“घर में जो खाली जगह पड़ी है ,वहाँ दो कमरे बनाने का विचार था पिता जी। ”
” क्यों क्या पी जी वगैरह बनाने का विचार है ?”
” नहीं ,पिता जी आप तो जानते है मुझे आजाद रहने की आदत है ,कोई दखल नहीं ,और फिर पी जी वाले या किरायेदारों के साथ मुझे कुछ व्यवधान सा महसूस होता है। ”
” तो और दो कमरे डालके क्या करोगे ,बेकार का खर्चा। ”
“अब एक कमरा अलग हो ,उसमे टीवी लगा हो ,बाथरूम अटैच्ड हो ,उसमे आप आराम से बैठें ,अपना मनपसंद कार्यक्रम देखें ,पूजा पाठ करें। ये दो कमरों में सबकी सेटिंग नहीं आ रही। यहाँ आपको बच्चे भी डिस्टर्ब करते हैं। वो अपना चैनल लगाने की जिद करते हैं। ”
“ऊपर वाला कमरा भी तो खाली ही है ,वह बच्चो को अलग से टीवी लगा देंगें। ”
” अरे पिता जी बच्चे तो ऊपर वाले कमरे में चढ़ उतर लेंगे , आपको कैसे चढ़ाऊँगा। आप बात समझ नहीं रहे हैं। ”
परम्परावादी पिता अब मौन हो गए थे ,शायद वो बेटे की बात समझ गए थे।
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