गणेशी मसान से ढोल गले में लटकाए और दोनों बाजुओं को हवा में बेकाबू सा लहराता -, झूमता – झामता कोठारी को लौट रहा था । उसके कदम बेहिसाब उठ रहे थे । उसका मन आज न जाने कौन -सी धुन अलाप रहा था। थोड़ी – थोड़ी देर में वह अपने आप ही कुछ – कुछ बड़बड़ाता चल रहा था ।
” नहीं …..नहीं …..अब कभिच्च नहीं बजाऊँगा , चाहे भूख से क्यूँ न मरना पड़े । पैसे के लाने तो कभिच्च न बजाऊँगा किसी की मैयत पे ” । राह चलते सभी राहगीर उसे पलट – पलट कर ताक रहे थे । जब वह शनिचरी हाट से गुजरा तो दिलावर चचा ने पीछे हे हाँक लगाई , बोले ——– ” गणेशी ……अरे हो गणेशी , लगता है आज तो बहुत गजबे मालमत्ता हाथ लगे है तभिच्च मैं भी कहूँ साल्ला आज गणेशी के पैर काहे झूम रहा , जुबान काहे न काबू धर रहा । ”
” नहीं न चचा नही , कुछु नही हाथ लगा ।जो भी मिला रहा हम फैंक आये उनके मुँह पे । ”
” पर बड़ा झूम झाम रहा , पाँव तो जमीन पर धर ही नहीं रहे तेरे , काहे झूठ बोल रहा रे ……..बूढ़े चचा से ……..? ”
” न चचा न ,….. अब कभिच्च न बजाईब ….. न ..न …कभिच्च नही । ” किसी तरह मन मसोस कर बोला कि एक क्षण को दिलावर चचा सकपका गए । पीठ पर गणेशी के हल्का सा हाथ धर कर बोले —–” गणेशी लल्ला… नई बजाईब तो खइबे का…. ओखर लाने ही तो सब टंटा , अब तो तुम्हरा बाबूजी भी तो जिन्दा न बचें है लल्ला ….. घर भर .सबके पेट में का भकोसेगा ……पेट ही तो दुसमन ठहरा हम गरीबन का । ”
” न…..चचा नहीं , अब कभिच्च नहीं न बजाईब …… मन में इक फाँस खुब गई है , मरने के बाद मसान , मसान के बाद नर्मदा , नर्मदा में अस्थि सिरा कर खाली हाथ लौटना , ढोलची हूँ <तो का भया जिया हमरा भी जलता है । एक आग की लपट उठती है , और सारा सरीर खाक ……….धू – धू कर जलता है । सोच रहे हम की ये साला कैसी जिनगी भला —— जब तक जियो, जिनगी भर पेट की खातिर लात जूते खाओ ,एड़ियाँ रगड़ – रगड़ कर पिसे जोड़ो अऊ ओ पिसे के लाने भाई – भाई में खूना – खच्चर , बेटा बहू से दो मुट्ठी भात के लाने करेजा जला – जला कर धुन्धुआ जाती बूढ़ी आँखें । अब जाके अस्सी साल में मरा बुढहू { बुड्ढा } साले लोग दिन रात मेवा , मिठाई और फल बाँट रहे हैं गरीबो में । अब श्राद्ध के दिन बाम्हनो की पंगत बिठाएँगे …..ढेरों फल , मेवा , मिठाई नर्मद्दा में चढ़ाएँगे , और कहेंगे …” बाबूजी भूल – चूक माफ़ । खा लो और तृप्त हो लो । अब बुढाऊ खाए क्या ? बुड्ढे के मुँह में दाँन्त नहीं , पेट में आँत नहीं ……नहीं जनते क्या साले लोग की सीने में साँस नहीं । दलिद्दर साले ………अब दान पुन …..जीते जी दो मुट्ठी भात को कितना रुलाया । अब मर गए< तो ढोलची बुलवाकर पोते – पोती , नाती – नतनी नचाएँगे ……..देखो अस्सी साल जीकर मरा है …तुम्हरा नाना , तुम्हरा दद्दा । थू – थू है ……….ऐसी जिनगी और ऐसी मौत पर ………..”
-0- मीता दास, 63/4 नेहरूनगर पश्चिम , भिलाई , छत्तीस गढ़ -4900020 फोन नंबर: 08871649748 , 09329509050 ; ईमेल : mita.dasroy@gmail.com