चंद्रमोहन प्रधान इत्यादि उल्लेखनीय हैं। इसके बाद छठे-सातवें दशक में आधुनिक लघुकथा देश की राजनैतिक परिस्थितियों को केंद्र में लेकर उपस्थित हुईं जिसमें आपातकाल से पूर्व की स्थितियों और फिर आपातकाल एवं जे. पी. आंदोलन से उपजी स्थितियों को लेकर लघुकथा विषयवस्तु एवं शिल्प दोनों स्तरों पर नए रंग-ढंग में सामने आई जिसने पाठकों का ध्यान गंभीरता से आकर्षित किया। इस समय जो लेखक बहुत सक्रिय प्रतीत हुए उनमें डॉ.  शंकर पुणताम्बेकर, कमल गुप्त, विनायक, डॉ. सतीश दुबे, डॉ. कृष्ण कमलेश, जगदीश कश्यप, बलराम, रमेश बतरा, बलराम अग्रवाल, मधुदीप, मधुकान्त, शकुंतला किरण, अंजना अनिल, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बंधु’, श्यामसुंदर अग्रवाल, डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति, डॉ. सतीशराज पुष्करणा इत्यादि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने लघुकथा की विकास-यात्रा में मात्र लघुकथा-सृजन ‘वर्तमान के झरोखे में’, ‘प्रसंगवश’, ‘बदलती हवा के साथ’, ‘ज़हर के खिलाफ़’, ‘उजाले की ओर’ और ‘आग की नदी’ (सभी एकल संग्रह) के माध्यम से ही योगदान नहीं दिया अपितु उन्होंने इसके आलोचना-क्षेत्र में ‘लघुकथा: बहस के चौराहे पर’, ‘अंधेरे के विरुद्ध का सौंदर्यशास्त्र’, ‘लघुकथा समीक्षा: एक दृष्टि’, ‘लघुकथा: सर्जना और समीक्षा’, ‘लघुकथा का रचना-विधान’ एवं ‘लघुकथा: एक संवाद’ के साथ-साथ ‘दिशाएँ’, ‘आठ कोस की यात्रा’, ‘वर्तमान’, ‘प्रत्यक्ष’, ‘मण्टो और उसकी लघुककथाएँ, ‘अक्स-दर-अक्स’, ‘समकालीन हिन्दी लघुकथाएँ’, ‘कथादेश’, ‘तत्पश्चात्’, ‘बिखरे संदर्भ’, ‘आज के प्रतिबिंब’, ‘काशें’, ‘हिन्दी की चर्चित लघुकथाएँ, ‘हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएँ’, ‘बिहार की हिन्दी लघुकथाएँ’, बिहार की प्रतिनिधि हिन्दी लघुकथाएँ’, ‘समकालीन हिन्दी लघुकथाएँ’ इत्यादि अन्य अनेक पुस्तकों का सफल सम्पादन-कार्य भी किया।

इनके संयोजन में अब तक 27 अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलनों का आयोजन हो चुका है। इन कार्यों के अतिरिक्त डॉ. पुष्करणा ने पटना सम्मेलनों से इतर अन्य-अन्य स्थानों में हुए अनेक लघुकथा-आयोजनों में दर्जन से अधिक शोध-लेखों का पाठ किया है।

जहाँ तक मेरी जानकारी है डॉ. पुष्करणा 1975 से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। अब तक प्रायः सभी चर्चित एवं प्रतिष्ठित संकलनों में आपकी रचनाओं का ससम्मान प्रकाशन हुआ है। अब तक आपने लगभग डेढ़ हज़ार लघुकथाओं का सृजन किया है और आपका सृजन-कार्य आज भी बदस्तूर जारी है।

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि पुष्करणा जी ने सबके साथ खुद को और सबको अपने साथ जोड़े रखा है। है। ये स्वयं में लघुकथा की एक संस्था हैं। आज भी रचनात्मक लेखन, सम्पादन और अन्य गतिविधियों के द्वारा  पूर्णरूपेण सक्रिय हैं। बड़े से लेकर नवलेखकों को पूर्ववत् आगे बढ़ा रहे हैं। इन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों  को निहारा-परखा है, जीवन भर संघर्षरत रहे हैं। इनके व्यक्तित्त्व की बेबाकी इनकी रचनाओं में भी नज़र आती है। मैंने इसी निकष पर इनकी लघुकथाओं को परखने का विनम्र प्रयास किया है।

इनकी पड़ताल करते हुए  मोटे तौर पर इनको मैंने कुछ मुख्य विषयों के अन्तर्गत रखने की कोशिश की है। जैसे मानवीय/मानवता; पारिवारिक सम्बन्ध- माता-पिता-सन्तान, पति-पत्नी /स्त्री-पुरुष; सामाजिक सरोकार- जिसमें समाज से सम्बन्धित अच्छाइयाँ-बुराईयाँ एवं उनकी ओर एक आम इन्सान की विवशता और उदासीनता;  दोहरे मापदण्ड; अपने कार्य के प्रति समर्पण एवं निष्ठा तथा सामान्य एवं पुरुष-स्वभाव से जुड़े हुए मनोविज्ञान की लघुकथाएँ हैं। कुछ लघुकथाएँ ऐसी भी हैं जो हमारे जीवन के एक से अधिक पहलुओं को एक साथ  छूती हैं- मानवीय -सामाजिक, राजनीतिक-सामाजिक, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक इत्यादि। उनको मैंने अपने हिसाब से सही जगह रखने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त कुछ लघुकथाओं को किसी भी वर्ग में नहीं अपितु अन्य-अन्य प्रकार की लघुकथाएँ शीर्षक के अंतर्गत रखा है।

  1. मानवीय दृष्टिकोण की लघुकथाएँ: इस श्रेणी में डॉ. पुष्करणा की ‘सहानुभूति’, ‘दायित्वबोध’, ‘वापसी’, ‘उपहार’, ‘उधेड़बुन’, ‘पुरस्कार’, ‘रक्तबीज’, और ‘माँ’ को रखा गया है।

‘सहानुभूति’ पुष्करणा जी बहुचर्चित लघुकथाओं में पांक्तेय रही है। उसका कारण उसका कथानक एवं शिल्प की सटीकता के साथ संवेदित करती भाषा है जो पाठक के दिल में उतरकर उसे भिगो जाती है। इस संदर्भ में इस लघुकथा की कतिपय पंक्तियाँ प्रासंगिक होंगी –“रामू दादा कहता है कि “आपको जो करना है सहर्ष कर सकते हैं”, किन्तु अधिकारी कहता है कि “लिखित कार्रवाई करके मैं तुम्हारे बाल-बच्चों को प्रभावित नहीं करना चाहता, गलती तुम करते हो, अतः डाटूँगा भी तुम्हीं को।“ इस बात से रामू दादा का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वह अपने कार्य-स्थल पर अधिकारी द्वारा दिए गए कार्य को करने हेतु चल जाता है। इसकी भाषा-शैली, संवेदना जगाती इस लघुकथा की आत्मा है। ‘दायित्वबोध’ में पशु-प्रेम को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करने में डॉ. पुष्करणा ने सफलता पाई है। यह भी मानवीय संवेदना से लबालब लघुकथा है। नायक को अपनी गए भी अपने बच्चों जैसी लगती है।

नायक जब स्वयं बिस्कुट खाकर जब पानी पीता है ,तो देखता है कि गाय उदास- सी बाहर खड़ी है। उसकी उदासी और आँसू देखकर उसे लगता है कि गाय को शायद उसके बच्चों और पत्नी की याद आ रही है; क्योंकि वे उसके साथ खेलते थे और उसको खाना-पानी देते थे। यह ध्यान आते ही उसे गाय के भूखे होने का एहसास हुआ। तब उसका दिल ममता से भर उठा और वह गाय में उसे अपने भूख से रोते हुए बच्चे दिखने लगे। तब वह दौड़कर उसके पास जाता है और उसे गले से लगाकर रो पड़ता है तथा उससे क्षमा माँगता। है। वह जब गाय की आँखों से बहते आँसू पोछता है, तो गाय उसकी ओर ख़ुशी से देखती है। उसे लगता है जैसे उसके बच्चे खिलखिला उठे हैं। मर्मस्पर्शी लघुकथा होने के कारण यह संवेदित कर जाती है जो किसी भी लघुकथा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।

‘वापसी’ भी मर्म को स्पर्श करती लघुकथा है, जो नायक के पत्र से प्रतिनायक का हृदय परिवर्तन करने में सक्षम होती है। पत्र पढ़कर जेबकतरे की आँखें खुल जाती हैं। वह यह सोचने लगता है कि कहाँ तो यह इस तरह अपना पेट काटकर, जूते पॉलिश कर के अपनी माँ को रुपये भेज रहा है और कहाँ वह! अपनी अकेली माँ को छोड़कर यहाँ भाग आया और चोरी करके मस्ती से जी रहा है। उसे यह विचार भी कचोटने लगा कि यदि इन रुपयों के अभाव में उस व्यक्ति की माँ का इलाज न हो सका हो और वह मर गई होगी तो? एक पल को तो उसके मन का राक्षस उसे सबकुछ भूलकर उन रुपयों को अपने पास रखने को ललचाता है परन्तु फिर उसे उस ख़त की एक-एक पंक्ति याद आती है और वह उन रुपयों को उस व्यक्ति की माँ के पते पर भेजने का निर्णय कर के जी.पी.ओ. की तरफ़ चल पड़ता है। ‘वापसी’ इसका शीर्षक एकदम सटीक है, जो प्रतिनायक की वापसी की ओर संकेत करता है।

‘उपहार’ एक ऐसे शिक्षक की कथा है जो प्रत्येक दृष्टि से एक श्रेष्ठ मानव एवं उत्कृष्ट शिक्षक है, जिसका उद्देश्य धन अर्जित करने से अधिक शिष्यों को शिक्षित करना है। शिष्या का परीक्षाफल आने पर उस गरीब शिष्या को, ट्यूशन में ली गई राशि भावी अध्ययन हेतु उपहारस्वरूप देकर एक आदर्श शिक्षक एवं एक आदर्श व्यक्ति होने का परिचय देता है। इसकी प्रस्तुति अपनी भाषा-शैली के कारण किसी भी पाठक को संवेदना से भर देने की भरपूर क्षमता रखती है।

‘उधेड़बुन’ की कथा एक ऐसी महिला के उधेड़बुन यानि द्वंद की कथा है, जो बारिश में भीग रहे भिखारी को देखकर उसपर दया करती है, उसे चाय पिलाने तथा ठंड से बचने हेतु पति के पुराने ऊनी कपड़े देना चाहती है, किन्तु वह समय की चाल को देखकर कहीं आशंकित भी होती है कि कहीं ये भिखारी भी साँप को दूध पिलाने जैसा ही साबित न हो! किन्तु फिर भी उसके भीतर की ममता जीत जाती है और वह उसे चाय पिलाती है और पति के पुराने ऊनी कपड़े देकर तुरंत जाने को कहती है। यह लघुकथा हमें सचेत करती है कि हमें मदद करनी चाहिए किन्तु समय को देखते हुए अपनी सुरक्षा एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखना चाहिए।

‘पुरस्कार’ में वर्ग-भेद के चरित्र को बहुत ही कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करने में कथाकार ने सफलता पाई है। इसके संवाद एवं उनमें उपयोग उच्चरित भाषा लघुकथा के स्तर को अपेक्षाकृत काफ़ी ऊँचा उठा देते हैं।

लघुकथा ‘रक्तबीज’ कुछ पुरुषों के गुनाहों को धोने का कार्य करती हैं जिसमें एक मामूली चौकीदार एक सुंदर किन्तु मलिन चेहरे वाली अधेड़ महिला को एक नेता के हाथों बर्बाद होने से बचाता है। वह महिला नेता के बुलाने पर डाक बंगले में जाती है, जहाँ नेता ने उसको उसकी मदद करने हेतु ये झाँसा देकर बुलाया है कि दंगे-फसाद में जो उसका घर जला है तथा उसके पुत्र की मृत्यु हुई है, उस सिलसिले में वह उसे ढेर सारा रुपया देगा। नेता की गिरी हुई नीच हरकत के सामने उसके चौकीदार का ऊँचा क़िरदार पुरुषवर्ग के लिए एक मिसाल के रूप में उपस्थित होता है। इसका प्रतीकात्मक शीर्षक इसमें अपनी सार्थकता सिद्ध करता है। आज एक राक्षस मारिए, रक्तबीज की तरह लाखों उत्पन्न हो जाते हैं।

‘माँ’ लघुकथा यह बताती है कि इसका चेहरा भिन्न-भिन्न नहीं होता। हर माँ एक जैसी होती है जो मात्र अपने पैदा किए बच्चों को ही अपना नहीं समझती अपितु उसे संसार के प्रत्येक बच्चे में अपने ही बच्चों की छवि दिखाई देती है। ट्रेन में यात्रा करते युवा नायक की अपनी बगल की सीट में ऐसी ही माँ से भेंट हो जाती है, जो उसे न मात्र ठंड से बचाने हेतु अपना शॉल एवं कंबल ओढ़ाकर ठंड से उसकी रक्षा करती है अपितु अपने बच्चों की तरह से ही खिलाने-पिलाने में भी कोई कोताही नहीं बरतती। इस लघुकथा में ‘माँ’ के क़द को हिमालय से भी ऊँचा दिखाया है, किन्तु मेरी दृष्टि में आज यह समय का सच नहीं है। आज की माँ मात्र अपने बच्चों तक ही सीमित रहती है। अनेक आधुनिक माँएँ अपनों की भी उपेक्षा करके मात्र अपने ‘फिगर’ पर ही ध्यान केंद्रित रखती हैं। कथा के अनुसार यदि इसका शीर्षक प्रतीकात्मक होता तो लघुकथा कुछ और ऊँचाई ग्रहण कर सकती थी।

 

  1. परिवार पर केंद्रित लघुकथाएँ: इस श्रेणी में ‘भावनाओं का यथार्थ’, ‘भविष्य-निधि’, ‘दीप जल उठे’, ‘कुमुदनी का फूल’, ‘नई पीढ़ी’ और ‘चूक’ को रखा जा सकता है।

‘भावनाओं का यथार्थ’ – बाप-दादाओं के बनवाए हुए मकान को बेचकर बढ़िया कॉलोनी में नया मकान या फ्लैट ले लेना आजकल बहुत आम हो गया है। पुराने बड़े मकान का रखरखाव, उसकी सफ़ाई तथा मरम्मत आज की पीढ़ी के बस की बात नहीं है। कारण भी उचित है-न किसी के पास इतना समय है, न ही काम करने वाले नौकर-चाकर और पैसा! वह तो जितना आता है, उससे अधिक आजकल के भागते-दौड़ते जीवन से तालमेल बिठाने में कहाँ ख़र्च हो जाता है, पता ही नहीं चलता !

परन्तु फिर भी कुछ अपवाद ऐसे होते हैं, जो इन सबसे ऊपर हटकर जीते हैं। उन्हें अपनी पुश्तैनी चीज़ों से भावनात्मक लगाव होता है। इस लघुकथा का नायक उन्हीं में से एक है। वह अपने बाप-दादाओं के मकान में अपने परिवार के साथ रह रहा है। वह मकान उसे ‘अपना’ लगता है, उसमें कुछ भी करने से उसको कोई रोकटोक नहीं सकता -यह उसका सबसे बड़ा ‘सन्तोष’ है। स्वयं के ढलते स्वास्थ्य एवं पुराने जर्जर होते मकान- दोनों की ‘मरम्मत’ की उसे चिन्ता है। है। घर को साफ़ करते हुए वह अपने दोनों पर हुए ‘ख़र्च’ को लेकर सोचता रहता है। जब उसका बेटा उसे बोलता है कि इस मकान को बेचकर कहीं अच्छी कॉलोनी में घर क्यों न ले लिया जाए। तो उसका यह जवाब कि ‘उस मकान को बेचकर तो नया मकान ले लोगे मगर इस बूढ़े बाप का क्या करोगे? इसे कौन ख़रीदेगा ?’ उसके बेटे को निरुत्तर कर देता है। दाढ़ी बनाते-बनाते वह यह भी सोचता है -जिस तरह उसकी दाढ़ी हर दिन उग आती है, उसी प्रकार इस घर में जाले भी लग जाते हैं। घर से उसका जुड़ाव किस हद तक है, यह इस बात से पता चलता है। तभी दाढ़ी बनाते-बनाते वह फिर एक मकड़ी को जाला बनाते हुए देखता है और मुस्कुरा देता है और यह महसूस करता है कि अभी वह बूढ़ा नहीं है। शायद मकड़ी के जाला बनाने का अथक प्रयास उसके मन में भी उत्साह जगाता है और वह भी नई ऊर्जा से भर जाता है। यही इस लघुकथा की सार्थकता है। इसका शीर्षक न मात्र सटीक है अपितु लघुकथा का अभिन्न अंग बनकर उभरता है।

‘भविष्य-निधि’ लघुकथा भी संवेदना जगाती एक महत्त्वपूर्ण पारिवारिक लघुकथा है जो अपने प्रतीकात्मक शीर्षक के अनुसार ही अपने उद्देश्य एवं संदेश से भी समृद्ध है। नायक अपने पिता को स्वयं ही पैर दबाते हुए देखकर दुखी होता है और मन ही मन सोचने लगता है कि वृद्धावस्था भी व्यक्ति में कैसे-कैसे परिवर्तन ला देती है ! वह उनको स्नेहभरा उलाहना देते हुए कहता है कि यदि उनको दर्द हो रहा था ,तो उन्हें उसे, अर्थात अपने बेटे को, उनके पाँव दबाने का आदेश देना था न कि स्वयं ही दबाने लगना था। पिता धीमे स्वर में, मगर अपने दिल की बात साफ़-साफ़ कह देते हैं कि उन्हें कहने में ‘संकोच’ होता है। बेटा उनके पैर दबाते-दबाते सोचने लगता है कि ये वही पिताजी हैं-जो अवकाश-प्राप्ति के पहले ‘हक़’ से अपने छोटे भाइयों से अपने पैर दबवाते थे, और जब तक वे सो नहीं जाते थे, उनके भाई उनके पैर दबाते रहते थे। मगर अब सभी भाई अपने-अपने धन्धों में व्यस्त हो गए हैं। जब से पिता जी ने अवकाश प्राप्त किया है, तब से वे अपने कार्य स्वयं ही करने लगे हैं, किसी को आदेश नहीं देते। यहाँ तक कि अब उसकी माँ के स्वर में भी वो पहले जैसा रौब नहीं रहा है।

