लघुकथा जगत का एक जाना पहचाना नाम, ऋता शेखर ‘मधु‘, मेरी समझ से क़ोई भी उनके परिचय
से अछूता नहीं होगा। ‘लघुकथा डॉट कॉम’ में उपलब्ध आपकी लघुकथाएँ एवं ‘हिन्दी चेतना’ में पुरस्कृत लघुकथा ‘दर्द’ हम सभी ने पढ़ी है। फ़ेसबुक पर भी आपकी अन्य रचनाओं को पढ़कर मैं बहुत प्रभावित हुई। सबसे बड़ी बात मनोविज्ञान पर लेखिका की अच्छी-ख़ासी पकड़ है। लघुकथा के अलावा हाइकु, हाइगा, कविता, गजल, आलेख और छन्द पर भी आपको महारथ हासिल है। आप शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना दखल रखती हैं।
ऋता शेखर ‘मधु जी का प्रथम लघुकथा संग्रह – ‘धूप में गुलमोहर’, जिसकी भूमिका लिखने का सुअवसर मुझे मिला है। संग्रह का शीर्षक अपनेआप में गूढ़ अर्थों को समेटे अपनी यात्रा पर निकल पड़ा है। कड़ी धूप में भी गुलमोहर, जिजीविषा लिए अपने रक्तिम सौंदर्य की छटा बिखेरता कभी प्रेममय हो तो कभी शक्तिस्वरूपा बन, ढलती साँझ में भी शुचिता के संग, श्यामल घटाओं में अपना सिंदूरी उल्लास बिखेरता संग्रह को सम्पूर्णता प्रदान कर रहा है।
संग्रह की प्रथम लघुकथा – ‘मां’ से ही जन्मी है। बच्चे को जन्म देने आई युवती के साथ अस्पताल में दो अन्य स्त्रियों को उसकी देखभाल में तत्पर देख, वहाँ उपस्थित एक अन्य स्त्री इस सोच में पड़ जाती है कि आख़िर उनमें से युवती की माँ कौन और सासूमाँ कौन है? अंत में बच्चे का जन्म होते ही वह फ़ौरन पकड़ लेती है कि माँ कौन है और सासूमाँ कौन। पहली कथा से ही लेखिका के माइक्रोस्कोपिक नज़रिए एवं उनकी संवेदनशीलता से परिचय हो जाता है। उत्सुक हो उठता है पाठक मन, अगली कथा को पढ़ने के लिए।
‘युगपरिवर्तन’ जिसके अंत तक पहुँचने पर, मन वहीं ठहर जाता है, मनन चिंतन हेतु, जहाँ एक तरफ इंटरनेट ने इतनी सुविधाएँ दी हैं, वहीं दूसरी तरफ़ लेखिका की क़लम ने एक अति विचारणीय प्रश्न लाकर सामने खड़ा कर दिया है।
भूख पर यों तो तमाम लघुकथाएँ लिखी जा चुकी है, किन्तु कथ्य कॉमन होने के बावजूद लघुकथा ‘मासूम अपराध’ अपनेआप में अलग, तमाम प्रश्न अंत में छोड़ जाती है कि देश की अर्थव्यवस्था, क़ानून और विलुप्त होती मानवीय संवेदनाओं के प्रति पाठक मन विचलित हो उठता है।
‘दर्द’ संवाद में बुनी गई एक कथा, जो अपने अंतिम सोपान तक पहुँचते पहुँचते उभरती पीड़ा के साथ अचानक सुकून दे जाती है। “अब बताओ विकलांग कौन?” यही चिंतन कथा को ऊँचाइयों पर ले जा रहा है।
लघुकथा – ‘नया दरवाज़ा’ जो दिल को बहुत भा गई। सफ़ेद लिबास में लिपटती लघुकथा, घोर निराशा की दहलीज पर खड़ी कि अचानक आकर चुपके से कोई लाल चुनरियाँ उढ़ा देता है उसे, पाठक मन ख़ुशी से झूम उठता है। इस खूबसूरत कथा के लिए लेखिका को दिल से साधुवाद है मेरा।
