विधान भवन स्थित गाँधी जी की मूर्ति के सामने तीनों बंदर अपनी चिरपरिचित मुद्रा में बैठे हुए थे। मगर वे आज लगातार अपना सिर हिला रहे थे।
देखते-ही-देखते वहाँ नेताओं की भीड़ लग गई। सभी अपने-अपने अर्थ और निष्कर्ष निकालने लगे।
एक नेता ने कहा, ‘‘ये गाँधी जी से माफी माँग रहे हैं।’’
दूसरे नेता ने कहा, ‘‘नहीं। ये गाँधी जी से कह रहे हैं कि अब आपकी नैतिक शिक्षाओं की कोई जरूरत और महत्ता नहीं रह गई है।’’
तीसरे नेता ने कहा, ‘‘नहीं।नहीं। तुम लोग नहीं समझ पा रहे हो। एक बंदर मुँह पर हाथ रखकर कह रहा है कि कुछ गलत होते देखो, तो चुप रहो। दूसरा बंदर कान बंद करके कह रहा है कि किसी की बात मत सुनो। तुम्हें जो जी में आए करो। और तीसरा बंदर अपनी आँखें बंद करके कह रहा है कि जब कहीं सत्य से सामना हो, तो आँखें मूँद लो।’’