वह अपने माता-पिता की यह मनःस्थिति देखकर द्रवित हो उठता है। और जैसा कि हर इन्सान के साथ होता है, वह भी सोचने लगता है, कि कल को जब वह वृद्ध हो जाएगा तो क्या उसे भी अपने बच्चों का ‘मोहताज’ होना पड़ेगा ? -यह बात मन में आते ही उसके पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ जाती है। वह सोचता है कि यदि आज वह अपने माता-पिता को कोई सुख देता है तो उसके बच्चे निश्चित ही उसे देखेंगे, उससे सीख लेंगे और आगे चलकर वे भी वैसा ही करेंगे। सो उसे भी अपने माता-पिता के साथ वैसे ही व्यवहार करना चाहिए जैसा कि वह अपने बच्चों से चाहता है। अपनी सोच की तन्द्रा से बाहर आकर वह देखता है कि उसके पिता जी उसके हाथों से सुख पाकर गहरी निंद्रा में खर्राटे ले रहे हैं। इतने में सोई हुई उसकी माँ फुसफुसाती है कि अब वह सो जाए जाकर, सुबह उसे जल्दी उठना है।  वह अपनी माँ से भी पैर दबाने की बात कहता है, जिसे सुनकर माँ भावविभोर हो जाती है और उसे लाख-लाख दुआएँ देते हुए कहती है कि कल जब उसके पास समय होगा, वह तब दबा दे ! माँ के आशीषों को सुनकर वह निहाल हो जाता है और उसे महसूस होता है कि उसे बहुत बड़ा पुरस्कार मिल गया ! माँ को प्रणाम करके वह वहाँ से चला जाता है।

“आज मैं जैसी पौध लगाऊँगा कल उनपर फल भी वैसे ही आएँगे।“…यही इस लघुकथा का सार है। आज की पीढ़ी के अधिकतर लोग इस बात से बेख़बर हो चले हैं। बूढ़े माँ-बाप उनपर बोझ बन गए हैं। वे यह भूले हुए हैं कि वक़्त रुकता नहीं, कल वे भी इसी जगह पर होंगे। आज जिन बच्चों के पीछे वे अपने माँ-बाप की उपेक्षा कर रहे हैं, उन्हें समय  नहीं दे पा रहे हैं -कल को वही बच्चे उन्हें भूल जाएँगे, उन्हें फालतू मेज़-कुर्सी (डिस्कारडेड  फर्नीचर) की मानिन्द अकेला छोड़ देंगे।

इस कथा का नायक इस बात को समझता है और वह अपने माँ-बाप की सेवा करके उनकी दुआएँ लेता है -जो उसके लिए ‘भविष्य-निधि’ हैं। यह लघुकथा हर तरह से  अत्युत्तम है। तकनीकी पहलू से एकदम कसी हुई है। बूढ़े और अवकाशप्राप्त पिता का अपने हाथों से स्वयं के पैर दबाना, बेटे से अपनी पीड़ा कहने में संकोच करना, माँ की आवाज़ में अब रौब न रहना-यह सारी बातें कथा के मर्म को बयान करती हैं। जहाँ आज रिश्तों का भी अवमूल्यन हो रहा है , वहाँ यह लघुकथा रिश्तों की गर्माहट का साक्ष्य बनती है और आशा की रौशनी जगाती है।

‘दीप जल उठे’ एक पारिवारिक लघुकथा होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भी है। इसके तीन पात्र हैं। नायक बेटा है, पिता और माता हैं। माता अपने बच्चे को सुविधापूर्ण ढंग से पढ़ाई हेतु पति पर दबाव डालकर उसे अपने मायके में छोड़ देती है जहाँ बच्चा पढ़-लिख तो जाता है मगर अपनी उम्र से कहीं अधिक बड़ी उम्र का व्यवहार करने लगता है। उम्र बचपन की रही किन्तु बाल-सुलभता उसमें काभी नहीं आई। इसी मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर यह लघुकथा लिखी गई है। माँ के बार-बार आग्रह करने पर बच्चा अपना मुँह खोलता है और अपनी पीड़ा बयान करता है। जिसमें माता को अपनी भूल का एहसास होता है।

कुल मिलाकर यह लघुकथा यही कहती है-माँ-बाप की आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, अपने बच्चों को अपने साथ रखकर उनका पालन-पोषण करना चाहिए तथा उन्हें पढ़ाना चाहिए। अंततः सयान होने पर बच्चा अपने माता-पिता के पास या जाता है। इसी स्थिति ने ‘दीप जल उठे’ शीर्षक दिया है जो प्रसन्नता का प्रतीक है।

यह लघुकथा मर्म को स्पर्श करती संवेदना से भरी एक उत्कृष्ट लघुकथा है। जहाँ तक मेरी जानकारी है इस पर पंद्रह मिनट की एक टेलीफ़िल्म भी बन चुकी है जो मेट्रो चैनल पर आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व दिखाई गई थी जब मेट्रो चैनल नया-नया आरंभ ही हुआ था।

‘कुमुदिनी का फूल’ लघुकथा में माँ-बाप अपने बच्चों के लिए अपना सुख, अपनी शान्ति यहाँ तक कि अपना पूरा जीवन वार देते हैं परन्तु बच्चे अक्सर उनका यह बलिदान उनका कर्तव्य समझकर बहुत आसानी से भुला देते हैं। यदि कोई बच्चा बड़े होकर अपने माँ-बाप द्वारा किया त्याग याद रखे एवं उन्हें ज़रा सा भी सुख दे सके तो वे फूले नहीं समाते और अपने आशीर्वचनों से उनका जीवन धन्य कर देते हैं। किसी औलाद के लिए इस उपलब्धि से बड़ी शायद कोई और उपलब्धि नहीं हो सकती।

अपने नवविवाहित बेटे-बहू के हनीमून पर जाने के पश्चात एक माँ अपने अतीत में गोते लगाने लगती है। वह याद करती है कि किस प्रकार वह भी अपने पति के साथ हनीमून के लिए गई थी। यह ख़याल उसके मन में आज भी गुदगुदी पैदा कर देता है,परन्तु शादी के डेढ़ वर्ष बाद ही जब उसका बेटा छह माह का था, उसके पति की मृत्यु हो गई थी। बेटे के किशोरावस्था पर पहुँचते-पहुँचते उसके घर-परिवार ने उसके पुनर्विवाह के लिए बहुत ज़ोर डाला था मगर पुत्र का भविष्य अन्धकारमय न हो जाए, इस डर से वह राज़ी न हुई थी। वह अपने पुत्र  को अपने पैरों पर खड़ा करके अच्छा इन्सान बनाना चाहती थी और यह बात उसके पुत्र को भलीभाँति पता थी। यही नहीं, पति की मृत्यु के पश्चात पति के ही कार्यालय में उसे नौकरी मिलने के बाद उसका एक सहकर्मी रवीन्द्र भी भावना के स्तर पर उसकी तरफ़ आकर्षित हुआ था और धीरे-धीरे दोनों में प्रेम हो गया था;  परन्तु उनका प्रेम सदैव ही एक मर्यादा में सीमित रहा था। उसका सहकर्मी कभी उसके दायित्व में आड़े नहीं आया था और उसने अविवाहित रहकर उसकी प्रतीक्षा की थी। अब जब वह अपने दायित्व को पूरा कर चुकी थी, तो तरह-तरह के विचार उसके मन में आ रहे थे-क्या अब उसका विवाह करना ठीक होगा? उम्र के इस मोड़ पर आकर क्या अब वह उसे कोई सुख दे पाएगी? ये समाज, घर वाले, और सबसे अधिक उसके पुत्र एवं बहू, उसके बारे में क्या सोचेंगे ? इत्यादि। किन्तु फिर भी, उसने सोच लिया कि अपने मन की बात वह अपने पुत्र व बहू से अवश्य करेगी। उसके बेटा व बहू वापस आते हैं और बेटा अपनी माँ का मानसिक द्वन्द्व समझकर उससे उसके खोये-खोये रहने का कारण पूछता है। यही पर यह पता चलता है कि केवल माँ ही नहीं बल्कि पुत्र को अपनी माँ से उतना ही लगाव है, उसकी उतनी ही चिंता है जो वह अपनी माँ के मन में चल रही उथल-पुथल को समझ पाया है। उत्तर में माँ कहती है कि “वह डरती है, उसे खोना नहीं चाहती, इसलिए कहने से डर रही है, संकोच कर रही है।“ बेटे के कसम देने पर वह ‘रवीन्द्र अंकल’ का ज़िक्र करती है ,तो बेटा तुरंत उसकी बात काटकर कहता है कि “वह अब बच्चा नहीं रहा, सब समझता है। उसके (माँ के) त्याग एवं संघर्ष ने उसे समय से पूर्व ही सारी दुनियादारी समझा दी है। वह यह भी कहता है कि उसने एवं उसकी पत्नी ने रवीन्द्र अंकल से बात भी कर ली है। अब बस उसी की स्वीकृति बाकी है, जिस दिन चाहे कोर्ट में चलकर वे दोनों भी शादी कर सकते हैं।“ उसकी इस बात पर माँ आश्चर्यचकित रह जाती है और उसका माथा चूम लेती है।

एक स्त्री सदैव ही अपनों की ख़ातिर अपनी इच्छाओं को मार लेती है परन्तु उसे कभी उसका कोई क्रेडिट नहीं मिलता। यहाँ बेटे ने अपनी माँ के त्याग को समझा, माना और उसकी इच्छाओं का आदर करते हुए अपना कर्तव्य जिस तरह से निभाया वह अनुकरणीय है। ‘कुमुदिनी का फूल’ संध्या में खिलता है। अतः यह प्रतीकात्मक शीर्षक कलात्मक दृष्टि से इस लघुकथा को अपेक्षाकृत पर्याप्त ऊँचाई प्रदान कर जाता है।

‘नई पीढ़ी’ एवं ‘चूक’ लघुकथाओं में यह स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया गया है कि रिश्ते अनमोल होते हैं। छोटी-छोटी बातों को मन पर लगाने से बचना चाहिए अन्यथा ऐसी गाँठ बन जाती है कि जीवन भर खुल नहीं पाती और यह बात भी अपनी जगह उतनी ही महत्त्वपूर्ण है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। अतः इस बात का ख़याल रिश्ता निभाने वाले दोनों पक्षों को रखना चाहिए।

हमारे जीवन में सब रिश्तों से ऊपर होता माता-पिता एवं सन्तान के बीच का रिश्ता ! इस ईश्वरीय रिश्ते में स्वार्थ नहीं होता ! माता-पिता कई कष्टों को सहकर अपनी सन्तान का पालन-पोषण करते हैं और बदले में केवल अपने हिस्से का सम्मान चाहते हैं। यदि सन्तान उन्हें वही न दे पाए तो फिर उन माता-पिता की स्थिति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हो जाती है। लघुकथा ‘नई पीढ़ी’ एवं ‘चूक’ कुछ ऐसी ही शोचनीय एवं दुखद परिस्थितियों को दर्शाती हैं।

 नई पीढ़ी में अपने बेटे के विवाह के पश्चात पहली बार अपने बेटे-बहू (राजेश और पल्ल्वी) के घर गए पिताजी हरीश ,पहले तो सजा-सँवरा घर देखकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। बेटे-बहू का प्रफुल्लित चेहरों वाले युगल छाया -चित्र देखकर भी उन्हें बहुत अच्छा लगता है। उसे देखकर

उन्हें अपने एवं अपनी पत्नी के चित्र का ध्यान आता है, क्योंकि ठीक उसी जगह पर पहले उनका एवं उनकी पत्नी का युगल छाया-चित्र टँगा हुआ था, जिसे उनका बेटा यह कहकर लाया होता है कि वह उनके आशीर्वाद स्वरूप उनके चित्र को अपने घर में लगाएगा। परन्तु उनके बहुत ढूँढ़ने पर भी उन्हें अपना युगल चित्र घर में कहीं भी और नहीं दिखाई देता। उन्हें अपने इकलौते बेटे पर अत्यधिक विश्वास होता है क्योंकि उनके लिए वह बिलकुल श्रवण कुमार जैसा है तथा उसने उनको अभी तक कभी कोई शिकायत का मौका नहीं दिया था और उन्होंने भी उसे बड़े ही लाड़-प्यार से पाला होता है।  वे सोचते हैं कि अवश्य ही उनके बेटे ने अपने माता-पिता का चित्र मन्दिर में रखा होगा। परन्तु उनके हाथ निराशा ही लगती है क्योंकि मन्दिर तो उसके घर में था ही नहीं। वे अपने बेटे से उस चित्र के बारे में पूछते हैं ,उसके जवाब से ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी फ़ोटो के वहाँ से हटने के पीछे उनकी बहू पल्लवी की  भी इच्छा है। वे तब व्यंग्यपूर्वक उससे पूछते हैं कि उनका वह फ़ोटो है कहाँ ?वह बताता है कि वह एलबम में लगा है। वे एलबम मँगा कर देखते हैं तो उसमें पहले तो बेटे-बहू के चित्र लगे होते हैं, उसके बाद बहू के घर वालों और बेटे के मित्रों के चित्र लगे दिखाई देते हैं। एलबम के एकदम अन्त में उन्हें अपना युगल चित्र मुड़ा हुआ पड़ा मिलता है। यह देखकर वे स्वयं को बहुत अपमानित महसूस करते हैं और दुखी होते हैं।  वे अपना एवं अपनी पत्नी का वह युगल फ़ोटो निकालकर अपने बैग में रखते हैं बेटे को बुलाकर कहते हैं उन्हें घर लौटना है। बेटा उनसे पूछता है कि वे क्यों अभी लौट रहे हैं, वे तो कुछ दिनों के लिए वहाँ रहने के लिए आए थे? वह यह भी पूछता है कि क्या उन लोगों द्वारा उनके स्वागत-भाव में कहीं कोई चूक हो गई? इस पर वे कहते हैं कि “नहीं, बल्कि शायद उन्हीं लोगों  (माता-पिता )से कोई चूक हो गई है।” और यह सोचते हुए वापस चल पड़ते हैं कि “अजीब दुनिया है, यहाँ बच्चे जीते जी तो माता-पिता का फ़ोटो नहीं लगाते हैं, और उनकी मृत्यु के बाद ज़रूर उनकी फ़ोटो पर माला चढ़ा देते हैं।”

परन्तु यही विडम्बना है हमारे आज के विकसित होते समाज की-न बच्चे अपनी लापरवाही को सम्भालने की कोशिश करके उसके लिए क्षमा माँगते हैं, न ही बड़े थोड़ा धैर्य और समझदारी दिखाकर उन्हें सम्भलने का समय देते हैं। धीरज की कमी दोनों पीढ़ियों के टकराव को बेवजह तूल दे रही है और यही कारण है कि आज परिवारों का विघटन बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है, जो कि अत्यन्त दुखद एवं शोचनीय है। कभी-कभी सन्तान अपने माता-पिता से कोई ऐसी चुभती हुई बात कह देती है कि माता-पिता भौंचक्के रह जाते हैं और इस हद तक आहत हो जाते हैं कि उन्हें कोई उत्तर ही नहीं सूझता। वे यही नहीं समझ पाते कि उनके दिए संस्कारों में क्या कमी रह गई थी, जो आज उनकी सन्तान, जिसके लिए उन्होंने अनगिनत कष्ट सहे, अपना जीवन तक वार दिया, उनसे इस तरह का व्यवहार कर रही है। यही ‘चूक’ लघुकथा का कथ्य है।

‘चूक’- इस लघुकथा की सन्तान, चिन्तन बाबू का बेटा अभिनन्दन, घर में कोचिंग चलाने के लिए कमरे बनवाना चाहता है, वो भी मुख्य-द्वार पर। उसको ऐसा लगता है कि उस जगह कमरे बनने से छात्र-छात्राओं का ध्यान अधिक जाएगा और तभी कोचिंग का काम तरक़्क़ी करेगा। चिन्तन बाबू कहते हैं कि यदि पढाई अच्छी होगी तो पढ़ने को इच्छुक बच्चे सुदूर जंगलों में चले जाते हैं। उसके लिए उसे अपनेआप में वो बात पैदा करनी होगी। वे उसे उस स्थान के बजाय घर के अन्दर की तरफ खाली पड़ी जगह में कमरे बनवाने का सुझाव देते हैं क्योंकि उस जगह कमरे बनने से, उनके इतने चाव से बनाए गए घर के ‘भव्य मुख्यद्वार’ की शोभा बिगड़ जाएगी। इस पर अभिनन्दन उनसे कहता है कि “वे सठिया गए हैं!” और यहाँ तक कह देता है कि “यदि वे उसके रास्ते में आए तो वह उन्हें जान से मार देगा।” उसकी कही इस बात से  चिन्तन बाबू  के ह्रदय पर बहुत चोट पहुँचती है  और वे रात भर सो नहीं पाते। वे सोचते लगते हैं कि उन्होंने ऐसा क्या कह दिया जो बेटे ने उन को इतनी बड़ी बात कह दी! उनकी पत्नी उनको समझाती है कि वे नाहक परेशान न हों। बचपन से लेकर अभी तक उन्होंने अपने बेटे की हर इच्छा पूरी की है। वह आज का  युवा है, क्रोधवश ऐसा कह गया होगा वगैरह, वगैरह।

यह बात चिन्तन बाबू को एहसास दिलाती है कि क्योंकि उन्होंने बचपन से आज तक, बेटे की हर बात मानी है, उसकी हरेक इच्छा पूरी की है, शायद इसीलिए आज वह इस तरह अपनी बात पूरी करवा रहा है। शायद यही उनकी ग़लती थी और अब इसका ख़ामियाज़ा तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा। तभी उन्हें अभिनन्दन को अपने बेटे से बात करते देख उसके भविष्य का आभास होता है। उनका पौत्र अपने पिता यानि अभिनन्दन से साइकिल के लिए ज़िद कर रहा होता है, और गुस्सा होकर कह रहा होता है कि “यदि आज वो उसके लिए साइकिल नहीं लाए तो वह उनसे बात नहीं करेगा।” उत्तर में अभिनन्दन अपने बेटे से कहता है कि, “ऐसा नहीं कहते, वह आज अवश्य ही उसे साइकिल लाकर देगा।” अभिनन्दन बाबू को अपने बेटे के बचपन और अपनी युवावस्था के दिन याद आ जाते हैं।

