जून 2026

देशतन- ख्वाह     Posted: February 1, 2024

कहने को तो फागुन था, लेकिन हवा में अभी भी खुनकी बनी हुई थी।  सुबह तड़के तड़के ठंडे जल से स्नानादि करके मैंने भैंरों चट्टी से शक्ति पीठ के दर्शन हेतु चढ़ाई आरम्भ की।  शाम ढलते- ढलते शक्ति पीठ के दर्शन कर मैं वापस ठुलीगाड़ आ चुकी थी।  

सिद्धपीठ की  सवारी गांठे अनेकानेक छोटे बड़े मंदिर पहाड़ों के कंधे पर जनेऊ सी लहराती शारदा किनारे ऐसे धरना दिए हुए थे जैसे- मंदिर के प्रांगण से लेकर तोरण तक बैठे याचक।

एक याचक- मंदिर अपने देवता और पुजारी के साथ कुछ सकुचाया सा पहाड़ी की गोद में दुबका था।

आस्था की अफीम चाटे मैं सभी छोटे बड़े मंदिरों में फल- फूल दक्षिणा अर्पित करती उस मंदिर के देवता के आगे भी नतमस्तक हुई।  देवता के सीधे हाथ की तरफ एक आसन पर सफेद चन्दन से भाल पर लम्बा तिलक लगाए पुजारी संध्या आरती के लिए फूल बाती बनाने में जुटे थे ।  

मैंने पत्र- पुष्प पुजारी के हाथ देते हुए कहा; ”भगवान को चढ़ा दीजिए।” उन्होंने देवता के श्री चरणों में मेरा नैवेद्य अर्पित  कर अपना स्थान ग्रहण किया।  मैं घुटनों पर गिरकर देवता से न जाने क्या क्या माँगती रही।  अचानक दिमाग ने हूल दी, कि केवल माँगती ही रहोगी या कुछ दोगी भी।  मैंने झट से देवता के आगे रखे दानपात्र में कुछ रुपये खोंस दिए।  फिर याद आया, चलो, संध्या आरती होने में कुछ विलम्ब है तो मैं ही आरती करके कुछ और पुण्य कमा लूँ।  मैंने पुजारी से एक घी डूबी बाती और माचिस माँगी।

पुजारी ने जलती आँखों से मुझे देखकर कहा; “जिसे पैसे चढ़ाए जाओ, उसी से बाती और माचिस माँगो।”

मैं सन्न रह गई।  कानों पर भरोसा नहीं हुआ।  मेरा एक मिनट उस तिलकधारी को घूरने में बीत गया।  

आस्था और सात्विकता का भी अपना बहुत गहरा नशा होता है।

उसी नशे में मैंने झूमकर कहा- “क्या कहते हो पंडित जी, दानपात्र तो पैसे चढ़ाने के लिए ही रखा है न…”

पुजारी बत्ती बनाते हुए खीझकर बोला-  मेरी प्लेट भी तो रखी है,  वह नहीं देखी आपने… पेट केवल मंदिर बनवाने वाले का ही नहीं, तनख्वाह वाले पुजारी का भी होता है…

छन्न…

मुझे सात्विक नशा टूटने की आवाज बहुत देर तक आती रही…।

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