आज रविवार है। भिखारियों के लिए त्योहार का दिन। आजकल ऐसे तो वे मंदिरों के किनारे जमे रहते हैं ; लेकिन उसके मुहल्ले के उदारतावादियों के कारण हर रविवार जरूर आते हैं यहाँ।
राम हरि के द्वार से कई भिखारियों का दल मायूस लौट चुका था। एक बच्ची ने हाथ बढ़ाया,
– बाबूजी, दस रुपये….।
– भाग, बदमाश कहीं की। तब से मना कर रहा हूँ। किसी को एक पैसा नहीं मिलेगा।
– बाबूजी, बुढ़िया पर दया करो। कुछ खाने को दे….।
– अब तुम आ मरी। जाओ आगे। नहीं है कुछ।…. ना जाने कहाँ से इतने भिखमंगे पैदा हो गए हैं। बुढ़िया !… खाने के लिए कुछ नहीं और बच्चे पैदा करेंगे चार-चार।
राम हरि बुदबुदाहट के साथ पेपर में डूब गए।
– कुछ दे दो बाबूजी। एक अपंग भिखारी बैशाखी के सहारे खड़ा था।
– धत्त! बदमाश! ….भाग।
वह भी खाली हाथ गया। फिर एक आवाज़ सुन लगभग मारने के लिए उठे। अचानक ठिठके। वहाँ एक युवती साफ-सुथरी भिखारिन खड़ी थी।
– भूख लगी है तुम्हें? उनका स्वर बदल गया।
– जी, बाबूजी।
– आओ…. अंदर आ जाओ।…. खाना खा लो।
भूखी युवती खाने के लालच में घर के सन्नाटे में अंदर।
कुछ दिनों बाद उसकी गोद में भी एक बच्चा रहने लगा। अब दोनों माँ-बेटे भीख माँगते हैं।
और अभी भी राम हरि कहने से नहीं चूकते,
– खाने को कुछ नहीं…. बच्चे पैदा करेंगे साले।
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