यह आजादी का स्वर्ण जयंती वर्ष था। संगीतकार रहमान की धुन पर तिरंगा लेकर दौड़ते घोड़ों और जवानों का देखकर छेदीलाल की रंगों में भी आजादी का खून उबलने लगा। लेकिन इस उबाल लाये खून का करे क्या? अंग्रेज तो हैं नहीं आसपास कि भगतसिंह के साथ नाम लिखा दें। स्वर्ण जयंती की पूरा साल सोचते–सोचते उन्हें एक क्रांतिकारी ख़याल आया। आज से सरकार से तनख्वाह सिर्फ़ आधी लूँगा। आधी देश के नाम।
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’
‘‘फिर नौकरी छोड़ ही क्यों नहीं देता ?’’
‘‘अरे हमें दे दे। बड़ा दानी बनता है।’’
इसकी जांच सी.बी.आई. से करायी जानी चाहिए कि इसके पास इतना पैसा कहां से आया, कैसे कमाया, वरना सरकारी कर्मचारी और तनख्वाह छोड़े।
फाइल खुल गई और निर्णय के लिए सरकने लगी। संविधान विशेषज्ञों की राय, कानूनी राय, वित्तीय धारा, उपधारा, विशेष कमेटी की राय। सभी हरकत में आ गए।
लेकिन निर्णय आने से पहले ही छेदीलाल सेवानिवृत्त हो गये। भनक पाते ही फाइल भी जहां थी वहीं खड़ी हो गयी।
यह उन दिनों की बात है जब भारत सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही थी और प्रबंधन में हर कोने पर ‘तुरंत निर्णय’ का संगीत गूँज रहा था।