
साहित्यिक संस्था नारी अभिव्यक्ति मंच ‘ पहचान ‘ फरीदाबाद ने जो शब्द-यज्ञ रचाया था, उस यज्ञ के धुएँ से जन्मा ऐसा प्रकल्प है, जिसकी अवधारणा को पूर्ण बनाने में विख्यात लघुकथाकार कमल कपूर ने गुरुतर दायित्व का निर्वहन करते हुए कार्यरूप में सम्पादक का भार काँधे पर लेकर इसे ज़मीनी बनाया और नाम दिया-‘तपती पगडंडियों के पथिक।’
वर्तमान में हिन्दी लघुकथा लेखन का रकबा सम्पूर्ण आकाश के नीचे यानी हमारे देश से लेकर विदेश की धरती तक फैल चुका हैं , इस बात के लिए हम गौरवान्वित हुए हैं। किसी विधा का सितारा तभी बुलन्दी का स्पर्श करता है जब संबंधित विधा में बेहतर रचनाकारों का बाहुल्य रेखांकित होने लगता है , सिर्फ मात्रा के लिहाज से नहीं प्रत्युत उत्कृष्टता के अर्थ में भी। लेकिन इस सोच के पीछे यह मन्तव्य कतई नहीं हैं कि आज जो भी लघुकथा के नाम पर लिखा जा रहा है वह सबकासब सर्जना के शास्त्रीय मापदण्ड एवं व्यावहारिक परिमाणों से उपयुक्त ही है। बहरहाल …
कमल कपूर के सम्पादन में उपस्थित हुआ लघुकथा संकलन ‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ आज के लघुकथा संसार में उपयोगी एवं चर्चा की बहुतेरे आयामों को लेकर पेश हुआ है।
210 लघुकथाकारों से पाटी गईं हैं पगडंडियाँ
लघुकथाकार कमल कपूर लघुकथाओं का नये शाहकार के साथ लघुकथा विधा के पक्ष में वेशकीमती तोहफ़ा लेकर उपस्थित हुईं हैं। देश – विदेश की धरती से हिन्दी और हिन्दीतर प्रान्तों से आने वाले लघुकथाकारों का एक सारस्वत मेला ‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ के नाम से संयोजित कर कमल कपूर ने समकालीन लघुकथाकारों की कलम की पहचान लघुकथा के मौजूदा दौर से कराई हैं।
1971 से अद्यतन यानी समकालीन लघुकथा के स्वर्णिम वर्ष की पूर्णावधि के बाद कमल कपूर की एकाकी दृष्टि के फलस्वरूप प्रस्तुत लघुकथा संकलन ‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ लघुकथा विधा के आगे का मार्ग प्रशस्त करने में बतौर सहायक निरूपित होगा।
कहना न होगा कि अब लघुकथा साहित्य से भी जीवन जुड़ चुका हैं। विधा के साथ जीवन का जुड़ना मान्यता के हिसाब से आधुनिक बोध की संश्लिष्टता लघुकथा विधा में भी अंतर्दृष्टि के साथ अन्तःशैत हुई प्रतीत हैं। इस नाते कमल कपूर द्वारा संपादित उक्त लघुकथा संकलन लघुकथा की विरचना में दाख़िल नए मूल्यों से परिचय कराता मिलता हैं।
मूल्य तभी बदलते हैं जब नयी आमद नई जीवन दृष्टि के साथ पुरानी मान्यताओं को ख़ारिज करते हुए तमाम विसंगतियों का शल्य कर लोकमंगल की विचार धारा की दुंदुभि से सामाजिक जीवन के परिचालन में प्रीतिकर पगडंडियाँ बिछाकर सर्जना को उचित स्थान देने की पहल में मन्जिल के ठहरावों का पता जनमान्यताओं में चस्पा करती हैं।
‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ संग्रह का प्रकाशन लघुकथा के ऐसे संक्रमण काल में उपस्थित हुआ है जहाँ लघुकथाएँ लेखन की दृष्टि से ‘ बाधा दौड़ ‘ यानी हर्डल रेस और वह भी बिना कोई नेतृत्व या झंडावरदारी के हो रही हैं। हर कोई वर्तमान में लिखीं जा रहीं लघुकथाओं से संतुष्ट नज़र नहीं आ रहा हैं। उचित दिशा के अभाव में वर्तमान कालिक लघुकथा लेखन कार्य के मध्य बड़ा दिग्भ्रम हैं।
कमल कपूर ने ‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ संकलन को तैयार कर बड़ा निदान आज के लघुकथा दौर को मुक्तहस्त से दिया है। प्रस्तुत संग्रह को मैं लघुकथा के उन्नयन के क्षेत्र में एकमुश्त कार्य की संज्ञा प्रदान करता हूँ।
* लघुकथा समुद्र का मन्थन और अमृत घट
पगडण्डी को राजपथ में तब्दील करने में बड़ी दृष्टिसंपन्नता खर्च हुईं हैं। 210 लघुकथाकारों को पगडण्डी पर उतारना मानों लघुकथा का अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने जैसा चुनौतीपूर्ण कार्य था। कमलकपूर ने बड़ी जिम्मेदारी से इस महत कार्य का सम्पादन सम्पन्न किया है।