इस लघुकथा को पढ़ते ही दिमाग़ में  ‘? ? ?’ कौंधता है! ‘ये क्या? कैसे? क्यों?’ क्या आज की पीढ़ी इस क़दर भटक गई है कि वह अपने पिता से, जन्मदाता से, उनसे, जिनके लिए उसका रोम-रोम ऋणी है, इस तरह की बात कह सकती है। वह भी उसी के बनाए घर में खड़े होकर, कुछ कमरों के लिए। ख़ैर, वजह कोई भी हो, इस तरह से बदतमीज़ी की अपेक्षा किसी भी बेटे से कोई भी पिता नहीं कर सकता। मगर ऐसा हो रहा है! घर-परिवारों में बड़े-छोटे का लिहाज़ ख़त्म होने की कगार पर है। हर पिता चाहता है कि उसका बेटा आगे बढ़े, ऊँचा उठे और इसलिए यदि वह कभी अपने बेटे से कोई कठोर बात कह दे जैसा कि चिन्तन बाबू ने कहा कि ‘अपने में वो बात पैदा करो!’ तो अभिनन्दन को यह बात समझनी चाहिए,थोड़ा धैर्य रखना चाहिए, न कि अपने पिता से अपशब्द बोलने चाहिए।

साथ ही लेखक ने बहुत ही ख़ूबसूरती से अभिनन्दन के भविष्य का भी आभास देकर इस लघुकथा में ‘पोएटिक जस्टिस’ कर दिया। परसीव  करने के मामले में बच्चे बहुत समझदार होते हैं। अपने आसपास घटती छोटी-छोटी बातें, बड़ों का आचरण, व्यवहार सबकुछ वे बड़े ध्यान से देखते और ग्रहण करते हैं। आगे चलकर वे भी वैसे ही व्यवहार करते हैं। अभिनन्दन का बेटा भी उसी के क़दमों पर चल रहा था। वही उसको इस बदसलूकी का एहसास करवाएगा।

परन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम अपने बच्चों को जो संस्कार देते हैं, वे उसका उल्टा ही करते हैं। जैसा कि चिन्तन बाबू को लगा कि उन्होंने अभिनन्दन को ऐसे संस्कार तो दिए नहीं, फिर उसने ऐसा व्यवहार क्यों किया उनसे ! शायद उस बेटे के मन में अपने पिता को लेकर बहुत कटुता भरी होगी, जिसके फलस्वरूप उसने अपने पिता से ऐसे कड़वे बोल बोले। यह कटुता चाहे उसकी ख़राब संगत से आई होगी ,या दिलो-दिमाग़ में छाई कोई असन्तुष्टि, या फिर कोई ऐसा घाव उसके मन में होगा जिसकी ख़बर शायद उसके पिता को भी नहीं थी।

अन्त में, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अधिक लाड़-प्यार तथा बच्चों की हर इच्छा पूरी करने का फल यह होता है कि बच्चों में ‘धीरज’ और ‘सन्तुष्टि’ नाम की चीज़ ही नहीं बचती। आज की युवा पीढ़ी किसी बात के लिए ‘न’ सुनना ही नहीं चाहती -इसका असर माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार के रूप में ही नहीं वरन आए दिन अख़बारों में भी देखने-पढ़ने को मिलता है कि ‘फलाँ लड़की के ”न” कहने पर फलाँ लड़के ने उसपर तेज़ाब फेंक दिया।‘

‘जीवन-संघर्ष’ लघुकथा में यह कहा गया है कि जीवन एवं मनुष्य का मन नित नए संघर्षों से जूझता है। इसका सामना करने में यदि आपका जीवन-साथी आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है तो आप उनका सामना आसानी से कर सकते हैं और विजयी भी हो सकते हैं। लघुकथा ‘जीवन-संघर्ष’ व ‘मन के अक्स’ में कुछ ऐसे ही भाव हैं। जीवन-संघर्ष –जीवन-संघर्ष का नायक एक आदर्श विचारों वाला लेखक है, जिसकी क़लम ग़लत तरीक़े से काम-धंधा करने वालों का विरोध करने से नहीं चूकती। वह मकान ढूँढ रहा है परन्तु कम पैसे में अच्छा मकान मिल नहीं पा रहा। उसकी पत्नी यह बात भलीभाँति समझती है; परन्तु उसकी अपनी बहनें एवं बहनोई यह बात नहीं समझते और उसकी पीठ पीछे आपस में व उसकी पत्नी के सामने उसको ताने-उलाहने देते हैं। उनके अनुसार केवल लेखन से किसी का कुछ भला नहीं होने वाला बल्कि उसे कोई ‘जुगाड़’ लगाकर पैसे का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए। नायक बाथरूम में नहाते-नहाते सबकी बातें सुनता है और क्रोध, ईर्ष्या व गुस्से में भरा अपने बदन पर रगड़-रगड़ कर कुछ इस तरह साबुन मलता है मानों ‘ग़रीबी का मैल छुड़ाने हेतु संघर्ष’ कर रहा हो। साथ ही साथ वह अपने दोनों बहनोइयों को भी कोसता जाता है। तभी उसकी पत्नी उन सभी को अपने जवाब से चुप करा देती है कि ‘हर आदमी की अपनी समस्याएँ होती हैं, कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं, जिनका सामना करके राह निकालना तथा, जिन्हें निभाना आवश्यक होता है।’ वह कहती है कि ‘उसे अपने पति पर पूर्ण विश्वास एवं गर्व है कि वे हालात का सामना करके अपनी सभी ज़िम्मेदारियों  निभाते हैं न कि पलायन कर जाते हैं। उन्हें भले ही मंज़िल देर से मिलेगी पर मिलेगी ज़रूर !’ जहाँ उसकी पत्नी की यह बात सुनकर सबके मुँह पर जैसे ‘ताले’ पड़ जाते हैं, वहीं नायक का चेहरा ‘खिल उठता है!’

यह बिलकुल सही बात है कि समय बुरा हो तो हमारे अपने लहू के सम्बन्ध भी कमज़ोर पड़ने लगते हैं। अपने भाई-बहन भी कमियाँ निकालने से नहीं चूकते। शरीफ़ इंसान ऐसी स्थिति में चुप रहकर अपमान का घूँट पी लेता है जिससे कि आपसी सम्बन्ध न बिगडें, या फिर इस नायक की तरह बाथरूम में अपने ऊपर साबुन घिसकर और मगों पानी डालकर भुनभुनाता रहता है। यह उसकी मानसिक प्रतिक्रिया भी है,जबकि सही यही होता है कि ऐसे रिश्तेदारों को अपनी मर्यादा में रहकर जवाब देना बहुत आवश्यक होता है, जैसा कि उसकी समझदार पत्नी ने किया। उसने एक सही बात कहकर अपने पति के स्वाभिमान की रक्षा बड़ी अक़्लमन्दी से की और अपने पति की निगाह में ऊँची उठ गई। इस लघुकथा की श्रेष्ठता इसके शीर्षक के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप में नायक का बाथरूम में नहाते समय पानी, मग, साबुन आदि का उपयोग एवं हाव-भाव का प्रत्यक्षीकरण है। मेरी दृष्टि में हिन्दी लघुकथा में यह लघुकथा पांक्तेय श्रेणी की लघुकथा है जिसकी अवहेलना संभव नहीं है।

‘आत्मिक बंधन’ लघुकथा यह बताती है कि भारतीय पत्नी कितनी भी संकोची क्यों न हो, अपने पति के प्रति अधिकारपूर्वक स्नेह जताने में कभी पीछे नहीं हटती और पति भी ऐसी पत्नी पाकर गौरवान्वित महसूस करता है। लघुकथा ‘आत्मिक बन्धन’ एक ऐसे ही बुज़ुर्ग दम्पत्ति के बारे में हैं। उत्तर एवं पूर्व भारत की शीत लहर से कौन न वाक़िफ़ होगा भला ! ऐसे में ये दम्पत्ति यानी योगेश्वर बाबू एवं उनकी पत्नी, जिनके बच्चों ने अपनी अलग दुनिया बसा ली है, एक-दूजे का सहारा बन अपना जीवन काट रहे हैं। हाड़ कँपाने वाले मौसम में, जबकि नगर में जगह-जगह अलाव जलते दीख रहे हैं, इनके पास एक-एक रज़ाई के अतिरिक्त केवल एक कम्बल भर और है। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे को वह कम्बल ओढ़ाने में लगे हुए हैं। दोनों को पता है कि किसी एक को तो इस रात में यह भयानक ठण्ड सहनी ही पड़ेगी मगर वे स्वयं कष्ट सहकर दूसरे को ठण्ड से बचाना चाहते हैं। पत्नी अपनी अधिकार-भरी डाँट पति को लगाने में सफल होती है और वह ज़िद करके योगेश्वर जी को वह कम्बल ओढ़ा देती है। उस समय तो वे मान जाते हैं परन्तु पत्नी के सोने के बाद वे चुपचाप वह कम्बल ,ठण्ड से दोहरी हुई जा रही पत्नी को ओढ़ा देते हैं। परन्तु सुबह जब उनकी आँख खुलती है तो वे उस कम्बल को फिर स्वयं की रज़ाई पर ही पाते हैं।

पति-पत्नी का सम्बन्ध ही एक ऐसा सम्बन्ध है जो जीवन के अन्त तक साथ निभाता है। यह एक दैवीय एवं आत्मिक सम्बन्ध है। यह लघुकथा अपने शीर्षक के साथ न्याय करती हुई, इस छोटी सी घटना से यह सत्य उजागर करने में अत्यन्त सफल है। संवेदना इस लघुकथा की अन्यतम विशिष्टता है।

‘बीती विभावरी’ लघुकथा का कथ्य यह है कि जब तक जब तक काम-धन्धा चलता रहता है, इन्सान का तन-मन एक नियम के अन्तर्गत ढलकर चलता रहता है। उसके उठने-बैठने -खाने-पीने-सोने का एक निश्चित समय बन जाता है। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर -बस यही उसकी ज़िन्दगी होती है। यदि परिवार है तो दफ़्तर के बाद का समय उसके हिसाब से बीत जाता है। ‘बीती विभावरी’ की नायिका जब अवकाश ग्रहण करने बाद अपने ‘विदाई समारोह’ से वापस लौटती है तो वह चिन्ता में डूब जाती है। अपने भाई-बहनों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते वह अपने पति से अलग हो चुकी थी; क्योंकि उसके पति उसे अपने साथ रखना चाहते थे, जो वह नहीं कर सकी थी। अब तक का जीवन उसने अपने काम में व्यस्त रहकर तथा अपने भाई-बहनों को व्यवस्थित करने में बिता दिया था परन्तु अब अवकाशप्राप्ति के पश्चात उसके पास एक नौकरानी के सिवा और कोई नहीं था और इसी बात से वह बहुत उदास थी कि तभी फ़ोन की घण्टी बजती है। फ़ोन उसके पति ने किया होता है, यह बताने के लिए अब चूँकि उसकी सभी ज़िम्मेदारियाँ ख़त्म हो चुकी हैं और वह रिटायर भी हो चुकी है, इसलिए अब उसको सच्चे मायने में एक साथी की आवश्यकता होगी। यह सुनकर वह बहुत भावुक हो उठती है तथा उसकी सारी उदासी भाग जाती है। यह लघुकथा इस बात का एक सच्चा उदाहरण है कि सही मायनों में सच्चे जीवनसाथी का क्या स्वरूप होता है! वह उस समय आपका साथ देता है जब दुनिया में आप अकेले होते हैं, कोई रिश्ता आपका साथ निभाने को खड़ा नहीं होता है। ऐसे समय में वह आपके जीवन के अँधेरों को अपनी उपस्थिति के उजालों से भर देता है। पति-पत्नी के बीच प्रेम का अर्थ सिर्फ़ साथ रहना ही नहीं होता अपितु दूर रहकर भी अपनी पत्नी की खोजख़बर रखना एवं उदासी के पलों में अपने साथ से उसके दामन में खुशियाँ भर देना होता है।

इस संवेदनात्मक लघुकथा में मर्करी को बुझाना और फिर जलाना नायिका के हाव-भाव को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। लेखक की यह कलात्मकता इस लघुकथा की अतिरिक्त विशेषता है। इस तरह के प्रयोग में पुष्करणा जी अपने समकालीनों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।

‘निष्ठा’ लघुकथा में सफलतापूर्वक यह स्पष्ट किया गया है कि स्त्री, चाहे माँ हो या बेटी, या फिर बहन या पत्नी -बहुत भावुक होती है। वह जब किसी के लिए कुछ करती है तो पूर्ण समर्पण भाव से करती है। उसमें यदि कोई कमी रह जाती है, तो वह स्वयं को धिक्कारने से भी नहीं चूकती। और फिर पति-पत्नी का तो सम्बन्ध ही स्नेह, समर्पण व विश्वास पर टिका होता है। परन्तु पुरुष के बारे में सर्वदा ऐसा कहना मुश्किल है। यही कारण है कि एक पत्नी को सदैव ही चौकन्ना रहने की सलाह दी जाती है, जहाँ तक उसके पति के आचरण की बात है। शायद इसीलिए पत्नियाँ स्वयं को अक्सर असुरक्षित महसूस करती हैं। यदि पत्नी को ऐसा लगता है कि वह अपना पत्नी-धर्म सुचारु रूप से नहीं निभा पा रही है, कारण चाहे स्वाभाविक या यथार्थ (जेन्युइन) ही क्यों न हो तो भी वह हीनभावना से ग्रस्त हो जाती है और दुखी होती है। इसपर यदि पति का सहयोग एवं आपसी समझ नहीं मिले तो उसे अवसादग्रस्त होने में भी समय नहीं लगता और इसके घातक एवं भयंकर परिणाम होते हैं। परन्तु सौभाग्यवश ‘निष्ठा’ लघुकथा का पति ऐसा बिल्कुल नहीं है और पत्नी निशा इस मामले बहुत भाग्यशाली है।

निशा का कोई ऑपरेशन हुआ है, जिसके बाद उसे डॉक्टर ने उसके पति के साथ एक ही शय्या पर सोने से मना किया है, इस कारण से उसे ऐसा महसूस होने लगता है कि वह अपना पत्नी धर्म नहीं निभा पा रही है और उसके कारण उसके पति को कष्ट एवं तनाव झेलना पड़ता है। टी. वी. पर एक फिल्म देखने के दौरान वह उदास हो जाती है और अपने पति से प्रश्न कर बैठती है कि उसे डर है कि उस फिल्म में जैसा दिखाया गया है, वैसे ही उसके पति भी उसकी जगह किसी और को न दे दें। जिसपर उसका पति उसे समझाता है कि पति-पत्नी का धर्म केवल वंश-वृद्धि करना होता है, जिसमें निशा ने पूरा सहयोग दिया। और अब वे प्रौढ़ावस्था पर पहुँच गए हैं जहाँ तक पहुँचते-पहुँचते पति-पत्नी का सम्बन्ध एक-दूसरे से जुड़ी दूसरी बातों से अधिक प्रगाढ़ होता है जैसे कि बच्चों को दिशा-निर्देश देना व आपसी समझ से अन्य कई बातों पर ध्यान देना। इस अवस्था तक आकर तृप्ति या अतृप्ति जैसी बातें कोई महत्त्व नहीं रखतीं। उसके लिए इतना ही पर्याप्त है कि निशा अब रोगमुक्त है, स्वस्थ है। निशा अपने पति के मुँह से ऐसी बात तथा उसकी आँखों में अपने प्रति सच्चाई व ईमानदारी की चमक देखकर भावुक हो उठती है और उसके सीने से जा चिपकती है और दोनों पुनः टी. वी. देखने लगते हैं। निशा के मन में पनपती असुरक्षा की भावना को वहीँ कुचलकर उसका पति न केवल उसकी निगाह में बहुत ऊपर उठ गया बल्कि उसने अपनी समझदारी से अपने परिवार को बिखरने से बचा लिया। ‘निष्ठा’ शीर्षक इस लघुकथा हेतु एकदम सटीक है।

संवेदना का चरम स्पर्श करती लघुकथा ‘श्रद्धांजलि’ में यह कहने का सदप्रयास किया गया है कि किसी भी लेखक या लेखिका की रचनाएँ उसके अपने जीवन एवं उनके आसपास घटी हुई घटनाओं से अछूती नहीं रह पातीं। एक सच्चा और अच्छा साहित्यकार सहज रूप से अपने जीवन एवं रचनाओं में सन्तुलन बनाकर चलता है। आवश्यक यह होता है कि उसके अपने उसे कितना समझ पाते हैं, अपना पाते हैं या सराह पाते हैं। वास्तव में देखा जाए तो यही उसकी पूँजी होती है।

