छोटे से गाँव में पहली पोस्टिंग पर जब वह आया तो उसके मन में कई सपने थे,कुछ करने की चाहत थी लेकिन साथ ही विभाग में फैले भ्रष्टाचार से लड़ने की चुनौती भी थी। सालों से सुविधा शुल्क लिए बिना काम
न करने वाले कर्मचारी उसकी इस ईमानदारी पर हँसते,ताने मारते और कभी भुनभुनाते भी थे। लेकिन वह अपने इरादों पर अडिग था।
उस दिन एक फटेहाल व्यक्ति अपनी गुहार लेकर उसके पास आया साथ में उसका 5-6 साल का बच्चा भी था जो ठण्ड में ठिठुर रहा था। उसने उसकी बात सुनी कागज देखे और कार्यवाही का आश्वासन देते हुए कहा काम हो जायेगा। उसने अपनी फटी धोती की अंटी से मुड़े- तुड़े सौ -सौ के दो नोट निकाल कर उसकी ओर बढ़ाए और हाथ जोड़कर बोला- साब मेरे पास इतने ही है ले लो।
उस व्यक्ति की फटेहाल अवस्था में भी काम के लिए पैसे देना और वो भी बिना माँगे, वह सकपका गया।
नहीं -नहीं इसकी जरूरत नहीं है तुम्हारे कागज़ मैंने देख लिये है। तुम्हारा काम हो जाएगा।
वह व्यक्ति असमंजस में उसकी और देखता रहा फिर गिड़गिड़ाकर बोला- साब सच में मेरे पास और नहीं है। ये काम कर दो साब बड़ी मुसीबत में हूँ।
उसने कहा- हाँ, कहा न तुम्हारा काम हो जाएगा ।इन पैसों की जरूरत नहीं है।
बिना पैसे दिए काम नहीं हो सकता उस व्यक्ति का ये विश्वास इतना पुख्ता था कि उसे उसके पैसे न लेने की बात का विश्वास ही नहीं हुआ।
उसके बार- बार के आश्वासन के बावजूद वह बहुत देर तक वह उससे पैसे ले लेने के लिए विनती करता रहा। आखिर उसने उससे पैसे लेकर उसके बेटे के हाथ में पकड़ाए और कहा- इन पैसो से अपने बेटे के लिए कपड़े खरीद देना ,तुम्हारा काम हो जाएगा।
उसके जाने के बाद वह देर तक यही सोचता रहा- उसे कौन-सा दस्तूर बदलने के लिए काम करना है ? पैसे लेकर काम करने का या पैसे दिए बिना काम करवाने का ?