जून 2026

चर्चा मेंचर्चा :’नवजन्मा’ का विशिष्ट पात्र-जिलेसिंह     Posted: April 1, 2020

          रामेश्वर काम्बोज की लघुकथा’ नवजन्मा’ बहुत चर्चित रही है। इस लघुकथा का प्रमुख पात्र जिलेसिंह उस नजरिए से उत्क्रांत होकर विशिष्ट बन जाता है, जो कन्या के जन्म पर सार्वकालिक मायूसी को उत्सवी बना देता है। हजारों वर्षों के हमारे संस्कारों में पुत्रजन्म  ढोल -नगाड़े में गूँजता रहा है। और पुत्री का जन्म बाहरी सन्नाटे के साथ जिंदगी भर के भयाक्रांत सोच में सूपड़े की आवाज में सिमटजाता है। यह लिंगानुपात की समस्या मात्र नहीं है; बल्कि पुत्री के जन्म के साथ एक अवसाद, उसके शेष जीवन की जिम्मेदारी, वैवाहिक जीवन के खतरे, दहेज के लेन-देन,  अस्मत  कीअस्मिता के सवाल मुँह बाए खड़े हो जाते हैं। हमारे समकाल में भयावह घटनाओं के साथ झाड़ी में फेंके जाते कन्या -भ्रूण इन चिंताओं से व्यग्र कर देते हैं।। कथाकार इसी  खुरदुरी पृष्ठभूमि में उस पारिवारिक मुखिया के चरित्र का विन्यास करता है, जो भयाक्रांत उदासी को कन्या -जन्म के बाद ढोल की तिड़क् धुम्म में बदल दे। यही सोच जिलेसिंह को महत्त्वपूर्ण पात्र बना देता है।

सामाजिक सोच की गर्हित दृष्टि को अतिक्रांत कर नवजन्मा कन्या के जन्म को पुत्र -जन्म जैसे उत्सवी सोच में रूपांतरित कर देता है। 

           इस चरित्र के स्थापन और उसके भीतर उपजी अतिक्रांत दृष्टि के उन्मेष के लिए लघुकथाकार ने घर के वातावरण और  पारिवारिक सदस्यों में सैकड़ों वर्षों से जमी  हीन दृष्टि को कैनवास के रूप में सँजोया है। दादी का संवाद -” जिल्ले!तेरा तो इसीसे सिर बँध ग्या रे। छोरी हुई है।” बहिन इसलिए दुखी कि लड़की होने से उसका नेग मारा गया है। माँ की चिंता है लड़की के बड़े होने पर लड़का ढूँढने की ।और पत्नी मनदीप की आँखें डबडबाई हुई। और तो और नवजात कन्या की आँखें भी मुँदी हुई हैं।

शहर से आया जिलेसिंह हर पात्र के संवादी बोल के भीतर पसरी सन्नाटे की उदासी ,नेगवादी गणित, कन्या के विवाहित जीवन के लंबे खतरे से गुजरता है। लेकिन इसी पारंपरिक उदासी को जिलेसिंह  नए नजरिए में बदल देता है। लगता है कि सैकड़ों वर्षों की ठंडी सोच को गरम पानी के सोते में बहा दिया हो ।

          यहीं से जिलेसिंह मैं वह पात्र उभरने लगता है, जो सन्नाटे को चीरकर आँगन में ढोल की तिड़क् धुम्म से गुंजा देता है ।यही नहीं ,उसकी मुद्राएँ उत्सवी राग में पग जाती हैं। अलमारी से निकली तुर्रेदार पगड़ी उसकी प्रसन्नता को सिर पर ला देती है। ढोल की गिड़गिड़ी के साथ उसकी नाचती हुई भंगिमाएँ जैसे सैंकड़ों बरसों की कुसंस्कारी काई को हिलाडुला जाती है। पत्नी मनदीप की डबडबाईई आंखों को उजाले दे जाती है ।और तो और कन्या की अधमुँदी आँखों पर नोट घुमा कर संतू ढोलिया को थमाते हुए फिर से तिड़् तिड़्ड़ तिड़क  धुम्म में नवजन्मा कन्या का उत्सवी राग -रंग रचा जाती है ।

             दो पृष्ठभूमियाँ हैं। जिलेसिंह इन्हीं बासी प्रथाओं, कन्या के प्रति उपेक्षा भाव और घर के लोगों की जड़ संस्कारिता का बिना तर्क- वितर्क किए अतिक्रमण कर देता है। यह उसके भीतर नए ज़माने की शिक्षा का विवेकशील सोच है, जो किसी के परामर्श या मशविरे से बँधा हुआ नहीं है। एक युवा सोच ,जो स्वयं निर्णय लेता है। जड़ता पर निर्णयात्मक प्रहार करने के लिए वह सारा प्रबंध कर लेता है, जो पुत्र के जन्म पर होता आया है। कथाकार उसे वेशभूषा में ही तुर्रेदार नहीं बनाता; बल्कि उसके चेहरे की मुद्राएँ भी खुशी से नृत्य करती हैं। व्यक्तित्व के भीतरी विवेक और उसकी साकार नृत्यात्मक भाषा जिलेसिंह के व्यक्तित्व को इस तरह सांद्र कर देती है  कि अकेले पात्र का सकारात्मक प्रभाव दादी, माँ , और पत्नी पर पड़ता है और वे भी इस उदासी के परिदृश्य को जेंडर समानता के सोच में बदल देते हैं । ढोल की ध्वनियों का सप्तम स्वर कन्या को भी वही दर्जा दे जाता है। रिवाजों के बतौर कन्या पर वार-फेर का रुपया भी इसी समता के दर्जे को साक्षी बनाता है। अंतर्मन के नए सोच और उत्सवी राग- रंग की यह भाषा जिलेसिंह की बॉडी लैंग्वेज में निखरकर पूरे घर को ही नहीं ग्रामीण जीवन को भी नई दिशा देती है।