स्व. राधे मोहन की पत्नी एक अध्यापिका है, जो अपनी कक्षा में उनकी लिखी कहानी ‘समर्पण’ पढ़ाने जा रही होती है। वह बच्चों से कहती है कि उनकी या किसी भी साहित्यकार की कहानी अथवा कोई भी रचना, बिना उसके जीवन के बारे में जाने हुए नहीं समझी सकती। वह बताती हैं, कि इस कहानी में नायक अपनी पत्नी तथा साहित्य के प्रति इस प्रकार समर्पित है कि उस समर्पण की अभिव्यक्ति को शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। उनको अपने ऊपर ग्लानि होती है कि उनके जीवित रहते वे कभी उनके अपने प्रति प्रेम व समर्पण को नहीं समझ पाईं। यहाँ तक कि एक बार ट्रेन से कहीं जाते वक़्त किसी के पूछने पर कि उनके पति क्या करते हैं, उन्होंने बड़ी ही उदासीनता से ये कह दिया था कि वे कुछ लिखते-पढ़ते हैं। आज अपनी कक्षा में उनकी कहानी ‘समर्पण’, जो वे उनके जीवित रहते कभी समझ ही न पाईं थीं, का स्मरण हो आया और वे पढ़ाते-पढ़ाते अभिभूत हो गईं थीं। एक छात्रा के यह पूछने पर कि क्या वे उनको जानती हैं, उनकी आँखों से आँसू टपक पड़ते हैं, और वे गर्व से कहती हैं, ‘हाँ! वे मेरे पति थे!’ और इस प्रकार उन्होंने एक शिक्षिका एवं पत्नी के रूप में अपनी मौन कक्षा के साथ मिलकर अपने पति को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इसी प्रकार की पुष्करणा जी की एक और संवेदनापरक लघुकथा है जो पारिवारिक भी है और सामान्य बाल-मनोविज्ञान से भी जुड़ी है। इस लघुकथा का शीर्षक ‘अन्तश्चेतना’ है। खेल-मनोरन्जन की सामग्री को देखकर अक्सर बच्चे लोभ-संवरण नहीं कर पाते हैं और कभी-कभी न चाहते हुए भी कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिसे उनकी अन्तश्चेतना स्वीकार नहीं कर पाती तथा बाद में वे बहुत शर्मिन्दा होते हैं और पश्चाताप करते हैं। इस लघुकथा के नायक अभिषेक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ ,जब नैतिक शिक्षा की कक्षा में उसने माता-पिता के अपने बच्चों पर किये गए उपकार के बारे अपने शिक्षक से सुना। शिक्षक बता रहे थे कि हमें माता-पिता का आभारी होना चाहिए, विशेषकर माता का, क्योकि वह हमें जन्म देती है एवं हमारी प्राथमिक शिक्षा का श्रीगणेश करती है। यूँ तो अभिषेक बहुत ही मेधावी छात्र था और इसीलिए हर शिक्षक का प्रिय था परन्तु उस दिन उसने पतंग-डोर ख़रीदने के लालच में अपनी माँ का सोने का झुमका चुरा लिया था। अब कक्षा में माता-पिता के उपकारों के बारे में पढ़कर उसे अपनी भूल का एहसास हो रहा था और अपनी इस हरक़त पर उसे बेहद ग्लानि हो रही थी। वह एक सम्वेदनशील बालक था, जिसे यह सोच बार-बार सता रही थी कि सोने का झुमका न मिलने पर माँ को पिता जी से कितनी डाँट पड़ रही होगी। वह इतना दुखी हो गया कि उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। तभी उसके साथ बैठे छात्र ने उसके रोने की बात शिक्षक से कही। शिक्षक के  प्यार से बहुत समझाने-बुझाने, दिलासा देने पर कक्षा-समाप्ति के बाद अलग से पूछने पर उसने उन्हें बताया कि उसने पतंग-डोर ख़रीदने की ग़रज़ से माँ का यह झुमका चोरी कर लिया और तभी से वह परेशान है। तिस पर कक्षा में माता-पिता के बारे में पढ़ाये जाने से उसका मन ग्लानि से भर गया है और उसे अपनी माँ का परेशान -रोता हुआ चेहरा नज़र आ रहा है। इस पर शिक्षक उससे कहते हैं वह मेधावी ही नहीं एक समझदार और बहादुर बालक है और आज से उनके हृदय में  प्यार और भी बढ़ गया है। वे उसको उनके साथ उसके घर चलने को कहते हैं।

ग़लती सदैव क्षमायोग्य होती है जो किसी से भी हो सकती है परंतु यदि समय रहते उसका पश्चाताप कर लिया जाए तो आगे के लिए बात सम्भल सकती है। यही नहीं, समझने के लिए इस लघुकथा जैसे  शिक्षक का होना भी आवश्यक है, जिन्होंने अभिषेक की बात का मर्म समझा और उसका पक्ष उसके माता-पिता के समक्ष रखने को स्वयं तैयार हो गए। उनके इस समझदारी वाले क़दम से अभिषेक का भविष्य बर्बाद होने से बच गया।

इस लघुकथा में सीख केवल बच्चों के लिए ही नहीं है बल्कि शिक्षकों के लिए भी है, कैसे उन्हें अपने विद्यार्थियों के साथ समझदारी वाला रवैया अपनाना चाहिए। विवरणात्मक शिल्प में सृजित यह एक महत्त्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ लघुकथा है जिसका ‘अन्तश्चेतना’ शीर्षक भी लघुकथा के साथ पूरा-पूरा न्याय करता है।

‘अपनी-अपनी विवशता’ भी पारिवारिक लघुकथा तो है ही, किन्तु इसी के साथ-साथ इसमें यौन मनोविज्ञान भी है। एक पति जो लंबे अंतराल के बाद घर आता है किन्तु यह सुबह का समय है। घर-परिवार एवं बच्चों को देखते हुए पत्नी पति को देख-देखकर मुस्कुराती तो है किन्तु लोक-लाज इसके आड़े आती है। पति की आँखों में अपने प्रति उमड़ते प्रेम को पढ़ लेती है। और पति भी पत्नी की विवशता को भली-भाँति समझ रहा है किन्तु बायोलॉजिकल आवश्यकता उसे विवश किए हुए है। इस लघुकथा की विशेषता इसकी स्वाभाविकता एवं सटीक प्रस्तुति या बीच-बीच में छोटी-छोटी स्थितियाँ या चित्र कह लीजिए लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में सहायक हैं। ‘अपनी-अपनी विवशता’ इसका एकदम सटीक शीर्षक है।

‘झूठा अहम्’ एक आमफ़हम पारिवारिक कथा है किन्तु संवाद-शिल्प में ढली यह लघुकथा भी अपनी स्वाभाविकता एवं स्वाभाविक संवेदना के कारण हृदय स्पर्श कर लेती है। स्वाभाविकता एवं संवाद-शैली की प्रस्तुति डॉ. पुष्करणा की अपनी ख़ास विशेषता है जो उनको अपने समकालीन लघुकथा-लेखकों से अलग एवं विशिष्ट पहचान दिलाती है। पति अपने मित्रों के साथ साहित्यिक वार्तालाप में व्यस्त हैं। पत्नी के बुलाने पर भी वह साहित्यिक शिष्टाचार के कारण पत्नी के पास नहीं जा पाते। किन्तु मित्रों से जब फुरसत पाते हैं, तब पत्नी के पास जाते हैं तो पत्नी मुँह फुलाए मिलती है। पति उसे मनाना चाहते हैं किन्तु वह अपने झूठे अहम् में है। पति भी एक स्थिति में आकर सोचता है, अब मैं भी बात नहीं करूँगा किन्तु अब पत्नी सोचती है कि यदि अब एक बार भी ये बुला लें तो झंझट ख़त्म।

उधर पत्नी खाना बना रही है, इधर बनते भोजन की सुगंध से पति की भूख बढ़ती जा रही है। इस स्थिति को डॉ. पुष्करणा ने बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है और यहीं फिर उनके सृजन का लोहा मानना पड़ता है। अंततः दोनों का झूठा अहम् हवा हो जाता है। सुंदर शीर्षक और रोज़मर्रा घटित होने वाली विषयवस्तु, किन्तु इसे शायद कभी किसी लघुकथाकार ने अपनी लघुकथा का विषय नहीं बनाया। डॉ. पुष्करणा के विषय प्रायः अनछुए होते हैं जिनकी सराहना करनी पड़ती है।

‘विश्वास’ लघुकथा पत्नी के प्रति विश्वास की सुंदर लघुकथा है। पति पत्नी को लाइलाज बीमारी से मुक्ति दिलाने हेतु ज़हर देकर उसके असाध्य कष्ट से उसे मुक्ति दिलाना चाहता है।

“इतना इलाज करवा चुके हो! कोई दवा असर तो करती नहीं, क्या फायदा!” पति कहता है, “इस बार ऐसी दवा लाया हूँ, जो तुम्हें सारे दुख-दर्द से मुक्ति दिला देगी।“ पत्नी कहती है, “तुम मानोगे नहीं। अब तुम ज़हर भी दे दोगे तो पी लूँगी।“ इतना सुनते ही मनोवैज्ञानिक ढंग से पति के हाथ से जहर की शीशी गिरकर चूर-चूर हो जाती है। दवा की शीशी टूटना समाज में शुभ लक्षण माना जाता है मरीज़ के लिए। दूसरी तरफ़ ‘विश्वास’ शब्द की पूरी लघुकथा में कहीं भी चर्चा नहीं हुई है फिर भी इसका शीर्षक ‘विश्वास’ रखा गया है। वस्तुतः इसका दूसरा शीर्षक संभव ही नहीं था। लघुकथाओं के शीर्षक देने में डॉ. पुष्करणा मर्मज्ञ हैं। इसी कारण यह लघुकथा श्रेष्ठता का शिखर छू लेती है।

‘बेबसी’ डॉ. पुष्करणा की एक ऐसी लघुकथा है जो कामकाजी नारी की ‘बेबसी’ पर केंद्रित है जो किन्हीं विवशताओं में फँसकर दैहिक शोषण एवं ब्लैकमेलिंग का शिकार हो जाती है। वह एक ऐसे अंतरद्वनद से घिरी है कि एक तरफ़ माँ है, दूसरी तरफ़ उसका प्यार सुमंत। वह दोनों से ही अपनी बेबसी बता नहीं पाती और अंततः अब वह बेबसी का शिकार नहीं होगी, इसके लिए उसे चाहे जितना संघर्ष करना पड़े। वस्तुतः यह नारी सशक्तिकरण को बल देती एक अच्छी लघुकथा है, जिसमें नायिका का संघर्ष बहुत उत्कृष्टता के साथ उभरकर सामने आया है।

इसके पश्चात डॉ. पुष्करणा की कतिपय वैसी लघुकथाओं की चर्चा करना पसंद करूँगी, जिनमें सामाजिक सरोकार पूरी गंभीरता से उभरकर सामने आया है।

  1. सामाजिक सरोकार की लघुकथाएँ: ऐसी लघुकथाओं में ‘बेबस विद्रोह’, ‘दादागिरी के ख़िलाफ़’, ‘विवशता के बावजूद’, ‘ख़ून का असर’, ‘छल-छद्म’, ‘परिस्थिति’, ‘आतंक’, ‘दरिद्र’, ‘दीया और तूफ़ान’, ‘बलि का बकरा’, ‘पिघलती बर्फ़’, ‘नपुंसक’, ‘बदलती हवा के साथ’, ‘स्वार्थी’, ‘परिभाषा’, ‘फ़र्ज़’, ‘सिफ़ारिश’ और ‘सबक’ का शुमार सहज ही किया जा सकता है।

‘सामाजिक सरोकार’ से मेरा तात्पर्य यह है कि जिन लघुकथाओं में हमारे समाज से जुड़ी समस्याओं या लोगों पर केंद्रित विभिन्न विषयों को लेकर समाज की स्थिति-परिस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। ऐसी लघुकथाओं में सबसे पहले ‘बेबस विद्रोह’ की चर्चा मेरी दृष्टि में अपेक्षाकृत अधिक प्रासंगिक होगी।

इस लघुकथा में मालिकों द्वारा नौकरानी का शोषण दर्शाया गया है। ऐसा लगता है, राधा देवी और उनके पति रमेश दोनों के ही दिलों में इंसानियत नाम की चीज़ ही बाकी नहीं  बची है। यहाँ तक कि फ़र्श से काँच साफ़ करते समय जब नौकरानी के हाथ किरच धँस जाने के कारण लहूलुहान हो जाता है, तब भी मालिक उसपर अपने लहू से फ़र्श को गन्दा कर देने के लिए गुस्सा करता है। उसकी चोट पर मरहम लगाना तो दूर वह उसे फ़र्श से लहू साफ़ करके चाय बनाने को कहता है। नौकरानी के मन में बेबसी है और उसी ‘बेबसी’ से विद्रोह उठने लगता है। मगर अभी भी वह ‘बेबस विद्रोह’ बाहर नहीं आता है बल्कि भय और दर्द के कारण चाय बनाते वक़्त उससे चीनी का मर्तबान भी छूट जाता है। दोनों पति-पत्नी जब इस धमाके की आवाज़ सुनकर बेतहाशा नंगे पैरों ही दौड़ते हुए रसोई में पहुँचते हैं तो ईश्वर उनके कर्मों का लेखाजोखा वहीं पूरा कर देता है-उनके पैर वहाँ बिखरी काँच की किरचों से लहूलुहान हो जाते हैं। और नौकरानी द्रुतगति से निकलकर अपने घर की ओर चल चल पड़ती है! नौकरानी का यह आचरण दो पहलुओं को दर्शाता है-

  1. या तो अब उसको अपने मालिक-मालकिन की और जलीकटी बातें सुनने-सहने की शक्ति नहीं बची थी ;क्योंकि एक ‘बेबस विद्रोह’ तो पहले से ही उसके मन में उठ रहा था। सो अपना ‘विद्रोह’ दिखा कर वह उनके सामने वहाँ से चली गई।
  2. या फिर अब तक उसके मालिक-मालकिन का बर्ताव ‘अति’ की सीमा तक पहुँच ही चुका था और अब-मर्तबान के टूटने और उनके घायल होने के बाद उनका दुर्व्यवहार क्या रूप ले सकता है इसकी कल्पना मात्र से ही वह घबरा गई और वहाँ से निकल गई।

दोनों ही सूरतों में नौकरानी के वहाँ से जाने में ही भलाई थी ;क्योंकि उसके मालिक-मालकिन के पैरों के साथ-साथ उनका अभिमान भी अब ‘लहूलुहान’ हो चुका था जो उसके लिए अत्यन्त ख़तरनाक था। संघर्ष चित्रण की दृष्टि से ‘बेबस विद्रोह’ एक पांक्तेय लघुकथा है। लघुकथाओं में ऐसा सटीक एवं श्रेष्ठ संघर्ष चित्रण प्रायः पढ़ने को नहीं मिलता।

‘दादागीरी के ख़िलाफ़’ एक ऐसी लघुकथा है जो विश्व की राजनीति को दर्शाती है। सही दिशा में मीडिया का प्रभाव किस तरह अन्याय के ख़िलाफ़ एकजुट होने के लिए पड़ सकता है; यह इस लघुकथा में दृष्टिगोचर होता है। रुदौली गाँव की फ़सलें महानगर द्वारा जला दी जाती हैं। वे भीतर से दुखी होते हैं परन्तु दुःख दिखाने का साहस नहीं कर पाते, क्योंकि वे एक छोटी इकाई में हैं। गाँव का प्रधान गाँववासियों को गाँधी जी का उदाहरण देते हुए ढाँढ़स बँधाता है। इस दबी हुई चिंगारी को हवा तब लगती है, जब लोग ट्रांज़िस्टर पर समाचार सुनते हैं कि किस तरह अन्य देश इराक़ पर अमरीका के पुनः हमले की निन्दा करते हैं और मुक़ाबला करने की सोचते हैं, और इराक़ अमरीका का विमान मार गिराता है। यह समाचार आसपास के गाँव वालों के हौसले बुलंद करता है तथा वे अपने पडोसी गाँव की अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई में मदद करने के विचार को एक निर्णय का रूप दे देते हैं। अमेरिका की दादागीरी को सुनहरे शिल्प में प्रस्तुत करने वाली तथा अपने ढंग की शायद यह एक अकेली लघुकथा है।

‘विवशता के बावजूद’ लघुकथा का दृश्य आज हमारे देश में इस लघुकथा का दृश्य आज हमारे देश में बहुत आम हो चुका है। आए दिन कहीं भी स्त्रियों के साथ अवांछनीय बर्ताव होता रहता है, भयभीत स्त्रियाँ चुप रह जाती हैं और आसपास के लोग भी डर और आतंक से मूक खड़े तमाशा देखते रहते हैं। ट्रेनों में दैनिक यात्रा करने वाले यात्री दूर से आने वाले यात्रियों की सीटों पर अपना अधिकार समझकर ज़ोर-ज़बरदस्ती से ढीठ बनकर बैठ जाते हैं और पहले से बैठे हुए यात्री उनसे डरकर उन्हें जगह देकर दुबक कर बैठ जाते हैं। उन दैनिक यात्रियों की संख्या भी अधिक होती है, जिससे एक अकेला यात्री कैसे लड़ेगा भला! ऐसे में यदि बर्थ पर बैठी कोई युवती हो तो कैसा घिनौना एवं डरावना दृश्य होगा, इसका अन्दाज़ा लगाना कोई मुश्किल बात नहीं।

अलीगढ़ स्टेशन से चढ़े कुछ दैनिक यात्री जब पहले से बर्थ पर बैठी एक युवती से अवांछित व्यवहार करते हैं, तो वह आतंकित हो उठती है। वह उनका प्रतिकार करना चाहती है परन्तु कैसे करे? आसपास बैठा कोई भी यात्री उस ‘टिड्डी दल’ से जूझने का साहस नहीं कर रहा था। एक थुलथुल व्यक्ति की आपत्तिजनक हरक़तें उसे बेहद परेशान कर देती हैं। तभी उसकी निगाह बाहर के दृश्य पर पड़ती है जहाँ कुछ स्थानीय कुत्ते एक बाहरी कुत्ते पर झपट रहे होते हैं। पहले तो बाहरी कुत्ता भागता है; परन्तु कोई और रास्ता न देखकर वह भी वापस गुर्राने लगता है और फिर उनपर झपट पड़ता है। वह युवती बस इतना ही देख पाई थी कि वह दृश्य आँखों से ओझल हो गया। परन्तु इस दृश्य ने उसके मानसपटल पर अधिकार जमा लिया और उसको अपनी बगल में, अमानवीय व्यवहार कर रहे व्यक्ति को धक्का देने की हिम्मत दे दी। उसको धक्का देकर नायिका ज़ोर से चीख पड़ती है। गाड़ी में यात्रा कर रहे कुछ बन्दूकधारी सिपाही उसके पास आ जाते हैं, , जिससे आसपास बैठे यात्रियों में भी कुछ हिम्मत आ जाती है एवं वे सक्रिय हो उठते हैं।

इस लघुकथा से बहुत कुछ शिक्षा मिलती है-हम सभी एक समाज में रहते हैं, तो इस प्रकार समाज में हो रही स्त्रियों के प्रति अवांछनीय हरक़तों का विरोध हमें मिलजुल करना चाहिए न कि मूक दर्शक बनकर देखना चाहिए। हर स्त्री को भी चाहिए कि इस अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए -यदि वह युवती उस थुलथुल व्यक्ति को धक्का न देती और न चीखती तो उसकी मदद को कौन आता। उसकी आवाज़ सुनकर ही सिपाही वहाँ तथा आसपास बैठे लोगों में भी कुछ साहस का संचार हुआ। युवती के ऐसे पाशविक प्रवृत्ति वाले इन्सानों से जूझने के दृश्य को कुत्तों के झपटने वाले दृश्य ने और भी सजीव कर दिया। वस्तुतः यही दृश्य लघुकथा को न मात्र लघुकथा बनाता है अपितु उसे एक स्तरीय लघुकथा बनाने में भी बहुत सहायक होता है।

‘ख़ून का असर’ –‘रस्सी जल गई पर ऐंठन न गई’ कहावत को चरितार्थ करती यह लघुकथा नवाबों की गिरती साख़ की शोचनीय दशा का चित्रण करती है। एक नवाब साहब दूसरे नवाब साहब के यहाँ नौकरी का इंटरव्यू देने पहुँचते हैं। बाहर से हवेली की जाँच -परख़ करते हुए वे अंदर रहने वाले नवाबों की हैसियत का अंदाजा लगाने लगते हैं। इंटरव्यू कहाँ पर होगा, यह पूछना चाहते हुए भी वे ‘दो क़दम पीछे’ हट जाते हैं क्यों उनका उनका ‘नवाबी ख़ून उबाल मारने लगता है’-उन्हें अपनी रईसी याद आ जाती है -कितने नौकर, गाड़ियाँ, बग्गियाँ हुआ करते थे। मगर अब? सबकुछ तो उनके पुरखों ने ऐयाशी में उड़ा दिया। रही सही कसर दीवानों और मुलाज़िमों ने पूरी कर दी। और तो और घरेलु झगड़ों में सब कुछ ख़त्म कर दिया। उस पर तुर्रा यह कि नवाब होने के कारण न तो उन्होंने कोई तालीम हासिल की और रही बात किसी शारीरक श्रम की तो वहाँ नज़ाक़त आड़े आ गई। अब वे करते भी तो क्या?