‘साझा अनुशासन’ कथा में तनाव के मध्य जिस तरह मन्दिर और मस्जिद के संचालन कर्ताओं ने अपनी सूझबूझ का प्रदर्शन किया, प्रशासन ही नहीं, अल्लाह और ईश्वर भी उनके आगे अभिभूत हो गया होगा, और मुँह से निकला होगा – ‘जिंदा है इंसानियत’ आज के माहौल के लिए अत्यंत आवश्यकता है ऐसी ही लघुकथाओं की, जो इंसान के भीतर सुप्त मानवीय संवेदनाओं को जगा सके।
‘बेतार का संदेश’ शीर्षक के साथ न्याय संगत करती, जन-जन को अपना संदेश दे रही है, ‘अपनापन बाकी है महानगरों में, जहाँ अकेले घर में वृद्ध माँ घबराती है।
‘कासे कहूँ’ लघुकथा, पढ़कर ताजी हवा का झोंका मन को छू गया। बहुत सारे आयाम स्थापित करती, भाई-बहिन के मध्य स्नेह और विश्वास की डोर को और भी मज़बूत करती हुई कथा। भाई अपनी व्यथा जो किसी से नहीं कह सकता, बहन के पूछे जाने पर उससे साझा कर लेता है। लेखिका ने अपनी कलम के द्वारा, बदलते समय के साथ युवकों को ज़िम्मेदार व्यक्ति होने का संदेश दिया है, जिससे विवाह के बाद किसी युवती का जीवन बर्बाद न होने पाए। पथिक को मंज़िल का पता बताती कथा रचने के लिए, लेखिका को हार्दिक बधाई।
सामाजिक सरोकार के अन्तर्गत ‘प्रेरणा’, ‘फ़ीनिक्स’, ‘देवदूत’, ‘आदर्श घर’ ‘डील’, गरीब का पेट, अत्यंत कुशलता से बुनी गयी बेहद महत्वपूर्ण कथाएँ हैं। चिपको’ पर्यावरण के प्रति प्रेम को स्थापित करती, ‘बेपेंदी का लोटा’ परिहास के बीच हल्के व्यंग्य के साथ शीर्षक को सार्थक करती कामयाब रचना बन पड़ी हैं।
क्रम में आगे बढ़ते हुए, रिश्तों पर बुनी गई कथा ‘अंतर्देशीय’ एक बेहद गम्भीर कथ्य, पढ़ते हए आँखों के सामने सब कुछ सजीव हो उठता है। प्रेम और पीड़ा से अभिभूत पाठक मन जैसे ख़ुद कथा का पात्र बन बैठता है। अक्सर ऐसी रचनाओं के लिए शब्द नहीं सूझते कुछ कहने को। एक अलग से फ़्लेवर की कथा के लिए साधुवाद है लेखिका को।
‘भूल’ में मनोविज्ञान की बारीकियों को बखूबी उतारा है, क़लम की धार पर। वाक़ई उदारमन से किया हुआ कार्य अक्सर ख़ुद पर भारी पड़ जाता है।
‘धातु के बर्तन’ वाह! वाह! कहे बिना नहीं रह सका पाठक मन। बिम्बों के माध्यम से बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह दिया लेखिका ने। कथा बुनने का कौशल देखकर महसूस तो नहीं होता कि यह प्रथम लघुकथा संग्रह है, ऋता जी का।
‘जज़्बात’ रिश्तों में जज़्बाती होना बेहद स्वाभाविक है। स्त्रियों के लिए तो हमेशा ही कहा गया है, विवाह के पश्चात वह तमाम रिश्तों में बँट जाती है, लेकिन बदलते समय के दौर में आज का पुरुष भी दिखने लगा है, बँटते हुए रिश्तों में।
पूजा के फूल, पुत्रीरत्न, उधम अन्य लघुकथाएँ भी मन को सुकून देने वाली हैं।
कोरोनाकाल की लघुकथा ‘भीड़-निर्माता’ आसमान में उड़ते पंक्षियों के बिम्ब को सड़क पर उमड़ती भीड़ से रिलेट करते हुए फोकस्ड किया है, ‘बसेरा उजड़ने न पाए’
