जून 2026

चर्चा मेंदुर्भाग्य एवं संघर्ष का पर्याय : डॉ अब्ज     Posted: January 1, 2016

अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’ लघुकथा–जगत् का एक ऐसा नाम है, जिसका प्रवेश लघुकथा में नवें दशक के तीसरे वर्ष में हुआ । यों उसने अपने ढंग के एकांकी, कविताएँ, कहानियाँ एवं लघुकथाएँ लिखीं, किन्तु इसकी पहचान लघुकथा विध में ही बनी । ‘अब्ज’ का कहना है–“जिस समाज में पैदा हुआ, पला एवं जवान हुआ, उसी समाज में अपने अगल–बगल जो कुछ देखने–सुनने को मिला, उसे ही कोरे क़ाग़ज पर उतारता रहा हूँ । जब तक जि़ंदा हूँ, उतारता रहूँगा।”ठीक ‘अब्ज’ ने ऐसा ही किया ।
‘अब्ज’ का जन्म 3 फरवरी, 1962 को, समस्तीपुर के एक गाँव में राजेन चौधरी के घर हुआ । इसके जन्म के कुछ ही अर्से बाद क्रमश: इसकी माँ, बड़ी बहन एवं छोटे भाई का निधन हो गया । अब्ज के साथ दुर्भाग्य का साथ बचपन से ही हो गया था । जैसे–तैसे, इधर–उधर भटकते हुए उसने किसी तरह स्नातक तक पढ़ाई की । पेट की जुगाड़ हेतु छोटी–छोटी नौकरियाँ करके अपना भरण–पोषण करता रहा ।
बाद में लघुकथा में शोध–कार्य करने हेतु उसने हिन्दी में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र के निर्देशन में उसने छत्रपति साहू विश्वविद्यालय, कानपुर से लघुकथा के किसी विषय में शोध–कार्य पूरा किया। उसका यह शो–कार्य प्रकाशित हो चुका है। विद्यालय–काल से ही इसकी रुचि सृजनात्मक लेखन में उत्पन्न हो गयी थी । पहली रचना कविता के रूप में बोकारो से प्रकाशित पत्रिका ‘कादम्बरी’ में प्रकाशित हुई; किन्तु बाद में लघुकथा की ओर उसका रुझान हो गया। तन्वंगी आकार में इसके तीन एकल लघुकथा–संग्रह क्रमश: ‘नई आरती नए बीज’, ‘युग का यथार्थ’ और ‘दहशत’ नाम से प्रकाशित हुए । ‘विकलांग’ इसका संपादित लघुकथा–संकलन है। जिसमें व्यक्ति की निशक्तता पर केन्द्रित लघुकथाएँ प्रकाशित थीं। लघुकथा विषयक तीन टिप्पणियों की एक पुस्तिका ‘लघुकथा चिन्तन और प्रक्रिया’ नाम से प्रकाशित हुई थी। इसके संपादन में लघुकथा को समर्पित अनियकालीन फोल्डर पत्रिका ‘रडार’ के कुछ अंक प्रकाशित हुए ।
लगभग सात–आठ वर्ष पूर्व एक ट्रेन–दुर्घटना में इसकी दोनों टाँगे (घुटने से) कट गयीं । दुर्भाग्य देखिए ! पत्नी ने जैसे ही उसकी दोनों टाँगों के कटने की बात सुनी ,तो वह दोनों बेटियों को लेकर अपने मायके चली गयी। फिर उसके जीवन–काल में नहीं नहीं लौटी । अब्ज 22 नवम्बर, 2015 को इहलोक छोड़कर परलोक चला गया । तात्पर्य यह कि अब्ज का पूरा जीवन दुर्भाग्यपूर्ण रहा, जिसे उसकी लघुकथाओं में भी देखा जा सकता है। ‘विकलांग’ संकलन में प्रकाशित अपनी लघुकथाओं में उसने अपनी इस पीड़ा को पूरी गंभीरता से प्रस्तुत करने में सफलता पायी है।
ऐसे जुझारू एवं संघर्षशील व्यक्तित्व को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !!
डॉ सतीशराज पुष्करणा
‘लघुकथानगर’, महेन्द्रू ,पटना–800 006 मो : 08298443663, 09431264674

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