किसी तरह वे इंटरव्यू वाले हॉल में पहुँचते हैं तो वहाँ पूछताछ करने वाला जब उनका पता-ठिकाना पूछता है, तो उनकी रियासत का नाम सुनते ही वह उनसे बड़ी इज़्ज़त से पेश आता है। परन्तु उन्हें उनकी अधूरी बात बीच में ही काटकर उनका वहाँ आने के आशय को उल्टा समझ लेता है। वह सोचता है कि वे अपने किसी मुलाज़िम को वहाँ रखवाना चाहते हैं। उनकी स्वयं की मुलाज़मत का तो उसे ख़याल भी नहीं आता है। इस पर नवाब साहब भी इस इज़्ज़त-अफ़ज़ाई से न मुँह फेर पाते हैं, न ही नकार पाते हैं तथा ‘फिर मिलेंगे …आदाब’  की औपचारिकता निभाकर खामोशी से से वहाँ से चले आते हैं। मगर ख़ुद को कोसने से रोक नहीं पाते और खीझकर स्वयं से बोलते हैं –“अब चाटो इस रुतबे को और मिटाओ अपनी भूख!”

ख़ानदानी दौलत आदमी को बहुत इज़्ज़त और रसूख़ दिला देती है, मगर बिना मेहनत किए वह अधिक समय तक टिकती नहीं है और जब वही रईसी ख़त्म होती है, तो उसे उस रुतबे की ऊँचाई से नीचे उतरने में अत्यधिक कष्ट झेलना पड़ता है। तब परिस्थितियों से समझौता करना उसके लिए बेहद मुश्किल हो जाता है। इस कश्मकश को इस लघुकथा में बहुत ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है। इसी कशमकश का मिश्रण ही इस लघुकथा की प्रमुख विशेषता है। इसका शीर्षक लघुकथा की विषयवस्तु के बिल्कुल अनुरूप है।

‘दरिद्र’ लघुकथा ‘आतंक’ लघुकथा से ही उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। दोनों के कथ्य लगभग सामान्य हैं किन्तु कथानक नितांत भिन्न हैं। ‘दरिद्र’ लघुकथा में दो मित्र अपने एक मित्र से मिलकर लौटते हुए बात करते जा रहे हैं। उनका वह मित्र ‘कुछ ही वर्षों में’ धनी हुआ है। एक मित्र बोलता है, ‘यह आदमी भी मुक़द्दर का सिकन्दर’ है। इसपर दूसरा मित्र कहता है कि ‘मगर यह सिकन्दर नहीं है; क्योंकि सिकन्दर एक ख़ानदानी बादशाह था, जिसमें संस्कार थे और वह अपनी गरिमा के अनुकूल ही अपने मित्रों का स्वागत करता था।’ दोनों मित्रों को यह शिकायत थी कि वे अपने उस मित्र के यहाँ घण्टे भर बैठे परन्तु उसने एक कप चाय पिलाकर टरका दिया। और उस एक घण्टे में वह अपनी ही डींग हाँकता रहा -कि कहाँ और कैसे पैसा इन्वेस्ट किया है, क्या-क्या प्रॉपर्टी किस-किसके लिए ख़रीद ली, भविष्य में ऐसा करना है, वैसा करना है।

दोनों मित्रों को उसकी इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था। वे तो बस यही सोच रहे थे कि जब उसका वेतन इन दोनों से कम था, और पहले वह इन लोगों से अक्सर पाँच -पाँच रुपए उधार माँगता रहता था, तो फिर तो इतनी कमाई के पीछे अवश्य ही ग़लत तरीक़ा अपनाया गया होगा। वे उससे अधिक तनख़्वाह पाकर भी बड़ी मुश्किल से अपना भोजन और बच्चों की पढ़ाई का ख़र्चा उठा पा रहे हैं। तभी उनमें से एक मित्र दूसरे से कहता है, कि ‘यदि तुम्हारा नाश्ता करने का मन हो, तो चलो किसी रेस्टोरेंट में बैठते हैं।’ इसपर दूसरा मित्र कहता है कि वह घर से ही नाश्ता करके आया था।

इस लघुकथा को दूसरे पहलू से देखा जाए तो वह यह है कि दुनिया ऐसी ही होती है। कोई भी किसी को आगे बढ़ता हुआ देखकर ख़ुश नहीं होता है।  तीनों मित्र थे परन्तु एक ने तरक़्क़ी कर ली, चाहे जैसे भी की हो, दूसरे मित्रों का तो नहीं छीना न कुछ, फिर उन दोनों मित्रों को उससे जलन क्यों हो रही थी ? वह तो उनसे भी धन जोड़ने के अपने अनुभव साझा कर रहा था, उनको वो डींग हाँकना क्यों लगा ? नाश्ता करके आए थे, पेट भरा हुआ था, फिर भी यह शिकायत की चाय के अलावा कुछ और नहीं पूछा। ये बात मानी जा सकती है कि उस धनी मित्र ने उनकी वैसे खातिरदारी नहीं की जैसी करनी थी, यह उसकी ग़लती थी, मगर उसको अनदेखा भी तो किया जा सकता था। मगर आजकल के ज़माने का दस्तूर है, अपने मित्र के धनी होने से उन्हें बहुत ईर्ष्या हो रही थी, जिसकी भड़ास वे आपस में उसकी बुराई करके निकाल रहे थे। वैसे तो इस लघुकथा में वैचारिक दरिद्रता पर अधिक बल दिया गया है। इस लघुकथा का शीर्षक यदि ‘जलन’ या ‘भड़ास’ रखा जाता तो शायद अधिक सुंदर होता। बुनावट की दृष्टि से यह लघुकथा काफ़ी मज़बूत है।

जैसा कि मैं पहले भी कह चुकी हूँ, डॉ. पुष्करणा विषय, शिल्प एवं प्रयोगों के स्तर पर वैविध्यधर्मी हैं। उन्होंने अपने समय के समाज को खुली आँखों से बहुत ही गहराई तक डूबकर देखा है। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में किस प्रकार मान-सम्मान प्राप्त करने हेतु जुगाड़ों एवं तिकड़मों का उपयोग किया जा रहा है, उसकी बहुत ही सटीक प्रस्तुति ‘छल-छद्म’ लघुकथा में की है। इसका शीर्षक इस लघुकथा के महत्त्व को अतिरिक्त बढ़ा देता है, इसका प्रतिपादन तो इस लघुकथा की आत्मा है। सामाजिक सरोकारों की ही श्रेणी में ‘परिस्थिति’ लघुकथा भी चली आती है, जो पारिवारिक स्थितियों पर केंद्रित एक सुंदर लघुकथा है।

डॉ. पुष्करणा की प्रायः लघुकथाओं के शीर्षक प्रतीकात्मक हैं। ‘आतंक’ भी वैसी ही लघुकथा का शीर्षक है। ‘आतंक’ वैसे लोगों पर केंद्रित लघुकथा है, जो किसी तरह पर्याप्त धन अर्जित कर लेने पर उन्हें अपने धन या क़ीमती सामान की बार-बार और बढ़ा-चढ़ा कर चर्चा करके वस्तुतः सामने बैठे व्यक्ति को अपने प्रभाव में लेना चाहते हैं ताकि वह व्यक्ति उनकी इच्छा एवं उन्हीं की शर्तों पर उनका अनुकरण करने हेतु विवश हो जाए। विषय के प्रतिपादन में यह उत्कृष्ट एवं प्रभावकारी लघुकथा है।

‘दीया और तूफ़ान’ नारी सशक्तिकरण को बल देती उच्च कोटि की लघुकथा है। इस लघुकथा की प्रस्तुति भी प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। इस कथा में नायिका एक दीये को तेज़ हवा में संघर्ष करते देख अपने भीतर संघर्ष करने की शक्ति अर्जित करती है और वह संघर्ष करने हेतु कृतसंकल्प हो जाती है। ‘बलि का बकरा’ पंजाब में चले आतंकवाद पर केंद्रित एक ऐसी लघुकथा है जो उस समय को सजीवता से प्रतिपादित करती है। इसकी भाषा-शैली वस्तुतः इस लघुकथा की आत्मा है। इसका शीर्षक भी इसकी श्रेष्ठता में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह करता है।

‘पिघलती बर्फ़’ कथाकार डॉ. पुष्करणा की प्रतिनिधि लघुकथाओं में एक महत्त्वपूर्ण लघुकथा है। यह जहाँ दहेज-दानव पर केंद्रित होने के कारण पारिवारिक विषयों में गिनी जाती है वहीं नायिका के असामान्य मनोविज्ञान को लेकर चर्चा में रही है। नायिका दहेज में मोटरसाइकिल नहीं देने के कारण त्याग दी जाती है। वहीं जब उसका भी अपने लिए नई मोटरसाइकिल लेकर घर आता है और नायिका द्वारा उसे देखने पर उसका मुख कुछ बदलने या कहिए मनोवैज्ञानिक ढंग से क्रमशः सख़्त एवं लाल होने लगता है और फिर उसमें एकाएक विस्फोट होता है और वह एक डंडा उठाकर मोटरसाइकिल पर दनादन बरसाने लगती है। “कमीने! मैं डरपोक नहीं हूँ। समझे! तुझे मोटरसाइकिल नहीं मिलेगी, कुत्ते!” कहकर अपने भीतर कब से दबे आक्रोश को निकालने लगती है। अपने विषय एवं कथ्य के अनुसार इसका शीर्षक बिल्कुल सटीक एवं सार्थक है।

‘नपुंसक’ लघुकथा का सारा दारोमदार इसके शीर्षक पर ही केंद्रित है। इस लघुकथा में ट्रेन में यात्रा कर रही एक महिला के साथ कुछ पुलिसवाले अवांछित हरक़तें करने लगते हैं और महिला अपनी सहायता हेतु सभी यात्रियों से आग्रह करती है, किन्तु

पुलिस के पचड़े में न पड़ने के कारण कोई भी यात्री उसकी मदद को नहीं आता और वह महिला ड्यूटी पर काम कर रहे पुलिसवालों द्वारा दूसरे डिब्बे में ले जायी जाती है। आगे का प्रसंग उद्धृत करना आवश्यक हो जाता है, देखें –“मेरी आँखें उस विवश महिला को जाते हुए देखती रहीं…मुझे अपनी विवशता पर बार-बार क्रोध या रहा था। मुट्ठियाँ बार-बार भिंच-भिंचकर रह गईं। ‘कैसा लगेगा आपको?’ महिला का यह वाक्य पूरी रात मेरे कानों में गूँजता रहा, मैं पूरी रात करवटें बदलता रहा…सो नहीं सका।”

‘बदलती हवा के साथ’ गली-मोहल्ले में बच्चों के झगड़ों को लेकर बड़ों में हो जानेवाले झगड़े को केंद्र में रखकर लिखी गई लघुकथा है, जिसमें मौलिक दृष्टि से प्रत्यक्षतः तो कोई कमाल नहीं दीखता किन्तु इसके विषय के लिए इसकी प्रशंसा करनी होगी कि इसका नायक, जिसके बच्चे को दूसरे बच्चे के पिता ने पीटा है, से झगड़ा नहीं करता अपितु जिसने पीटा है उसे स्वयं ही अपनी भूल का एहसास होता है और वह क्षमा माँगता है –“क्षमा किसलिए?”

“आपका पप्पू खेल-खेल में नहीं गिरा था बल्कि हाई ब्लड प्रेशर एवं पुत्र-मोह में मैं धृतराष्ट्र बन गया था और…।”

“जाने भी दीजिए अब…।” इस कारण इसका शीर्षक भी उपयुक्त है।

इसी श्रेणी में ‘स्वार्थी’ लघुकथा को भी रखा जा सकता है। यह लघुकथा भी अपनी सटीकता एवं उपयोगिता सिद्ध करने के कारण धरातल से काफ़ी ऊँची उठकर श्रेष्ठता को प्राप्त कर लेती है। पात्रानुकूल इसकी भाषा-शैली भी इसे श्रेष्ठ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। इसमें एक मित्र जो स्कूटर ख़राब होने के कारण मिस्त्री के यहाँ दे आता है, अब उसे स्कूटर ठीक होने तक का समय व्यतीत करना है, तो वह एक मित्र के यहाँ समय काटने के ख़याल से या जाता है, जबकि उस मित्र को भी कहीं ज़रूरी काम से जाना है। उस मित्र के आने से वह अपना जाना स्थगित कर देता है। अब यहाँ लघुकथा के कुछ अंश उद्धृत करना अनिवार्य हो जाता है –“मिस्त्री ने एक घंटे में बुलाया है, सोचा, एक घंटा कहाँ बिताया जाए…तुम्हारा ख़याल या गया…आज के इस यांत्रिक युग में आदमी को समय कहाँ कि बेकार कहीं बैठे…ऐसे ही कभी कोई संयोग…।” और फिर घंटा व्यतीत होते ही, “क्षमा करना यार! तुम्हारा एक घंटा समय लिया…आज इस स्कूटर ने एक घंटा बर्बाद कर दिया।” यह संवाद लघुकथा को चरम पर ले जाता है। ये संवाद इतने स्वाभाविक हैं, जो हर कहीं से लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में सहायक होते हैं। इसका शीर्षक भी इसकी श्रेष्ठता में पूरी तरह सहायक है।

‘परिभाषा’ लघुकथा डॉ. पुष्करणा की लघुकथाओं में काफ़ी चर्चित लघुकथा है जो सरकारी स्कूलों पर व्यंग्य करती हुई उनकी परिभाषा बताती है। अपने रिश्तेदार के यहाँ व्यक्ति ने घूमते हुए एक झोंपड़ी की ओर देखते हुए पूछा, “गाँव से दूर वृक्ष के नीचे अकेली यह झोंपड़ी किसकी है?”

उत्तर में उन्होंने कहा, “सुनते है, यह स्कूल है।”

“कितने बच्चे पढ़ते होंगे इसमें?”

“बच्चे! यही कोई चार-छह बच्चे प्रतिदिन आते हैं, और कुछ देर इधर-उधर खेल-वेलकर अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं।”

“यहाँ के मास्टर साहेब कौन हैं?”

“मास्टर साहेब को तो कभी देखा ही नहीं! तो फिर कैसे पता चलता कि वे कौन हैं?”

“फिर, यह कैसा स्कूल है?”

“सरकारी है।”

इस लघुकथा का अंतिम संवाद ‘सरकारी है’ ही इस लघुकथा के प्राण हैं, जो इतना धारदार व्यंग्य करता है कि किसी के भी हृदय के भीतर जाकर अपना प्रभाव छोड़ता है। यही इस लघुकथा की विशेषता है।

‘फ़र्ज़’ लघुकथा पुलिसिया चरित्र को बहुत ही सलीके से प्रत्यक्ष करती है। इस लघुकथा में मकान मालिक से परेशान एक वृदधा, पुलिस को रिपोर्ट लिखाकर अपनी मदद हेतु बुलवाती है। पुलिस आती है किन्तु मकान मालिक से पैसे लेकर वृदधा से कहती है, “माँ! आखिर तो यह मकान मालिक हैं, आप जल्दी ही दूसरा मकान खोज लीजिए। हम कब तक आपके लिए इस प्रकार दौड़कर आते रहेंगे।” और अंतिम दो संवाद और अधिक महत्त्वपूर्ण हैं जिससे पुलिसिया चरित्र प्रत्यक्षतः प्रत्यक्ष होता है। इतने में वही इंस्पेक्टर अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हुए पधारे, “क्या इंस्पेक्टर शर्मा! अब ठीक हो गया…?”

“हाँ! हाँ! सिन्हा साहेब, सब आपका सहयोग है। इसी प्रकार अपने फ़र्ज़ का निर्वाह करते चलिए।” इस लघुकथा में यह वाक्य एवं शीर्षक ‘फ़र्ज़’ व्यंग्य का चीरा इस तरह लगाते हैं कि पाठक तिलमिला उठता है।

‘सिफ़ारिश’ भी व्यंग्यात्मक लघुकथा है, जो सरकारी नौकरियों में साक्षात्कार के समय भ्रष्टाचार के नए-नए ढंगों पर फोकस करती है। अपने भतीजे की सिफारिश करने का ढंग देखें -एकाएक इसके चाचाजी इंटरव्यू बोर्ड से उठ खड़े हुए। बोर्ड के अन्य सदस्यों ने पूछा, “क्या हुआ? आप कहाँ जा रहे हैं?”

“बात ऐसी है भाई! अब जो कैंडीडेट इंटरव्यू देने आ रहा है, वह मेरा अपना सगा भतीजा है। ईमानदारी से ही आगे का इंटरव्यू भी चलता चले, इसलिए मैं बाहर जा रहा हूँ।” यह लघुकथा भी अपनी सहज भाषा-शैली के कारण ध्यान आकर्षित करती है। इसका शीर्षक भी सटीक है।

‘सबक’ लघुकथा भी ‘बदलती हवा के साथ’ बच्चों के झगड़े में बड़ों के दख़ल को लेकर सृजित की गई है, कितु इस लघुकथा में मूल भूमिका में बच्चे ही हैं, जो बड़ों यानि अपने माँ-बाप को सबक़ दे जाते हैं कि बच्चे तो रोज़ लड़ेंगे-झगड़ेंगे, फिर साथ-साथ खेलेंगे। बड़ों की दखलंदाज़ी मूर्खता है। इस संदर्भ को रेखांकित करते कुछ संवाद यहाँ दृष्टव्य हैं –

बच्चे ने उसकी माँ से कहा, “आंटी! आप मोनू और अंकल को लेकर आएँगी न?”

