इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में गिरीश और मुझे एक ही रूम मिला था। चौथे दिन पाँच सीनियर्स आए थे कमरे में।
‘‘तुम दोनों का अटेस्टेशन हो गया?’’ उन्होंने कड़ककर पूछा।
‘‘नहीं…!यह अटेस्टेशन क्या है भैया?’’….हम भीतर तक काँप गए थे उनकी आँखों को देखकर।
‘‘रूम नं. अड़तालिस में पहुँचो, सब मालूम हो जाएगा।’’ कहकर वे चले गए।
गिरीश और मैं सिर से पाँव तक रैगिंग के भय में डूबे पहुँचे थे रूम नम्बर अड़तालिस में वे पाँचों किसी जूरी के सदस्य की तरह बैठे थे। उनके सामने एक बड़ी परात में नीला रंग घुला रखा था।
‘‘अपने पैंट-चड्डी उतारो और इस परात में बैठो। फिर उठकर उस बड़े कागज़ पर बैठो। तुम्हारे पीछे की निशानी कागज पर बन जाए । फिर उस पर हमसे साइन कराओ। यह अटैस्टेड कागज़ तुम्हारे कमरे में हमेशा उपलब्ध होना चाहिए। कागज़ गुमा अटेस्टेशन फिर से होगा।’’ बीच में बैठा सीनियर यह प्रक्रिया समझा रहा था। कमरे में तैरते उसके शब्द हमारे भय को द्विगुणित कर रहे थे। हमारे शरीर पसीने से तर थे और दिमाग सोचने-समझने की स्थिति में नहीं।
मैं बचपन से शर्मीला और संकोची रहा हूँ। मेरे लिए यह करना असम्भव था। मैंने शरीर की सारी शक्ति लगाकर शब्द जोड़े और हकलाकर कहा, ‘‘भैया मैं नंगा नहीं हो पाऊँगा।’’
पाँचों ने विचित्र दृष्टि से मुझे देखा। एक सीनियर उठा था। उसका भारी हाथ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा।
‘‘साला….’’ बिना अटेस्टेशन कराए रहेगा हॉस्टल में……’’ पाँचों इतनी जोर से हँसे थे कि पूरा कमरा गूँज गया।
‘‘शाम को तुम्हारा अटेस्टेशन हॉस्टल के सभी लड़कों के बीच होगा।’’ कहकर वे कहीं चले गए।
कमरे में लौटकर मैंने गिरीश से कहा था, ‘‘मैं अटेस्टेशन नहीं कराऊँगा ,चाहे मुझे पढ़ाई छोड़कर घर वापस जाना पड़े।’’
गिरीश बोला था, ‘‘मैं वापस नहीं जाऊँगा। वापस जाकर मुझे खेती करनी पड़ेगी और फिर जल्दी ही शादी।’’
शाम होने से पहले मैं सामान उठाए स्टेशन पर था।
गिरीश ने अटेस्टेशन करा लिया था। आज वह प्रथम श्रेणी इंजीनियर है। मैंने नहीं कराया ,मैं मिडिल स्कूल शिक्षक हूँ।
कुछ घटनाएँ जो जिन्दगी पर गहरा दंश छोड़ती है, उसके लिए एक छोटा शब्द भी जिम्मेदार होता है, जैसे मेरे लिए अटेस्टेशन।
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