बाजार में बंद पड़ी एक दुकान के फट्टे पर चढ़कर एक युवक बोलने लगा, ‘‘खल्क-खुदा की। हुक्म बादशाह का। तंत्र प्रजा का। वेश फकीर का। चेहरा प्रधान का। चरित्र तानाशाह का। इच्छा पूँजी नाथ की। इशारे कम्पनियों के। खून हमारा। पसीना हमारा। मेहनत हमारी। शक्ति हमारी। सत्ता उनकी। पावर उनकी। मल्कियत उनकी। पहाड़ उनके। जमीन उनकी। इमारतें उनकी। कारखाने उनके। माइन्स उनकी। खजाने उनके। अफसर उनके। सिपाई उनके। डंडे उनके? मुल्क हमारा। भूख हमारी। बेरोजगारी हमारी। अभाव हमारे। कंगाली हमारी। विवशता हमारी। फिर भी हमारा राज। हमारे द्वारा, हमारे लिए । वह जो दिए थे तुमने अपने हाथ काटकर। वही जो दिया था वोट? अब भुगतो……? बनाया सेवक? हुआ कब्जा? हमने पाला हमीं को भौं-भौं। हमारी जूती ….? हमारे डन्डे? हमारे सर?
राज है जिसका वह राजा है भूखा। राजा है नंगा। राजा है बेघर। मांगेगा जो रोटी कपड़ा और रोजगार। माना जाएगा उसे गद्दार। गद्दी पर है चौकीदार। उसे हासिल है सेठ का दुलार। करवाए प्रचार। समझे सिर्फ सेठ का अधिकार। उसे पसंद नहीं चींख पुकार। करेगा जो हाहाकार होगी आंसू गैस लाठीचार्ज और गोलियों की बौछार। करो जय-जय कार, बार-बार, हर बार। यही सरकार। यही सरकार। ये नहीं तो वो सरकार वो नहीं तो ये सरकार। करो जय-जय कार। करो जय-जय कार।
बाअदब-बामुलाहिजा होश्यार! होश्यार ! बनो होश्यार! रहो होश्यार। रहो होश्यार!
‘‘यह है जुमलेबाजी। अच्छे-अच्छे बोल-ढोल की पोल। कट गए हैं हाथ बाकी है जान। सलामत है जुबान। करेगी जमीनी हकीकत बयान। सुनेगा जहान करता रहा मेरा दादा उम्र भर घाटे का सौदा। उगाता रहा अनाज। नहीं की थीं उसने आत्महत्या। सरकारी नीतियों, लालों-दलालों ने की थी उसकी हत्या। कम्पनी को चाहिए हमारी जमीन। सरकार ने हमारी जमीन अधिग्रहण करके दे दी कम्पनी को। मेरे पिता बैठे विरोध में धरने पर। विरोध में खानी पड़ी उन्हें गोली।
जिन्हें हमने बिठाया सिर पर। उन्होंने मारी गोली आँसू गैस और डन्डे? कैसे हमारा राज। हमारे द्वारा। हमारे लिए?’’
वहाँ जुट आए कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया। “ साला हमारे बादशाह को झूठा कहता है। मारो साले को!” भीड़ ने मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया। वह नीचे गिर कर बेहोश हो गया।
भीड़ में से एक बुजुर्ग महिला ने आगे आकर कहा, ‘‘मत मारो बेचारे को। बेचारा अपना मानसिक संतुलन खो चुका है। इसकी माँ ने लोगों के घर बर्तन माँज-माँजकर और कुछ इधर-उधर से कर्जा लेकर इसे उच्च शिक्षा दिलाई।
लेकिन नौकरी नहीं लग पाई। सरकार ने कहा पूड़ी-पकौड़े की रेहड़ी लगाओ। इसने इधर-उधर से कर्ज लेकर पकौड़े की रेहड़ी लगाई। एक दिन कमेटी वाले आए और इसके बर्तन रेहड़ी गाड़ी में लादकर ले गए। यह छुड़वाने गया, तो उन्होंने पाँच हजार का चालान या चार हजार रिश्वत भरने को कहा। कहाँ से देता? कोई चारा नहीं था इसके पास। यह जाकर बेरोजगारों के धरने जुलूस में शामिल हो गया। फिर पुलिस का एक डण्डा इसके सिर पर लगा और यह तब से अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है। कहता है- राज मेरा है। मेरे द्वारा है। मेरे लिए है फिर भी ……?’’
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