“नहीं।”

“क्यों आंटी?”

“तुम्हारी मम्मी ने हमें नहीं बुलाया! तुम्हारे बुलाने से क्या होता है?”

“वाह आंटी! जन्मदिन मेरा है। निमंत्रण देने वह क्यों आएँगी?”

“फिर भी बेटा!” कुछ द्रवित होते हुए आंटी ने कहा।

“फिर भी क्या! झगड़ा तो हम दोनों का था… और दोनों ने आपस में कभी बोलना तक बंद नहीं किया। हम दोनों तो हर रोज़ उसी तरह साथ-साथ खेलते हैं। तो फिर आप बड़े, बिना किसी झगड़े के आपस में बैर भाव क्यों रखते हैं?”

हृदयस्पर्श करती यह संवेदनापरक लघुकथा भाषा-शैली, विषय एवं शीर्षक के कारण श्रेष्ठता की श्रेणी में सहज ही जाती है।

4 दोहरे मापदंड प्रत्यक्ष करती लघुकथाएँ: तथाकथित वामपंथियों पर प्रहार करती लघुकथा ‘दिखावा’ का दृश्य कॉफी हाउस की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहाँ कुछ युवक मेज़-कुर्सियों पर बैठकर किसी बात पर ‘ऊँचे स्वरों’ में बहस कर रहे हैं। वहीँ एक भिखारी भी कटोरा लिए खड़ा है। कुरता-पैजामा पहने युवक सफ़ारी सूट पहने हुए युवक को व्यंगात्मक भाषा में कहता है कि उस जैसे ‘पूंजीपति’ लोग ग़रीबों को देखना नहीं पसंद करते जबकि इन ग़रीबों के कारण ही उनके सारे ‘ठाठ-बाट’ हैं। सम्पन्न युवक उससे अपनी असहमति जताता है, कुछ बोलना चाहता है परन्तु दूसरा युवक उसे बोलने नहीं देता। बल्कि उसको चैलेंज करता है कि यदि ऐसा नहीं है तो वह जाकर भिखारी को गले से लगाकर दिखाए। सम्पन्न युवक इस बात के लिए यह कहकर मना कर देता है कि वह उसको कुछ रुपए भीख तो दे सकता है, मगर उसको किसी भी क़ीमत पर अपने गले नहीं  लगा सकता। वह यह भी कहता है कि कुर्ताधारी युवक ‘चाहे तो उस भिखारी से गले मिले या…’ इस बात पर कुर्ताधारी युवक लपककर उस भिखारी के पास पहुँच जाता है और उसे गले से लगा लेता है। उसे गले लगते देख भिखारी पहले तो कुछ घबराता है परन्तु फिर थोड़ा सँभलकर उससे कहते है कि ‘पेट गले लगने से नहीं, रोटी से भरता है…और रोटी के लिए पैसा चाहिए।’

सबसे रोचक बात ये है कि इस लघुकथा का शीर्षक इसकी पृष्ठभूमि के अनुसार एकदम सटीक है। ‘कॉफीहाउस’ एक ऐसी जगह है, जहाँ बेरोज़गार, बेकार और फालतू लोग (विशेषकर युवक), टाइमपास करने के लिए आते हैं। यह जगह राजनैतिक बहसों’ का अड्डा है। यहाँ बैठकर लोग बड़ी-बड़ी ‘बातें’ ही करते हैं बस! यानी की यह ‘दिखावा’ करने की सबसे उपयुक्त जगह है।

यहीं पर एक सफ़ारी सूट पहने युवक पर (जो कि सम्पन्न परिवार से लगता है) एक कुर्ता-पैजामा पहने युवक द्वारा,( जो कि एक नेता लगता है), दोषारोपण  गया है कि उन पूँजीपतियों के ‘ठाठ-बाट’ के कारण ही समाज में ग़रीबी व्याप्त है तथा वे ही लोग उन्हें ‘नापसन्द’ भी करते हैं। नेता युवक, सम्पन्न युवक को एक भिखारी को गले लगाने की बात कहकर उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है। जहाँ सम्पन्न युवक का इस बात के लिए साफ़ मना कर देना तथा भिखारी को रुपये देकर मदद करने की बात कहना उसके स्वभाव की साफ़गोई और व्यावहारिकता  दर्शाता है, वहीं नेता युवक का ‘लपककर’ भिखारी को गले लगाना उसके दिखावे तथा उतावलेपन को दर्शाता है, जिसे कि वह भिखारी भी भलीभाँति समझता है। नेताओं की बड़ी-बड़ी झूठी बातों से भिखारी भी उकताया हुआ -सा लगता है। तभी तो वह उससे कहता है, ‘पेट गले लगाने से नहीं, रोटी से भरता है और रोटी के लिए पैसा चाहिए। ‘ नेताओं के झूठे वादों और दिखावे को एक भिखारी की तरफ़ से यह करारा तमाचा है।

हम इन्सान अक्सर बेध्यानी में ही अपनी ख़ुदग़र्ज़ी का सुबूत दे जाते हैं और जब कोई इस बात का एहसास दिलाता है, तब शर्मिन्दगी होती है। धूम्रपान करना अपनी सेहत से अधिक अपने आसपास के लोगों की सेहत के लिए हानिकारक होता है, इस बात को प्रत्यक्ष करती है लघुकथा ‘ख़ुदगर्ज़। किसी एक के घर एकत्र  हुए मित्रों में से एक मित्र लगातार इसलिए सिगरेट पिए जा रहा था; क्योंकि उसके अपने घर में बच्चे हैं, जिनके कारण वह अपने घर जाकर नहीं पी सकेगा। उसे ज्ञात था कि उसके बच्चों के लिए सिगरेट का धुँआ नुकसानदेह है,परन्तु वहीं जिस मित्र के घर वह बैठा हुआ था, और सिगरेट फूँके जा रहा था, उसके बच्चों का ख़याल उसे ज़रा भी नहीं आया, जो वहीं पास में ही खेल रहे थे। वह जड़ हो जाता है जब उसका मेज़बान मित्र उसे इस बात का एहसास दिलाता है कि अपने बच्चों की तो उसे फ़िक्र है मगर क्या उस मित्र के बच्चों को वह अपने बच्चों जैसा नहीं समझता है?

इस लघुकथा में एक प्रेरक शिक्षा है कि बच्चे, बच्चे होते हैं फिर वे चाहे किसी के भी क्यों न हों। जो बात अपने बच्चों के लिए नुकसानदेह है, वो किसी दूसरे के बच्चे के लिए भी उतनी ही हानिकारक होती है, इस बात को हमें कदापि भूलना नहीं चाहिए। ‘ख़ुदग़र्ज़’ लघुकथा की ही भांति ‘उच्छलन’ में भी कुछ ऐसी ही बात दृष्टिगोचर होती है।

नए वर्ष का उत्सव आजकल हर जगह विशेषकर पाँच सितारा होटलों में बहुत जोरशोर से मनाया जाता है। यहाँ शराब पीना, नाचना बहुत आम बात है। इस लघुकथा का नायक भी मुंबई में अपनी बहन के हॉस्टल जाने के बजाय एक ऐसी ही पार्टी में पहुँचता है। वह उस होटल में सबसे महँगे कमरे में ठहरता है, जो यह बात दर्शाता है कि वह किसी अमीर घर का लड़का है, ज़ाहिर है कि उसकी बहन के पास भी धन की कोई कमी नहीं होगी। पार्टी के दौरान वह किसी लड़की के साथ सहजता से डांस करना शुरू कर देता है। दोनों ने शराब पी हुई होती है। वातावरण का और भी ज़्यादा आनंद लेने हेतु वे दोनों और भी शराब अपने हलक में उड़ेलते हैं और ‘ डांस -फ्लोर’ की तरफ़ बढ़ते हैं कि तभी उस लड़के की नज़र एक और जोड़े पर पड़ती है, वे दोनों भी मदहोशी में डांस किए जा रहे थे तथा अश्लील हरक़तें भी कर रहे थे। लड़का उन्हें देखकर ठिठकता है और फिर हैरान रह जाता है। उसका सारा नशा काफ़ूर हो जाता है। । इसपर उसके साथ वाली लड़की जब उसे यह कहकर बुलाती है कि ‘आओ हम उस जोड़े को भी पीछे छोड़ दें!’ तो वह लड़का उसे मना कर देता है और कहता है, कि वह लड़की उसकी बहन है। इस बात पर वह लड़की मानों उसे उलाहना देते हुए कहती है कि ‘तो क्या हुआ? मैं भी किसी की बहन हूँ!’

यह लघुकथा आजकल के तथाकथित आधुनिक कल्चर पर एक कटाक्ष है। पाँच सितारा होटलों की पार्टी, उसमें पानी की तरह बहने वाली शराब और लड़के-लड़कियों का अश्लीलता की हद तक बाँहों में बाँहें डालकर नाचना हमारी युवा पीढ़ी को कहाँ ले जा रही है -इसके बारे में कोई नहीं सोच रहा! एक मदहोशी में डूबी पार्टी में यदि भाई-बहन का आमना-सामना हो जाए तो शर्मिन्दगी भी शरमा जाए -कुछ ऐसे ही भाव मन में उठाती है यह लघुकथा! इस गिरते हुए आचरण को रोकना हम सभी का दायित्व है।

परिवर्तन-परिवर्तन का ढोल बजाने वाला हरेक इन्सान अपने मन के भीतर कभी नहीं झाँकता है कि उसके विचारों में क्या सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं या उसे कहाँ स्वयं को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। कभी किसी समारोह में, कभी पान की दुकान या फिर किसी भी सार्वजनिक स्थान पर सरकार की नीतियों पर चर्चा करने वाले, उसपर दोषारोपण करने वाले स्वयं भूले से कभी अपना उदाहरण नहीं सामने रखते जिससे ऐसा लगे कि चलो, जनता में से भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो सही आचरण कर रहा है, जिसका अनुसरण किया जा सकता है। इसी पर एक कटाक्ष है लघुकथा ‘हाथी के दाँत’, जो कि अपने शीर्षक के अनुकूल ही चित्र उपस्थित करती है।

एक समारोह में एकत्र हुए कुछ मित्र एक तरफ़ निकल कर चर्चा कर रहे होते हैं कि इस बार की सरकार से आशाएँ बँधी है, यह सरकार- परिवर्तन आवश्यक था। मेज़बान यह कहते हुए कि ‘सत्ता जब रईसज़ादों के हाथों से निकलकर सर्वहारा के हाथ में आ जाए ,तभी इस परिवर्तन का कुछ अर्थ निकलेगा’, अपने नौकर ननकू को आवाज़ देता है। उनकी चर्चा अभी चल ही रही होती है कि ननकू को आने में देरी हो जाती है। वह जब तक आता है, तब तक उसके मालिक का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ चुका होता है। वह पहले तो उसे डाँटता है, फिर ननकू के यह कहने के बावजूद कि वह खाना खा रहा था, इसलिए आने में देर हो गई, मालिक उसको एक ज़ोर का चाँटा मारता है। ननकू का देर से आना उसे अपने मित्रों के समक्ष अपमानजनक प्रतीत होता है।

कुछ देर पहले जो आदमी सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथ में देने की दलीलें पेश कर रहा था, परिवर्तन की माँग कर रहा था उसका यह सोचना ही उसकी दोगली एवं खोखली विचारधारा का प्रतीक है। उसके चाँटे ने तो उसको इन्सान कहलाने के लायक भी नहीं छोड़ा।

ऊँच -नीच, भेद-भाव आदि के विरोध में लेखकों की क़लम बहुत तेज़ एवं तीख़ी चलती है इस बात से कोई अनजान नहीं है; परन्तु यही आचरण जब असल ज़िन्दगी में दिखाने की ज़रूरत होती है तो सभी भाषण धरे के धरे रह जाते हैं। बदबू लघुकथा एक ऐसे ही लेखक की मानसिकता को दर्शाती है। उसकी बहन की शादी दहेज़ की बढ़ती माँग के कारण नहीं हो पा रही है। जब उसकी यह परेशानी सुनकर उसका एक दोस्त अपने भाई के साथ रिश्ता करने का सुझाव देता है तो वह गुस्से में आ जाता है कि ‘कहाँ वह उच्च जाति का और कहाँ वो! दोस्ती का अर्थ यह तो नहीं कि वह उसकी इज़्ज़त से ही खिलवाड़ करे।’ इस बात पर दोस्त उस पर ही कटाक्ष करता है कि ‘वह तो उसके विचारों के अनुरूप ही बात कर रहा था, जिन्हें वह अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता रहता है।’ इस बात पर लेखक दोस्त का चेहरा फ़क्क हो जाता है परन्तु फिर वह सम्भल जाता है और उसके पास से उठकर चला जाता है। उसे यूँ महसूस होता है कि उस दोस्त के पास से उसे बेहद बदबू आ रही हो। ऐसी दोहरी मानसिकता क़रीब-क़रीब हर ऊँची जाति के लोगों में होती है, जिसका स्वाभाविक चित्रण इस लघुकथा में किया गया है। दोस्ती का दिखावा करने वाले ये लोग अपने चारों ओर एक लकीर खींच कर चलते हैं, जिसको लाँघने की इजाज़त वे अपनी नीची जाति के दोस्तों को नहीं देते हैं।

हिन्दी लघुकथा-जगत में जो कतिपय लघुकथाएँ अपने श्रेष्ठ शीर्षक के kआयरन ख्यात हुई हैं, उनमें ‘बोफोर्स काण्ड’ पांक्तेय है, जिसमें यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि सच को चाहे जितनी भी परतों में छिपाया जाए, वो छिप तो जाएगा परन्तु उसको छिपाने की ‘कोशिश’ स्वयं ही सबूत बन कर सामने एक धब्बे की तरह रहती है, जो यह याद दिलाती है कि इसके पीछे कुछ छिपाया गया है।

एक विद्यालय के हेडमास्टर बही खाते में से कुछ काटा-पीटी करते हैं। वे पहले लिखित को काटकर उसके ऊपर कुछ अनर्गल हिंदी शब्द लिखते हैं, फिर कुछ अनर्गल अंग्रेज़ी शब्द और उसके बाद जब उलट-पलट कर देखने पर कुछ नहीं दिखाई देता तो उस पर आयत के आकार में स्याही भर देते हैं। उनकी यह हरक़त देखकर उनका सहायक जब उनसे बोलता है कि पहले भी तो इसी प्रकार स्याही भर सकता था, बिना इतना कुछ अनर्गल लिखे हुए। इस पर हेडमास्टर जी कहते हैं कि यदि उनके सहायक की इतनी ही समझ होती तो वह उनके सहायक के स्थान पर हेडमास्टर न होता ! उनका सहायक स्वयं इस बात को जाँचता-परखता है तो उसे हेडमास्टर जी की काटा-पीटी वगैरह समझ में आती है। हेडमास्टर साहब उसे बताते हैं कि यदि सच्चाई को छिपाना हो तो उसपर पहले अनर्गल लिखो और सफ़ाई से एक ख़ूबसूरत आयत बनाकर उसमें स्याही भर दो। सच्चाई स्वतः ही छिप जाएगी। इसपर उनका सहायक कहता है, “इससे सच्चाई तो छिप जायेगी परन्तु आयताकार धब्बा तो रह ही जाएगा, जो देखने वालों की आँखों में चुभता रहेगा।“ वस्तुतः यह पूरी लघुकथा ‘बोफोर्स काण्ड’ के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत होकर श्रेष्ठता की ऊँचाइयों तक पहुँच गई है।

हमारे देश में आए दिन इतने घपले होते रहते हैं। हर बार उनपर लीपापोती करके उन्हें छिपाया जाता है ,परन्तु छिपने के बाद भी हमारे दिलों में वे धब्बे सदा ही चुभते रहते हैं। बहुत ही सुन्दर उदाहरण से यह बात इस लघुकथा में पाठकों तक पहुँचाई गई है। इन छोटी-छोटी करतूतों से ही बड़े काण्ड की शुरूआत होती है।

किसी भी देश की उन्नति उस देश की जनता पर सबसे अधिक निर्भर करती है। यदि जनता जागरूक है, सम्वेदनशील है, अनुशासनप्रिय है ,तो मजाल नहीं कि उस देश की सरकार उच्छृंखल हो जाए और देश में अराजकता फैले। परन्तु जहाँ पढ़े-लिखे लोग देश में फैलते झंझट-फसाद, मारपीट एवं अनुशासनहीनता को टाइम-पास के लिए अपनी चर्चा का विषय बनाने लगें, हर विसंगति का दोष सरकार के ही सिर पर मढ़ने लगें और करें-धरें कुछ नहीं, तो उसका भविष्य अंधकारमय होने से कोई नहीं रोक सकता।

‘टेबल टॉक’ लघुकथा अपने शीर्षक से न्याय करती हुई कुछ ऐसा ही सन्देश देती है। किसी कार्यालय के पाँच साथी कर्मचारी लंच-ऑवर में अपने-अपने टिफ़िन लेकर कैंटीन में जाते हैं। वहाँ आपस में देश की बिगड़ती हुई दशा के बारे में चर्चा करते हुए, एक साथी देश की सरकार को कोसता है, दूसरा सरकार को गद्दी छोड़ने का मशवरा सुझाता है, तो तीसरा सरकार द्वारा किसी काण्ड की जाँच के आदेश की बात को गिनवा कर उसे योग्य बताता है, और चौथा कहता है कि, “जाँच-वाँच से कुछ फ़ायदा नहीं होने वाला, दो-एक साल में सारा मामला ठण्डा होकर टाँय-टाँय फिस्स हो जाएगा” –इस प्रकार वे सभी अपना रौब झाड़ रहे होते हैं कि तभी उनमें से पाँचवा बहुत ही गम्भीरता से उपदेशात्मक भाव से कहता है कि, “उन्हें न तो नेताओं से कुछ लेना-देना है न ही जनता से ; क्योंकि इनके जो जी में आता वे करते हैं। जब नेता और जनता दोनों ही दाँव खेल रहे हैं और एक-दूसरे को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं, और ख़ुद के पौ बारह कर रहे हैं, तो इसमें वे लोग क्यों नाहक ही परेशान हो रहे हैं?” तभी तीसरा साथी है कि “इन फ़ालतू बातों को गोली मारो, लंच ऑवर समाप्त हो गया है।“ और सभी अपना-अपना टिफ़िन बन्द करके पानी पीकर अपनी मेज़ों की ओर बढ़ जाते हैं।

