[डॉ.अशोक भाटिया जी ने आत्रेय जी पर लघुकथा‘देवता’ समर्पित की है।]
श्मशान घाट का दृश्य था। मृतक की देह को मुखाग्नि देने की तैयारी चल रही थी। अचारजी ने कपूर और घी से जलती लकड़ी जजमान को पकड़ाई और देवताओं का आह्वान करने लगे।
यह सुनकर पास खड़े एक व्यक्ति ने दूसरे से पूछा-‘तुमने किसी देवता को देखा है?’
दूसरा-‘नहीं तो।’
उसने फिर तीसरे से पूछा-‘भला तुमने देखा है?’
तीसरा-‘नहीं।’
अब दोनों ने पहले से पूछा-‘तो तुमने देखा है?’
-‘हाँ!’ पहला बोला।
-‘कहाँ देखा?कब देखा?कैसा था वह?’दोनों की जिज्ञासा बढ़ गई।
-‘देखने में हम जैसा ही था। हम यहाँ जिसके दाह-संस्कार में खड़े हैं। वहीं तो था देवता।’
यह सुनकर दोनों सोच में पड़ गए। अब तक और तीन-चार व्यक्ति उनके आसपास आ जुटे थे।
पहले ने मृतक की ओर देखते हुए कहा-‘वह सरल था,सच्चा और निश्चल था, परोपकारी था। यही तो होती है एक देवता की पहचान ।’
डॉ.अशोक भाटिया,1882,सैक्टर 13,करनाल132001