सबके सामने वह मेहताजी की लड़की को उठाकर ले गया । कोई कुछ नहीं बोला ।
लड़की खूब रोई ,चीखी चिल्लाई ; लेकिन किसी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी ।
मौहल्ले वाले मूक – दर्शक बने देखते रहे ।
“ किसे पुकार रही हो मेरी जान , ये तो साले सबके सब नामर्द हैं ! ” उसने
लड़की को चीखते – चिल्लाते हुए देखकर कहा और रामपुरी को हवा में लहराते हुए चारों
ओर निगाहें दौड़ाई ।
कोई भी आगे नहीं आया । सब खामोश थे । वह बड़े आराम के साथ लड़की से
जुगाली करता हुआ निकल गया ।
मोहल्ले वाले मेहता जी से कुछ नहीं कर पाने का अफ़सोस प्रगट कर रहे थे ।
आँसुओं से भीगा चेहरा मेहता जी ने ऊपर उठाया और एक नजर सबको देखा
“ मुझे अफ़सोस इस बात का नहीं हैं कि आप सब मेरी बेटी को बचा न सके !
अफ़सोस इस बात का है कि मेरी एक ही बेटी थी और उसे आज वह उठाकर ले गया ।
लेकिन वह कल फिर आएगा तब क्या होगा ? ”
-0-ashoksharmabharti@gmail.com