देश के ज़िम्मेदार नागरिक ही जब इस प्रकार स्वयं को आम जनता से अलग करके, उदासीनता का परिचय देते नज़र आएँगे तो देश किस प्रकार प्रगति कर सकेगा। यह दृश्य अक्सर ही कार्यालयों में दृष्टिगोचर होता है। इस मानसिकता को लेखक ने इस लघुकथा में अत्यंत कुशलतापूर्वक उतारा है।

व्यक्ति में ‘खून का असर’ सदैव दिखाई देता है। इस हेतु व्यक्ति चाहे जिस स्थिति में क्यों न पहुँच जाए। यह स्पष्ट करती है पुष्करणा जी की लघुकथा ‘खून का असर’। कहावत है, ‘नवाबों की रियासतें चली गईं किन्तु नवाबी aब तक नहीं गई।‘ इस बात को कथाकार ने इस लघुकथा में बहुत ही करीने से प्रस्तुत किया है तथा इसका शीर्षक भी लघुकथा के विषयानुकूल है। इसके संवादों की भाषा-शैली सर्वथा पात्रानुकूल होने के कारण लघुकथा के सौन्दर्य में काफ़ी वृद्धि हो गई है।

‘छल-छद्म’ एवं ‘स्वार्थी’, ये दोनों लघुकथाएँ जहाँ सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त करती हैं, वहीं ये दोहरे मापदंडों को भी प्रत्यक्ष करने में सफल हैं। अतः इन दोनों लघुकथाओं का शुमार दोनों श्रेणियों में संभव है।

  1. कर्मनिष्ठा को अभिव्यक्त करती लघुकथाएँ: आत्मसंतोष आत्मसन्तोष से बड़ा धन कोई नहीं होता ! लघुकथा ‘महान व्यक्ति’ एक ऐसे ही कलाकार की कथा है, जिसकी कलाकृतियों की प्रदर्शनी राजधानी में लगी है। वहाँ उसे भिन्न-भिन्न तरह से प्रशंसा मिल रही है, उसके चित्रों का कई अर्थों में विश्लेषण किया जा रहा था। उसे कई तरह के सम्मान मिल रहे हैं ;परन्तु वह सन्तुष्ट नहीं है। जिसका कारण यह है कि वह स्वयं अपने चित्रों को नहीं समझ पाया था अब तक ! पहला चित्र जो उसने बनाया था वह फ़र्श पर बिखरे पानी में बनी हुई एक अजीब सी मानवाकृति का था। उसके बाद कभी बादल, कभी फ़र्श पर गिरे पानी तो कभी कहीं दीवारों पर जब भी, जैसी भी मानवाकृति उसे दिखी, उसने अपने चित्रों में मात्र सफ़ेद व काले रंगों से उसे ढाल लिया था,जिसके अर्थ उसे कभी भी समझ नहीं आये थे। यही सत्य उसे चुभ रहा था, वह छटपटा रहा था। तभी एक किशोर उसके पास आता है एवं उससे कहता है कि सभी लोगों की प्रशंसा किये जाने के बाद भी उसे उसके चित्र समझ में नहीं आए। वह उससे उसके चित्रों का व्याकरण पूछता है और उसका शिष्य बनने की इच्छा ज़ाहिर करता है। कलाकार उसकी बात से हैरान रह जाता है; क्योंकि आज तक किसी ने उससे इस तरह सवाल नहीं किया था। वह उस किशोर से कहता है कि जिन लोगों ने उसे महान बनाया है, वही उसके प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं; क्योकि वह स्वयं इन्हीं प्रश्नों से घिरा हुआ है। उसकी इस साफ़-दिल ईमानदारी भरी बात से वह किशोर अत्यन्त प्रभावित होता है और एक नए दृष्टिकोण से उसे देखकर कहता है, “यू आर रियली ग्रेट है” तथा उसे ‘सैल्यूट’ करता है। इस बात से उस चित्रकार को भीतर तक प्रसन्नता होती है।

इस लघुकथा में मानव चरित्र के दो विशेष गुण दृष्टिगोचर होते हैं ! प्रथम–आत्मसन्तोष से बड़ी दुनिया में ख़ुशी नहीं है। द्वितीय–आदमी के दिल की साफ़गोई, उसकी ईमानदारी यदि उसकी बातों में झलकती है, तो उसका जो सम्मान होता है वही सच्चे मायनों में उसे ऊँचा बनाता है।

इस लघुकथा में चित्रकार को बड़े-बड़े सम्मान संतुष्ट नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उसे पता था कि जिन चित्रों के अर्थ वह स्वयं नहीं समझ पाया उनको दूसरे कैसे समझ सकेंगे? अस्तु! उसे सभी सम्मान एवं प्रशंसनीय बोल झूठे लग रहे थे तथा वो बहुत बेचैन था। तभी जब किशोर आकर उससे अपने दिल का संशय बताता है तो वह समझ जाता है यह सच्चे दिल का व्यक्ति है। वह उसको सच्चे दिल से सही उत्तर दे देता है, जिसका प्रभाव यह होता है कि उस किशोर की नज़रों में वह बहुत ऊँचा उठ जाता है और वह किशोर उसे ‘सैल्यूट’ करता है। उसकी सच्चाई और साफ़गोई से मिला यह आदर उसे भीतर तक प्रसन्न कर जाता है।

कर्मठ व्यक्ति को अपनी कर्मशीलता का उपयोग करने के लिए उसी के अनुकूल स्थान मिल जाए तो उसे दुनिया में और कुछ नहीं चाहिए। ठीक इसी के उलट यदि किसी कामचोर व्यक्ति को उसके आलस्य को पालने योग्य स्थान मिल जाए तो उसे भी और कुछ नहीं चाहिए। ‘भीतर की आग’ तथा ‘ज़मीन की शक्ति’ लघकथाएँ इन्हीं दो प्रकार के व्यक्तियों के विषय में हैं।

भीतर की आग- पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त करने के पश्चात सुदीप के मन में एक आग है कि ‘वह जान लगाकर पत्रकारिता का दायित्व निभाएगा।’ एक मर्डर केस की छानबीन के दौरान वह कई फ़ोटो और सबूत इकट्ठा करके रिपोर्ट तैयार करके अपने सम्पादक को दिखाता है। सम्पादक पहले तो उसके कार्य से प्रसन्न होते हैं, उसकी स्मार्टनेस की प्रशंसा करते हैं; परन्तु जब रिपोर्ट में वे माफिया राधो सिंह के आदमियों के नाम देखते है तो सुदीप बुलाकर उसे उनके ख़िलाफ़ कोई भी रिपोर्ट बनाने के लिए मना करते हैं। वे कहते हैं कि इनकी पैठ राज्य के नेताओं तक है। ये लोग अखबार ही बन्द करा देंगे। जब सुदीप अपने पत्रकारिता के सिद्धांतों की बात करता है, तो वे उसे कहते हैं कि “जो उसने पढ़ा था, वो केवल आदर्श था, अब उसे व्यावहारिक होना होगा।” यह सुनकर सुदीप को बहुत गुस्सा आता है और वह क्रोधित होकर बिना कुछ कहे अपनी रिपोर्ट और फ़ोटो उठकर वहाँ से निकल जाता है, यह सोचकर कि यह नहीं तो कोई दूसरा या तीसरा अख़बार उसे सच सामने रखने का मौका तो देगा। उसके अन्दर एक आग जल रही होती है -यही आग ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की आग होती है। सच पूछा जाए तो इस आग के बग़ैर कोई भी कार्य बेकार है। यह आग ही हम इन्सानों के जीवित होने का प्रमाण होती है वरना सिर्फ़ साँसें लेने भर को ही जीवन जीना नहीं कहते।

इन्सान का स्वाभिमान उसका उसका सबसे क़ीमती धन होता है। इसका मोल वही समझ सकता है जो इसे ठीक से समझता है और इसकी क़द्र करता है। यह स्वाभिमान अक्सर हमारे हिस्से का सम्मान दिलाने में सहायक होता है। ‘स्वाभिमान’ एवं ‘आकाश छूते हौसले’ कुछ ऐसे ही भाव लिए हुए हैं। इन दोनों ही लघुकथाओं में लेखक अपने स्व-अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार ट्रेन से सफ़र करते हुए वे खीरा और ककड़ी खरीदते हैं। खीरा बेचने वाले व्यक्ति का बायाँ हाथ व दायाँ पाँव कटा हुआ होता है तथा ककड़ी बेचने वाला व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से कहीं से भी ककड़ी बेचने वाला नहीं लग रहा होता है। वह बड़ी उम्र का एक गम्भीर व्यक्ति था और ऐसा लग रहा था जैसे उसे किसी मजबूरी के कारण यह कार्य करना पड़ रहा हो। दोनों ही स्थितियों में लेखक खीरा और ककड़ी खरीदते हैं और उन्हें खिड़की से बाहर फेंक देते हैं, क्योंकि खीरा कड़वा निकल जाता है और ककड़ी लेखक को पसन्द ही नहीं थी, वो तो उन्होंने विक्रेता के प्रति सहानुभूति से भरकर ख़रीद ली होती है। दोनों के ही विक्रेता उन्हें यह करते हुए देख लेते हैं। जब वे दोबारा खीरा ख़रीदने के लिए विक्रेता की ओर पैसे बढ़ाते हैं, तो वह उन्हें खीरा देता है; परन्तु उनसे पैसे नहीं लेता और कहता है कि “उसे श्रम के पैसे चाहिए, सहानुभूति के नहीं! खीरा कड़वा निकल गया, इसकी ज़िम्मेदारी उसी की थी। अतः वह दोबारा पैसे नहीं लेगा।” उधर ककड़ी वाला उनको ककड़ी फेंकते हुए देखकर उनके दिए हुए नोट भी खिड़की से बाहर उड़ा देता है। लेखक उससे कुछ पूछे, उससे पहले ही वह उनसे कहता है कि “दया की ज़िन्दगी से तो भूख की मौत अच्छी! यदि उसे यही करना होता तो वह प्रमोशन के लिए अपने बेटी को अपने साहब के हाथों बर्बाद होने देता और अपनी नौकरी छूटने की नौबत ही न आने देता।” लेखक ऐसे स्वाभिमानी उत्तर सुनकर निरुत्तर हो जाते हैं।

इन दोनों लघुकथाओं में थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति के पुट का आभास होता है। किसी खीरे के ख़राब निकलने में उसका विक्रेता ज़िम्मेदार कैसे हो सकता है, यह बात समझ में नहीं आई। न ही यह कि यदि इस तरह वह हर ख़राब खीरे के बदले में मुफ़्त में और खीरे बाँटता रहेगा, तो कमाई कैसे करेगा? इतनी सजग ईमानदारी अब दुनिया में कहाँ बची है। इसी प्रकार, जिस तरह ककड़ी खिड़की के बाहर फेंकने की प्रतिक्रिया में विक्रेता ने नोट भी हवा में उड़ा दिए, यह बात भी, विक्रेता के स्वाभिमान से अधिक उसका सिरफ़िरापन दर्शाता है। स्वाभिमान और अभिमान में एक अत्यन्त ही महीन लकीर का अन्तर होता है। यहाँ पर यह आभास होता है कि विक्रेता उस लकीर को पार कर गया है। हो सकता है, उसके विगत जीवन के कटु अनुभव ने उसे ऐसा करने को मजबूर कर दिया हो।

कर्मनिष्ठा को प्रतिपादित करती लघुकथा ‘इक्कीसवीं सदी’ एक अच्छी लघुकथा इस अर्थ में है कि यह लेखकीय औचित्य को भी सिद्ध करती है। प्रायः विभागों में अभियंताओं को ठेकेदारों से काम लेना होता है। ठेकेदार टेन्डर पास करवाकर काम करते हैं। एग्रीमेंट के अनुसार ठेकेदार उचित सामान उपयोग नहीं करते और अभियंताओं को घूस देकर खुद भी मनमाना धन अर्जित करते हैं किन्तु ‘इक्कीसवीं सदी’ लघुकथा के नायक के जैसे अनेक अभियंता ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह ईमानदार होते हैं, एग्रीमेंट के अनुसार ही काम लेते हैं। ऐसे लोगों को प्रायः ठेकेदार परेशान करते हैं। काभी-कभी तो जान से मरवा देते हैं। इस कथा के नायक को भी यह धमकी मिली है। उसका अग्रज उसे जमाने के अनुसार चलने का परामर्श भी देता है किन्तु उसका कहना है कि मैं ईमानदार रहकर और चाहे कुछ न कर पाऊँ, लेकिन बेईमानी की इतनी लंबी गिनती में कम-से-कम एक अपनी गिनती तो आगे नहीं जोड़ने दूँगा। अपने विषय और उसके प्रतिपादन को लेकर यह लघुकथा प्रशंसनीय बन गई है।

  1. सामान्य एवं पुरुष स्वभाव से जुड़े मनोविज्ञान की लघुकथाएँ: लघुकथा ‘आग’ की नायिका के अपनी माँ के प्रति स्नेह की प्रगाढ़ता दर्शाती है। नायिका विवाह नहीं करती क्योंकि उसे भय है कि विवाह उसे ऐसे बंधन और ज़िम्मेदारियों में बाँध लेगा जिससे वह अपने आपको छुड़ा नहीं पाएगी तथा उस स्थिति में उसकी माँ उपेक्षित हो जाएगी जो उसे क़तई ग़वारा नहीं है। परन्तु अब वह उम्र के ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ कुछ पलों के सुख की मृगतृष्णा उसे अपने निश्चय से भटका रही थी। वह अनचाहे ही एक नौकर की तरफ़ आकृष्ट हो रही थी। परन्तु वह स्वयं को समय रहते ही सम्हाल लेती है और इस भयंकर पतन से अपने आपको बचा लेती है। अस्तु! अपने साथ-साथ वह दो जीवन बर्बाद होने से बचा लेती है। यह लघुकथा यौन मनोविज्ञान से जुड़ी एक स्वाभाविक लघुकथा है। इसके विषय का निरूपण अत्यंत कुशलतापूर्वक किया गया है। इसका शीर्षक भी अपना औचित्य सिद्ध करता है।

इंसान का मन कहाँ-कहाँ नहीं भटकता! कभी-कभी तो वह स्वयं से भी बेखबर हो जाता है और ऐसी बेतुकी उड़ान भरता है कि यदि समय रहते डोर न खींची जाए तो वह अपनी भद्द उड़वाने में कोई क़सर न छोड़े। शायद अक्सर मन में दबी इच्छाएँ ही उसे ऐसी अवस्था तक पहुँचा देती हैं।

लघुकथा ‘मृगतृष्णा’ के नायक भी इसी प्रकार के दिवा-स्वप्न के शिकार हुए। वे एक धनाढ्य एवं प्रतिष्ठित विधुर हैं। उनके जीवन में किसी चीज़ की भी कमी नहीं है -धन-दौलत, नौकर-चाकर, अच्छी नौकरी, शानदार कोठी और एक युवा बेटा भी। फिर भी, जब उनके मित्र उनकी आधी उम्र की लड़की की तस्वीर, उनके बेटे की शादी करवाने के आशय से उन्हें दिखाते हैं तो उन्हें स्वाभाविक रूप से अपने बेटे के रिश्ते की बात दिमाग में आने की बजाय उनके स्वयं के विवाह की बात मन में आती है। उस लड़की की शक्ल उन्हें उनकी मृत पत्नी जैसी लगती है। यह जानते हुए भी कि लड़की की उम्र उनकी उम्र की आधी है, उनके बेटे के बराबर है, वे अपनी सोच को लग़ाम नहीं लगाते। यहाँ तक कि अपने बेटे के चरित्र पर भी एक बार को शक़ की निगाह से देख-सोच लेते हैं। जब उनके मित्र उन्हें कहते हैं कि उन्हें एक बार अप ने बेटे से अवश्य ही पूछना चाहिए; क्योंकि जीवन उनके बेटे को गुज़ारना है, उन्हें नहीं। तब जाकर उनकी तन्द्रा टूटती है और वे स्वयं पर शर्मिन्दा होते हैं और शुक्र मनाते हैं कि उनके मुँह से कोई ऐसी बात नहीं निकली, जिससे उनके मन का हाल उनके मित्र को पता चलता। अन्ततः वे उसे अपने बेटे के लिए पसन्द कर लेते हैं और ख़ुश होते हैं कि अब घर में बहू आने से घर सूना नहीं लगेगा। इस लघुकथा को मनोवैज्ञानिक लघुकथा के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

‘मन के अक्स’ लघुकथा में मन संप्रेषित करने का प्रयास है कि मानव मन को ‘बुढ़ापे की दस्तक’ का भय बहुत सताता है, इससे हर कोई वाक़िफ़ है। वह बूढ़ा होना नहीं चाहता। सफ़ेद बाल उसकी चिन्ता को और भी बढ़ा जाते हैं। इस लघुकथा का नायक अक्षत भी अपने आप को बारबार आईने में निहारता है। कभी वह चेहरे पर लोशन लगाता है, कभी सिर पर तेल लगाकर कंघी करता है और स्वयं की तुलना फ़िल्मी सितारों से करके अपने आपको तसल्ली देता है। दफ़्तर को होती देरी भी उसे दर्पण के सामने से नहीं हटा पाती। बेटे के बुलाने पर डाइनिंग टेबल पर नाश्ते के पहुँचता है। उसका बेटा उसके मन की भय को भाँप जाता है और उसके यह पूछने पर की आज उसे तैयार होने में ज़्यादा समय क्यों लगा, वह अपनी पत्नी की ओर देखते हुए कहता है कि बुढ़ापे के साथ सुस्ती आ ही जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि हर इंसान सुंदर दिखना चाहता है और वह सुंदर है, यह बात स्वयं से अधिक दूसरों के मुँह से सुनना चाहता है। अक्षत भी शायद यही सोचकर डाइनिंग टेबल पर अपने बूढ़े होने की बात कहता है। जिसपर उसका बेटा तुरन्त उसकी ही भाँति उसे दूसरे प्रौढ़ नायकों के सामने युवा बताता है, जिसे सुनकर उसकी पत्नी उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा देती है। पत्नी की यह मुस्कान उसके अंदर एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा भर देती है और उसे महसूस होता है कि विश्व भर में उससे सुन्दर कोई अन्य पुरुष नहीं है।

