1
मेरे पिता ने एक दरवाज़ा बनाया था। लकड़ी का। उस पर कोई कुंडी नहीं थी, कोई चाबी नहीं थी। बस एक दरवाज़ा था। वे कहते थे — “इसके पीछे वह कहानी है जो मैं कभी नहीं लिख पाया।”
मैंने पूछा — “क्यों नहीं लिख पाए?”
वे मुस्कुराए — “क्योंकि जिस दिन लिखता, उस दिन यह दरवाज़ा खुल जाता। और जो इसके पीछे है, वह बाहर आ जाता।”
2
मेरे गले के भीतर एक कब्र है। उसमें एक आवाज़ दफन है। वह आवाज़ किसी का नाम लेकर रोना चाहती थी। पर मैंने उसे मार दिया। समय नहीं था। जगह नहीं थी। हिम्मत नहीं थी।
अब कभी बारिश होती है तो वह कब्र भीग जाती है। और मेरे स्वरों में एक सीलन आ जाती है। लोग कहते हैं — “तुम्हारी आवाज़ में एक दर्द है।”
मैं चुप रहता हूँ। क्योंकि वह दर्द नहीं, एक दफन आवाज़ का सड़न है। जो कभी कहानी बन सकती थी। अब सिर्फ एक गंध है। जो मेरे शब्दों से उठती है। हर बार।
वे चले गए। दरवाज़ा वहीं है। अब मैं उसके सामने बैठता हूँ। कभी लिखने बैठता हूँ तो लगता है दरवाज़ा हिल रहा है। मैं रुक जाता हूँ।
शायद कुछ कहानियाँ दरवाज़े ही बनकर रह जाने के लिए होती हैं।
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