बीती सदी के नवें दशक में लघुकथा के फलक पर एक नाम उभरा; और इस कदर उभरा की लघुकथा आकाश पर छा ही गया। यह नाम था लघुकथा के आप्तपुरुष “सुकेश साहनी” का।
इनकी लघुकथाएँ जब भी पढ़ने को मिली, एक स्वर्गिक आनन्द मेरे मन में भर उठता था। स्वत: स्फूर्त कथ्य, मंत्रमुग्ध करती शैली, चकित करता शिल्प, सृजनात्मक भाषा, कसा हुआ कथानक और सबसे ऊपर एक लाजवाब सटीक शीर्षक; किसी अद्वितीय श्रेणी की लघुकथा में रखे जा सकने वाले सभी आवश्यक तत्व इनकी लघुकथाओं में नज़र आते हैं। इसके साथ सुगंधित अगरबत्ती के जलने के साथ ही क्रमशः बढ़ती महक जो अगरबत्ती के बुझने के बाद भी कमरे में काफी देर तक फैली रहती है, के जैसा उनके लेखन का खास जादुई स्पर्श लघुकथा को पढ़ते हुए और उसके बाद भी काफी समय तक हृदय को आनन्दित किए रखता है।
जी हाँ! ये पंक्तियाँ भावनाओं के साथ बह निकली हैं। लेकिन जिनकी लघुकथाएँ बिम्ब,प्रतीक, अभिव्यक्ति-अभिव्यंजना और सृजनशीलता की मिसाल हो, उन पर कुछ लिखने का प्रयास करने वाला उनकी रचनाओं के जादू में सम्मोहित तो हो ही जाएगा।
ऐसे कथाशिल्पी लेखक की लघुकथाओं पर समीक्षा पुस्तक लिखने जैसा भागीरथी महत् कर्म तो कोई “भगीरथ” ही कर सकता था। सो यह महाकार्य ‘गुफाओं से मैदान की ओर’, ‘पेट सबके है’, ‘बैसाखियों के पैर’, ‘मैदान से वितान की ओर’ जैसे बेहतरीन लघुकथा संग्रहों तथा ‘हिन्दी लघुकथा के सिद्धांत’ व ‘लघुकथा समीक्षा’ जैसी पुस्तकें लिखने वाले लघुकथा क्षेत्र के धुरन्धर “भगीरथ परिहार” ने ही किया है। भगीरथ जी की लघुकथा विधा में बेहतरीन पकड़ निर्विवाद है।
लघुकथा क्षेत्र के इन दोनों पुरोधाओं की बेमिसाल जुगलबंदी प्रस्तुत समीक्षा पुस्तक “कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन-संचेतना” के रूप में सामने आई है।
इस पुस्तक में सुकेश जी की चालीस शानदार लघुकथाएँ शामिल हैं, जिन्हें भगीरथ जी ने विस्तारपूर्वक खोलकर पाठक के समक्ष रखा है।
भगीरथ कहते हैं कि “समीक्षाकर्म रचना व रचनाकार के लिए ही नहीं बल्कि समीक्षक के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है।” अपने प्राक्कथन में समीक्षा के मानदण्डों का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि समीक्षक रचना की समग्र व्याख्या व मूल्यांकन करता है।
चूंकि बिम्बात्मक-प्रतीकात्मक व व्यंजनात्मक लघुकथाओं में नजरिए की भिन्नता के कारण लेखक, पाठक व समीक्षक तीनों के समक्ष आलोच्य लघुकथा का अलहदा रुप सामने आ सकता है, इसलिए समीक्षक को परकाया प्रवेश करना पड़ता है। यही एक श्रेष्ठ समीक्षक की दक्षता है, जिसे भगीरथ ने बाखूबी निभाया है।
अपने अग्रलेख में वे सुकेश साहनी की इस पुस्तक में गृहीत चालीस लघुकथाओं के शीर्षक, शिल्प-शैली, प्रयोगधर्मिता, विषय वैविध्य, सामाजिक सरोकार व मूल्य, यथार्थपरकता व संदेश की श्रेष्ठता व लेखन कौशल के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हैं।
