पीने लायक पानी के स्रोत जब गिने-चुने ही बचे, तब उनपर वर्चस्व हेतु दुनिया के कई देश व संगठन एक-दूसरे पर हमला करने लगे। इन हमलों की एक बड़ी वजह यह भी थी कि ऐसे युद्धों से प्रायः पानी वाले प्रदेशों में स्थित एक बड़ी आबादी का सफाया हो जाता, जिससे सत्ताधीशों द्वारा पानी का विभाजन बची हुई आबादी के बीच करना आसान होता। जिस गाँव के अधिकतर युवा इस तरह के युद्धों में खेत रहे थे, उसी गाँव के जलाशय से पहरा उठवाकर सत्ताधीशों ने पीने का पानी गाँव वालों में बाँटने का आदेश दे दिया; लेकिन जब कोई भी अपने हिस्से का पानी लेने नहीं पहुँचा, तब एक पत्रकार ने गाँव की विधवा महिला से इस बाबत पूछताछ की, ‘‘गाँववालों के लिए जलाशय के पानी को बाँटने का आदेश आया है ! क्या आपको पीने का ‘मीठा’ पानी मिला ?”- पत्रकार का जोर ‘मीठा’ शब्द पर अधिक था।
“नहीं !… हमें अब अनायास ही आँखों से मुँह तक पहुँचते खारे पानी को पीने की आदत पड़ चुकी है।” नमकीन पानी का ज्वार-भाटा अब उस महिला के स्वर में साफ दिख रहा था। “नदी, तालाब के पानी का स्वाद, खारे पानी से तो बेहतर ही होता है। ” पत्रकार कुरेदकर खुशी निकालना चाहती थी ।
“मीठे पानी का स्वाद अब अपनों के खून-सा लगने लगा है।” और महिला का गम था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था।
-0-