इसी क्रम में ‘साँस की आजादी’ कथा में आजादी के मायने ही बदल गये मानव जीवन के लिए।
‘बिवाई’ दिल को झकझोर देने वाली कथा, अंत में नयी दृष्टि दे जाती है कि अचानक कमली अछूत की परीधि से बाहर निकल आती है। समाज को संदेश देती एक अत्यंत महत्वपूर्ण लघुकथा।
‘दाग अच्छे हैं’ मेरे पाठक मन को बहुत अच्छी लगी। कोरोनाकाल और सास, दोनों ही लगते बदनुमा दाग, मगर दोनों ही हैं बहाना, खट्टा-मीठा स्वाद समेटे सासूमाँ-घर जाना। प्यारी-सी आनंदित करने वाली लघुकथा।
विविध लघुकथाओं के अंतर्गत ‘समझौता’ बड़ी ही सुंदरता से, एक एक शब्द मोती से बहते, चंदन संग पानी की बहती धारा में हृदय को छूने के लिए आतुर थे कि अचानक ‘वाह!’ से ‘आह!’ में तब्दील हो गया। संस्कार भी अपने और संतान भी अपनी, फिर भी क्यों करना पड़ता है समझौता इनके मध्य? दृश्य को उभारती उत्कृष्ट रचना। कहना ही पड़ेगा, कहीं कोई बनावटीपन नहीं, न शब्दों का न भावों को।
लेखिका की क़लम से कोई भी पहलू अछूता नहीं रहा है जीवन का संग्रह मे। कम शब्दों में अपनी बात कहने का हुनर और अंत में अचानक कुछ ऐसा कह जाना पाठक मन को चमत्कृत कर देना, लघुकथा विधा के प्रति लेखिका की गम्भीरता को भलीभाँति दर्शा रहा है। कथाओं में बिम्बों का प्रयोग भी बखूबी किया है। जिन्हें पढ़ते हुए ज़ेहन में विचार आया कि लेखक क्यों लिखता है और किसके लिए लिखता है? पाठक के लिए ना। यही कहना चाहूँगी की सभी कथाएँ सरल सहज बिना किसी बनावटीपन के ग्राह्य हैं, जो पाठकों मन के गहरे उतरकर संतुष्टि का भाव प्रदान करेंगी। हाँ, एक बात अवश्य कहना चाहूँगी, रचनाओं को पढ़कर मैंने लेखिका के व्यक्तित्व को भी जाना। न्यायसंगत करता हुआ स्पष्ट दृष्टिकोण, उनका मनन-चिंतन, उनकी संवेदनशीलता व स्नेहिल स्वभाव की धनी हैं, ऋता शेखर ‘मधु’ जी।
सामाजिक सरोकार की कथाएँ हों या रिश्तों की या मानवेतर, विभिन्न रंगों की छटा बिखेरती फुसफुसा गयीं कानों में कि कब चुपके से लेखिका शब्दों के ताने बाने बुनती संवेदनाओं के साथ स्नेह और सद्भाभावना का महीन तार भी बुन देती हैं, जो दिखता तो नहीं सिर्फ रूह से महसूस होता है। ऋता जी को मैं हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएँ देती हूँ, अनवरत उनकी क़लम यूँ ही नए आयाम रचती रहे, उनका यह लघुकथा संग्रह, जन-जन पहुँचे और अपना संदेश फैलाए, चारों दिशाओं में, ऐसा उनकी लघुकथाएँ कहती हैं। इतिश्री नवसृजन हेतु …।
धूप के गुलमोहर( लघुकथा- संग्रह): ऋता शेखर ‘मधु’ , पृष्ठः188 ,मूल्य-340/-, प्रकाशन- श्वेतांशु प्रकाशन, एल-23, शॉप-6, गली नम्बर- 14/15, न्यू महावीर नगर, नई दिल्ली-110018
दूरभाष- 8178326758, 9971193488
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