विचार वैविध्यता से परिपूर्ण , सामाजिक सरोकारों से लबरेज़ , व्यक्ति की आन्तरिक पीड़ा का उत्कीर्णन करने की जिज्ञासाएँ , विकारग्रस्त जीवन के परिशोधन की दिशाएँ , मानवीय मूल्यों के संरक्षण की तीव्र लालसाएँ , अभावों के सुराखों से अतृप्त जीवन की परिदशाएँ , बाज़ारवाद के चक्रव्यूह में अटके पड़े विषमताओं के सूत्र और भी बहुत कुछ। इन्हीं अनगिनत कारकों की वानगियों से सवार प्रस्तुत लघुकथा संग्रह ‘ तपती पगडंडियों के पथिक ‘ लघुकथा विधा का बृहत ग्रन्थ बन गया है , जिसके साथ पठन की अनिवार्यता जुड़ी हुईं प्रतीत होती हैं।
वैसे तो प्रस्तुत संकलन में संपादित हर लघुकथा चयन के आधार से पारित होकर , अपनी रचनात्मकता से मुकम्मल होकर , कसी हुईं अनुभव होती हैं। ताहम भी कुछेक लघुकथाएँ ऐसी हैं जिन्होंने संकलन को वेशकीमती बना दिया है। मसलन , इमरजेंसी , प्लास्टिक की श्रद्धा , दूध , छोनू , सात ताले और चाबी , अधिग्रहण बनाम विलीनीकरण , सुख की साँस , पुनर्भव , प्रतिपक्ष , तुमबिन , अगले जनम में , रेल की पटरियाँ , विजय जुलूस , मरुस्थल के वासी , चौराहे पर , मास्टर , पंख , ग्यारहवीं सन्तान , व्याख्या , अभिशाप , माँ का चश्मा , मर्द निर्भया , जगह नहीं बची , संवेदना की आँख , कश्ती में सवार , खामोशी , गंगाजल , ताप , समय के पदचिह्न , गिरगिट , फौजी , अमानत , इतना ही कहना था , औरत को रोबोट मत बनाओ , प्रतिबिम्ब , लाइफ लाइन , मर्द , गुनाह , टर्निंग पॉइंट , सतोलिया , वक्त की चाल , सम्बन्धों की गरिमा , संस्कार , दृष्टिकोण , रपट , स्टेटस , अच्छा है हम पक्षी हैं , दो टूक , मृगतृष्णा , मास्टर चाबियां , फर्क , सबसे महंगा , आसन्न मृत्यु , लेन देन के रिश्ते , दावत – ए – दारू , माँ के ज़ेवर , घुटने का दर्द , सपनों की कोंपलें , सफलता आदि … आदि …।
‘ तपती पगडण्डियों के पथिक ‘ लघुकथा संग्रह में जिस मैयार की लघुकथाएँ सम्मिलित हुईं हैं उनका गवेषणात्मक अध्ययन करने से यह बात निर्विवाद रूप में कहीं जा सकती हैं कि अपनी तमाम विशेषताओं के आधार पर प्रस्तुत संकलन का सम्पादन कर कमल कपूर लघुकथा सन्सार में परिश्रमी , विधा के प्रति अतिचिंतित , गम्भीर मीमांसक और लघुकथाओं के चयन में बेलाग अन्वेषी की संज्ञा से अभिहित की जा सकती है।
‘ तपती पगडंडियों के पथिक’ लघुकथा संग्रह पूरी तरह से त्रुटि रहित , टंकण में स्पष्ट होकर पठनीय , आकर्षक जिल्द सज्जा के इलावा लघुकथाकार बलराम अग्रवाल की सुविचारित भमिका , डॉ.शील कौशिक का आधी आबादी के लघुकथा लेखन विधा के प्रति अवदान बाबत विमर्श , डॉ.अशोक भाटिया एवं चन्द्रेश कुमार छतलानी
की बतौर फ्लैप मैटर लघुकथा की दिशा में ज़रूरी सन्देश प्रदान करती वैचारिक टिपण्णी के साथ उपयोगी रूप में सामने आया है।
जिम्मेदारी , संकलन में स्थान पाने वाले लघुकथाकारों की
210 लघुकथाकारों की महत उपस्थिति से ‘तपती पगडण्डियों के पथिक’ संकलन अपने कलेवर से भारी भरकम्प आकार में तैयार होकर सामने आया है। प्रस्तुत संकलन की महत्ता उसे पढ़े जाने पर ही सिद्ध होंगीं। इस सिलसिले में गुरुतर दायित्व उन लघुकथाकारों का हैं जो संकलन में हैं मगर संकलन की प्राप्ति विधयक आस लगाये हुए हैं। जबकि होना यह चाहिये कि संकलित लघुकथाकार प्रस्तुत संकलन की प्रति ख़रीदने हेतु ख़ुद आगे आएं। समेकित रूप में 210 लघुकथाओं को पढ़ने का लुत्फ़ उठाएं और जाने कि आधुनिक लघुकथाओं की रचनात्मकता का सवाल कितना हल हो पाया है साथ ही समकालीन लघुकथाओं की दशा , दिशा एवं सम्भावनाओं विषयक अभी और कितनी चर्चाएँ होना बाक़ी हैं। बहरहल…
प्रस्तुत बृहत् लघुकथा संकलन में स्थान पाने वाले सभी चयनित लघुकथाकारों को दिल से बधाई।
पुस्तक : तपती पगडण्डियों के पथिक- संपादक : कमल कपूर,प्रथम संस्करण : 2024, पृष्ठ संख्या : 367, मूल्य : 800 रुपया,प्रकाशक : अयन प्रकाशन , नई दिल्ली , 110059
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