सुकेश जी की रचनाओं के वैविध्य पर तो एक उदाहरण के साथ कहना चाहूँगा कि सभी जानते हैं कि सुकेश जी भूगर्भ जल विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हैं। इस पुस्तक में पाँच लघुकथाएँ उनके विभाग से सम्बन्धित, यानि पानी की समस्या पर हैं, लेकिन पाँचों ही रचनाओं का शिल्प, शैली व कथ्य इतना जुदा है कि हर रचना एक नया विषय लगती हैं।
सभी लघुकथाओं के साथ उनके प्रथम प्रकाशन का उल्लेख भी है। कई लघुकथाएँ, खासकर ‘खेल’, ‘कम्प्यूटर’ आदि तो उनके रचनाकाल को देखते समय से कहीं आगे की प्रतीत होती हैं।
अब बात इस पुस्तक के मुख्य आकर्षण अर्थात् इन लघुकथाओं के ‘विवेचना खण्ड’ पर।
भगीरथ कहते हैं कि “समीक्षक कथा व कथ्य के पार जाकर भी रचना की व्याख्या कर सकता है। वह उन सभी बिन्दुओं पर ध्यान आकृष्ट करता है, जिनकी वजह से कथा विशिष्ट बन गई है।”
इस बात पर उमेश महादोषी जी का कथन स्मरण हो आता है कि “समीक्षा में सृजन के प्रेरक बिन्दु से परिणामी भाव सम्प्रेषण तक समग्र पड़ताल होनी चाहिए।”
भगीरथ जी ने इन लघुकथाओं की परत दर परत विश्लेषण करती विस्तृत समीक्षा की है। ये व्याख्यापरक समीक्षाएँ न सिर्फ रचना के निहितार्थ को उजागर करती हैं वरन् पाठकों के लिए बोधगम्य बनाते हुए निकष की कसौटी पर इन रचनाओं का महत्व भी स्थापित करती हैं।
सुकेश जी की बिम्ब, प्रतीक व उपमानों में लिखी रचनाएँ भगीरथ जी की समीक्षाओं से स्पष्ट होकर अपने वास्तविक अर्थ का खुलासा करती हुई पहले से भी कुछ खास हो जाती हैं।
जब ‘गोश्त की गंध’, ‘बैल’, ‘प्रतिमाएँ’, ‘आधी दुनिया’, ‘नंगा आदमी’, ‘कोलाज’, ‘कम्प्यूटर’, ‘खेल’, ‘दाहिना हाथ’, ‘चिड़िया’ आदि जैसी लघुकथाएँ इन समीक्षाओं को पढ़ने के बाद पुनः पढ़ी जाती है तो उनमें कुछ अलग ही रसास्वादन मिलता है।
भगीरथ जी ने इन लघुकथाओं के सृजनमूलक विचार से लेकर इनके कथ्य, कथानक, शिल्प, शैली, प्रयोगात्मकता, बिम्ब, उपमान, प्रतिमान, भाषा, सम्प्रेषणीयता, गूढ़ार्थ, संदेश, अंतिम प्रभाव तक समग्र विवेचन यथोचित विस्तार के साथ किया है। इन समीक्षाओं से लघुकथाओं का सौंदर्य कुछ और ही निखर आता है।
सुकेश जी की लघुकथाओं पर भगीरथ जी की समीक्षा सोने पर सुहागा होने के साथ पाठकों, शोध विद्यार्थियों व लघुकथा प्रेमियों के लिए उपयोगी दस्तावेज की तरह है। इस पुस्तक में भगीरथ जी का श्रम स्पष्ट नजर आता है। मैं लघुकथा के चाहने वालों से आग्रह करूँगा कि इस अपनी तरह की अनूठी व लाजवाब पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
मेरी कामना है कि इस तरह की संग्रहणीय व दस्तावेजी पुस्तकों का तोहफा ऊर्जा से लबरेज इन वरिष्ठजनों के माध्यम से हमें मिलता रहें।
पुस्तक– कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन-संचेतना (प्रथम संस्करण 2019),लेखक- भगीरथ परिहार प्रकाशक- बोधि प्रकाशन,पृष्ठ- 200 अंकित मूल्य- 200/-
-0-प्रस्तुति- डॉ. कुमारसम्भव जोशी,s/o डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,विनायक हॉस्पिटल के पास,वार्ड- 36, बसन्त विहार, सीकर (राजस्थान) 332001 ,ई मेल- drksjoshi@gmail.com,मोबाइल- 7568929277