‘रंग जम गया’ बहुत ही रोचक ढंग से एक अत्यन्त साधारण -सी, ‘मनोवैज्ञानिक सोच’ रखने वाली घटना का कथात्मक विवरण है। इस  लघुकथा जैसी स्थिति हम सभी के रोज़मर्रा जीवन में आती है, जब हम अपना रुतबा भी नहीं खोना चाहते, पीछे नहीं हटना चाहते और सामने वाले से उलझना भी नहीं चाहते। ऐसे में हम चाहते हैं कि कोई तीसरा व्यक्ति आकर बीचबचाव कर दे और बात वहीं ख़त्म हो जाए। आमतौर पर यदि किसी गली-मोहल्ले में ऐसी घटना घट रही होती है, तो बीचबचाव करने के बजाय, भीड़ वहाँ खड़ी केवल तमाशा ही देखती है और मज़ा लेती है। यहाँ भी वैसा ही कुछ दृश्य उपस्थित है-नायक नए मोहल्ले में आया है और अपने कमरे में होता है कि तभी बाहर से चिंघाड़ कर बातें करने की आवाज़ें आती हैं। खिड़की से झाँकने पर वह देखता है कि एक पहलवाननुमा व्यक्ति एक मरियल से आदमी को गालियाँ दे रहा है। वह ध्यान से उन दोनों के व्यवहार का परीक्षण करता है और देखता है, कि न ही पहलवान आक्रमण कर रहा है और न ही वह मरियल -सा आदमी चुप हो रहा है। वह पीछे तो हट रहा है; परन्तु बीच-बीच में कुछ बोलता भी जा रहा है। नायक को समझ में आ जाता है कि पहलवान चाहता तो एक मिनट में उस मरियल दिखने वाले आदमी की छुट्टी कर सकता था ; परन्तु शायद वह ऐसा नहीं करना चाहता। बल्कि वह तो चाह रहा था कि कोई बीच में आकर बचाव कर दे और मामले को यही रफ़ादफ़ा कर दिया जाए। परन्तु वह उस मोहल्ले में स्थापित अपना दबदबा नहीं खोना चाह रहा था; इसलिए पीछे भी नहीं हट रहा था। नायक इस बात अच्छे से भाँप जाता है और आकर पहलवान को यह कहते हुए पीछे खींच लेता है कि “चलिए हटिये! किस ऐसे-गैरे के मुँह लग रहे हैं, माफ़ कीजिए इस ग़रीब को, यह बेचारा तो स्वयं ही मरा जा रहा है।” पहलवान भी अपनी दुंदुभी बजाता हुआ वहाँ से हट जाता है और वहाँ एकत्र भीड़, मोहल्ले में आए इस नए विद्यार्थी को विजेताभाव से देखती है, जिसने कितनी आसानी से उस पहलवान को पीठ से पकड़कर पीछे खींचकर एक तरफ़ कर दिया। नायक की समझदारी एवं अक़्लमन्दी ने उसे (नायक को) भीड़ से केवल अलग ही नहीं कर दिया अपितु इस नए मोहल्ले में उसे सबकी निगाहों में ‘विजेता’ का सम्मान भी दिला दिया।

क्या पुरुषों को ही दुनियाभर में हो रहे क्रिया-कलाप के बारे में जानने का, उसपर चर्चा करने का अधिकार प्राप्त है? क्या पत्नियों को ऐसी चर्चाओं में, जिसमें उनके बारे में अथवा उनके घर-परिवार से सम्बन्धित बात न हो, में भाग लेने का कोई अधिकार नहीं, या उनकी ऐसी कोई इच्छा नहीं होती ? विवाहोपरान्त यदि पति का कोई मित्र आए, उनके घर में रहे, खाए-पिए, उनके बच्चों के साथ खेले,तो यदि पत्नी चाहे कि उसके पति एवं मित्र के बीच होती मनोरंजक चर्चाओं में वह भी भाग ले तो क्या ऐसा सोचना अशोभनीय है? यह लघुकथा कुछ ऐसे ही प्रश्न मन उत्पन्न करती है।

पति का कोई मित्र तीन दिनों के लिए आया हुआ होता है, वह उसके साथ कभी बाहर घूमने चला जाता है ,तो कभी किसी चर्चा में मशगूल रहता है। इस बीच वह अपनी पत्नी को भूल ही जाता है। पत्नी को यह बात अखरती है कि अब उससे बात करने का उसके पास समय ही नहीं है। वह उनके लिए खाना पकाती है, पूरा ध्यान रखती है परन्तु अकेलापन महसूस करती है और अपने पति से इस बात को लेकर चिड़चिड़ाती है। पति कहता है कि उसके और उसके मित्र के बीच उसकी या घर-परिवार की कोई बात नहीं होती ,बल्कि साहित्य की ही चर्चा होती है, तो उसे उसकी पत्नी को क्या लेनादेना! पत्नी इस बात से आहत होती है, वह स्वयं अपने क्रोध की वजह नहीं समझ पाती है। वह सोचती है, उसे अपने पति के मित्र से बात करना अच्छा लगता है, वह उससे बहुत इज़्ज़त से बात करता है, उसका स्वभाव अच्छा है, बच्चों से भी घुलमिल गया है। फिर क्या बात है, जो उसे दुःख दे रही है। अन्त में वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचती है कि उसे भी उनके साथ बैठकर बातें करने का दिल होता है, सो अब से वह उनको अपने व्यवहार से कष्ट पहुँचाने के बजाय उनकी मनोरंजक चर्चाओं का आनन्द लेगी।

शायद हमारे समाज में ही स्त्रियों के चारों ओर ऐसी लक्ष्मण-रेखा खिंची हुई है कि वह स्वयं ही अपनी हर इच्छा को ‘अपनी मर्यादा तो नहीं लांघ रही’ की सोच लेकर तौलने लगती है और डर कर या तो अपना मन मारकर पीछे हट जाती है या फिर अपने ही विचारों में उलझ जाती है। पत्नी के चिड़चड़ाने की भी यही वजह है। एक तरफ़ तो उसे यह बात अच्छी लगती है कि पति का मित्र बहुत अपनेपन और इज़्ज़त के साथ उसके घर में रह रहा है, दूसरी तरफ़ वह यह सोचने लगती है कि कहीं वह अपने धर्म से तो नहीं हट रही है। इस मानसिक द्वन्द्व का सुंदर चित्रण करते हुए, अन्त तक आते-आते लेखक ने यह भी दर्शा दिया है कि वह जब चाहे अपनी ‘सोच के इस जाल’ को काटकर, अपना भला-बुरा समझने की बुद्धि का इस्तेमाल कर बाहर निकल सकती है और अपने पति के ही समान हँस सकती है, बात कर सकती है, मनोरंजनपूर्वक जीवन जी सकती है।

‘ज़मीन की शक्ति’ के नायक एक फैक्ट्री में काम करते हैं और अब रिटायर होने वाले हैं। उन्होंने फैक्ट्री में अपना अधिकतर वक़्त फुटबॉल की बातें करके ही बिताया था। हालाँकि वे कोई बहुत बड़े फुटबॉलर भी नहीं थे। जब तक उनके चार्जमैन स्वयं एक फुटबॉलर थे, उन्हें ऐसा करने में कोई समस्या नहीं हुई, परन्तु उनके ट्रान्सफर होने के बाद जब मुख़र्जी चार्जमैन बनकर आए तो उसके आगे आरामतलबी और कामचोरी की एक न चली। मुखर्जी तो उन्हें जब-तब बॉयलर में घुसने का आदेश दे देता था। अभी तक तो उनकी उजली शर्ट पर एक भी धब्बा नहीं लगा करता था, मगर मुखर्जी के आने के बाद से उन्हें दिन में दो बार कपडे बदलने पड़ते थे। उनको यूँ लगता था जैसे मुख़र्जी से उनके उजले कपड़े बर्दाश्त न होते हों। उनके लिए अब ये अहं की लड़ाई हो गई थी। परन्तु अब मुख़र्जी का भी ट्रान्सफर हो गया था और अब तक उनकी ये अहं की लड़ाई किसी और से न होकर स्वयं से हो चुकी थी। इस लड़ाई में वे स्वयं ही टूटते जा रहे थे। इस वक़्त उन्हें अपनी पत्नी का ध्यान आ रहा था, वह सदा ही उनकी समस्याओं का समाधान चुटकियों में हल कर देती थी। उसका अभाव उन्हें आज खल रहा था। तभी उन्हें महसूस होता है कि उनकी पत्नी का प्यार-भरा स्वर उनके अन्तस् को कह रहा है कि “अब वे रिटायर होने वाले हैं। प्लेयर भी नहीं हैं। कल से उन्हें अपनी ड्यूटी की यूनिफार्म पहनकर जाना चाहिए। नए अफ़सर के साथ नए सिरे से अहं पालने की अब कोई आवश्यकता नहीं है। नीचे से ऊपर जाना बहुत सुखद होता है परन्तु ऊपर से नीचे आने में बहुत दुःख होता है। अतः उन्हें ज़मीन से ही जुड़े रहना चाहिए और अपने अहं को भुलाकर बाहर आना चाहिए।” अब उन्हें तसल्ली हो जाती है।

अहं की ये लड़ाई किसी कार्य को लेकर नहीं थी बल्कि अपनी आरामतलबी को लेकर थी। काम न करने के वे इतने आदी हो चुके थे कि अब काम करना उनको उनकी शान के ख़िलाफ़ लगता था। हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे अहं के उदाहरण कई मिल जाएँगे। मगर ग़नीमत है कि उनकी पत्नी के भेस में आकर उनके अन्तस् ने उनको समय रहते चेता दिया और वे सही रास्ते पर आ गए।

‘पुरुष’ लघुकथा में सामान्य यौन मनोविज्ञान को प्रस्तुत करने का सुंदर प्रयास है। ‘पुरुष’, वह चाहे किसी आयु का हो, का यह स्वाभाविक मनोविज्ञान है कि यदि नारी-स्वर उसे सुनाई पड़ता है, तो वह उसका चेहरा देखना चाहता है। यदि नहीं दिखाई देता तो ऐसी स्थिति में पुरुष का जो मनोविश्लेषण होता है उसे इस लघुकथा में बहुत ही सलीके से प्रस्तुत किया गया है, यानि इसका प्रतिपादन बहुत ही सुंदर ढंग से हुआ है। वैसे भी पुष्करणा जी की यह लघुकथा काफ़ी चर्चित है। इसका शीर्षक भी बिल्कुल सटीक है।

इसी प्रकार लेखक की एक अन्य लघुकथा ‘मन के साँप’ बहुत ही चर्चित लघुकथा है। इसका शीर्षक भी प्रतीकात्मक है। यह लघुकथा एक ऐसे पुरुष का यौन मनोविज्ञान है, जिसकी शादी हुए बहुत कम समय हुआ है और उसकी पत्नी कुछ दिनों हेतु मायके चली गई है। ऑफिस से घर लौटने पर उसकी नौकरानी ही घर में है। ऐसी स्थिति में नायक का जो मनोविश्लेषण हो सकता है, उसे लेखक ने तरह-तरह के संप्रेषणीय प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की है। पुष्करणा जी की इस लघुकथा यह प्रमुख विशेषता है कि वह कहीं भी जुगुप्सा नहीं जगाती, अपितु उसका शमन करती है। हालाँकि ऐसी लघुकथाएँ लिखना तलवार की धार पर चलने जैसा है क्योंकि ऐसी लघुकथाएँ लिखने में अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता होती है।

इस लघुकथा का कथात्मक विवरण और उसकी कलात्मक प्रस्तुति उसे इस कदर रचनात्मक बना देती है कि पाठक पढ़ते-पढ़ते सरसता से बहता चल जाता है। भाषा-शैली इस लघुकथा की अतिरिक्त विशेषता है।

  1. धर्म-संप्रदाय संबंधी लघुकथाएँ: इस श्रेणी में यों तो पुष्करणा जी की अनेक लघुकथाएँ पढ़ने में आती रही हैं कितनू यहाँ ‘इबादत’ एवं ‘सही दिशा’ की ही चर्चा करूँगी। ‘इबादत’ किसे कहते हैं? यह बताना ही शायद इस लघुकथा का अभीष्ट रहा है।

एक सज्जन बस में यात्रा कर रहे थे। बगल में बैठी एक महिला की गोद में बैठ बच्चा उन सज्जन के पास रखे बधने (मुसलमानी लोटा) को छू रहा था। उन्होंने आव देखा न ताव, बच्चे को झटक दिया और बच्चा रोने लगा। बगल में बैठे एक सज्जन, जो यह सब देख रहे थे, बोले, “मोहतरम, मैं भी मुसलमान हूँ…और रोज़ेदार न होते हुए भी मैं उस अल्लाह-ताला की नज़र में आपसे ज्यादा रोज़ेदार हूँ…जनाब उसके बनाए बंदों, खासकर बच्चों से मुहब्बत करना ही उस परवरदिगार की सच्ची इबादत है।”

लघु आकार में यह एक सुष्ठु एवं भावपूर्ण लघुकथा है, जो वांछित प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह से समर्थ है। सीधी-सादी वांछित भाषा-शैली एवं इसका शीर्षक इस लघुकथा के पुष्ट एवं सुंदर पक्ष हैं।

‘सही दिशा’ बहुत कम शब्दों में सांप्रदायिक एकता पर सटीक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती सुंदर लघुकथा है।

ट्रेन के एक डिब्बे में ब्राह्मण, हरिजन, मौलवी साथ-साथ बैठे यात्रा कर रहे थे। वे आपस में बैठे छुआछूत और सांप्रदायिक रूढ़ियों में जकड़े नोंक-झोंक में इस कदर उलझे थे कि एक-दूसरे को आदमी तक मानने को तैयार नहीं थे।

एकाएक ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। सहायतार्थ सेना आई -मलबे को हटाकर लाशें निकालने के क्रम में ही उस डिब्बे के मलबे को हटाया, देखा -ब्राह्मण महाराज लुढ़के पड़े थे, उनके मुँह के ऊपर ही हरिजन का मुँह और बगल में चिरनिद्रा में सोये मौलवी साहब का दाहिना हाथ ब्राह्मण के दाहिने हाथ में ज़ंजीर की भांति गुँथा हुआ था।

सबका मिला हुआ रक्त जाति एवं सांप्रदायिकता की रूढ़ियों को मुँह चिढ़ाता हुआ ठोस हो चुका था।

श्रेष्ठ एवं कसी हुई लघुकथा है यह, जो सांप्रदायिकता की ग़लीज़ सोच रखने वालों के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा है।

और अंत में ‘ऊँचाई’ की चर्चा महत्त्वपूर्ण है। इसमें एक शिष्य का शिक्षक से वार्तालाप है। शिक्षक आर्थिक ज़रूरत पड़ने पर अपने धनाढ्य शिष्य के पास सहयोग हेतु जाता है। शिष्य समझ लेता है। अतः वह कहता है, “गुरु जी, इन दिनों तो मेरा कारोबार घाटे में चल रहा है।” गुरु कहते हैं, “मैं तुम्हें सहयोग करूँगा।” शिष्य कहता है, “आप स्वयं आर्थिक तंगी से गुज़र रहे हैं तो आप मुझे कैसे सहयोग करेंगे?” गुरु कहते हैं, “बेटा, आर्थिक दृष्टि से विपन्न हूँ, मन से नहीं। मैं अपना दायित्व पूरा करने हेतु जो भी छोटा-मोटा घर-द्वार है, बेचकर तुझे सौंप दूँगा ताकि तुम थोड़ा ही सही, किन्तु अपना काम-धाम कर सको।”

ग्लानि भरे शिष्य के मुँह से अकस्मात् निकल गया, “गुरु की ऊँचाई हिमालय है।” इसीलिए इस रचना का शीर्षक ‘ऊँचाई’ रखा गया है, जो उचित ही है। पुष्करणा जी ने यह बताने की चेष्टा की है कि वस्तुतः आर्थिक दृष्टि से समृद्ध व्यक्ति ही बड़ा नहीं होता, बड़ा और ऊँचा वह होता है, जिसके विचार ऊँचे होते हैं।

पुष्करणा जी की लघुकथाओं का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। शायद ही कोई विषय ऐसा होगा जो आपकी पारखी निगाह से बचा होगा ! समाज और राजनीति से लेकर मानवीय सम्वेदनाएँ तथा हृदय और मस्तिष्क के उलझते हुए धागों का भी ख़ूबसूरत वर्णन एवं चित्रण आपकी लघुकथाओं में दृष्टिगोचर होता है। मनुष्य के जीवन को उसके बहुआयामी रूपों में स्वीकार करके, उसे दर्शाने के साथ ही, मानव-स्वभाव के विविध पक्षों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए अत्यन्त ईमानदारी के साथ अपनी लघुकथाओं में उतारा है। फिर चाहे वो धार्मिक सहिष्णुता हो, राजनीति हो, जिससे साहित्य भी अछूता नहीं बचा; माता-पिता-पुत्र के बीच का तनाव हो; माता-पिता के प्रति स्नेह एवं त्याग हो; मालिक-नौकर के बीच की तानाशाही हो; दोस्तों के बीच पनपने वाली ईर्ष्या एवं स्वार्थसिद्धि हो; ग़रीबी और स्वाभिमान की टक्कर हो; समाज में आए दिन होने वाले शर्मनाक अपराध एवं कुरीतियाँ और उनसे उदासीन आज की जनता की मजबूरी हो; पति-पत्नी के स्वाभाविक, आत्मिक एवं बेहद निजी एहसास हों; या फिर पुरुषों/ स्त्रियों के मन में उठने वाली अनचाही साँप सरीखी इच्छाएँ ही क्यों न हों -सबका उपचार पुष्करणा जी ने बहुत बेबाक़ी के साथ निःसंकोच होकर किया है। यह ईमानदारी हर लेखक में नहीं पाई जाती। यही नहीं, हर मानसिक संघर्ष में अन्त में उन्होंने जीत सदा सच्चाई तथा ज़मीर की ही दिखाई है। अतः इस प्रकार वे समाज के प्रति अपने एक बहुत बड़े दायित्व का निर्वाह करते हैं।

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