                  जिलेसिंह के चारित्रिक विन्यास में मनोभाषा और बॉडी लैंग्वेज एक साथ थिरकते हैं। यह थिरकन पूर्वार्ध की उदासी पर नृत्य करने लगती है। जिलेसिंह का यह निर्णयात्मक नया सोच घर की तीन पीढ़ियों की जड़ संस्कारिता पर रोशन हो जाता है। ढोल की आवाज़ केवल घर तक सीमित नहीं रहती; बल्कि ग्रामीण परिवारों में बदलाव की अनुगूँज बन जाती है। यह सारा उपक्रम कथा के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध की संरचना के कारण, पात्रों की मनोभाषा और  बॉडी लैंग्वेज के कारण जिलेसिंह के चरित्र को प्रभावी बना देता है। ढोल की तिड़क् धुम्म ! प्रभावी नाद बन जाती है। लगता है कि लिंगवादी सोच एक युगांतर ला रहा है। उस समाज में, जहाँ कन्या जन्म के कारण दादी ,माँ और पत्नी जैसे ममता-भरे पात्र नारी पक्षधरता के संवाहक नहीं रह गए हैं । यह कहा जा सकता है कि कुछ तर्कयुक्त संवाद  इस नई रोशनी को प्रखर बना सकते थे; पर इससे विन्यास शिथिल होता। सच तो यह है कि नए युवा में शिक्षा और जागृति का जो सोच रहा है, उसे तर्क-वितर्क के बजाय संकल्पित निर्णय में अधिक प्रखर बनाता है। संगीत की ध्वनियाँ उसे रंजक बनाती हैं; इसीलिए जिलेसिंह का यह आत्मनिर्णय  उसके व्यक्तित्व की संकल्पित भावना का प्रतिनिधि बनकर लिंगवाद में समता को सामाजिक पारिवारिक स्वीकृति बना देता है। यह भी क्या कम है कि पत्नी मनदीप के बहते हुए आँसू इस नए सोच से दांपत्य को तरल बना देते हैं। हिन्दी लघुकथाओं के विशिष्ट चरित्रों में नवजन्मा का जिलेसिंह अपने को रेखांकित करता है।

-0-बी.एल.आच्छा, 36,क्लेमेंट्स रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे,पुरुषवाकम्,चेन्नई(तमिलनाडु)-600007 [मो.-94250-83335; ईमेल-balulalachha@yahoo.com]

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नवजन्मा / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जिलेसिंह शहर से वापस आया तो आँगन में पैर रखते ही उसे अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ लगा।

दादी ने ऐनक नाक पर ठीक से रखते हुई उदासी-भरी आवाज़ में कहा-‘जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध ग्या रे। छोरी हुई है!’

जिलेसिंह के माथे पर एक लकीर खिंच गई।

‘भाई लड़का होता तो ज़्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया’-बहन फूलमती ने मुँह बनाया-‘पहला जापा था। सोचा था-खूब मिलेगा।’

जिले सिंह का चेहरा तन गया। माथे पर दूसरी लकीर भी उभर आई।

माँ कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी और अधिक बोल रही थी। जैसे कह रही हो-जूतियाँ घिस जाएँगी ढंग का लड़का ढूँढ़ने में। पता नहीं किस निकम्मे के पैरों में पगड़ी रखनी पड़ जाए।

तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुसा। बाहर की आवाज़ें वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। नवजात कन्या की आँखें मुँदी हुई थीं। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए आना अपना मुँह अपराध भाव से दूसरी ओर घुमा लिया।

जिलेसिंह तीर की तरह लौटा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चौपाल वाली गली की ओर मुड़ गया।

‘सुबह का गया अभी शहर से आया था। तुम दोनों को क्या ज़रूरत थी इस तरह बोलने?’ माँ भुनभनाई. घर में और भी गहरी चुप्पी छा गई।

कुछ ही देर में जिलेसिंह लौट आया। उसके पीछे-पीछे सन्तु ढोलिया गले में ढोल लटकाए आँगन के बीचों-बीच आ खड़ा हुआ।

‘बजाओ!’ जिलेसिंह की भारी भरकम आवाज़ गूँजी।

तिड़क-तिड़-तिड़-तिड़ धुम्म, तिड़क धुम्म्म! ढोल बजा।

मुहल्ले वाले एक साथ चौंक पड़े। जिलेसिंह ने अल्मारी से अपनी तुर्रेदार पगड़ी निकाली; जिसे वह-वह शादी-ब्याह या बैसाखी जैसे मौके पर ही बाँधता था। ढोल की गिड़गिड़ी पर उसने पूरे जोश से नाचते हुए आँगन के तीन-चार चक्कर काटे। जेब से सौ का नोट निकाला और मनदीप के कमरे में जाकर नवजात के ऊपर वार-फेर की और उसकी अधमुँदी आँखों को हलके-से छुआ। पति के चेहरे पर नज़र पड़ते ही मनदीप की आँखों के सामने जैसे उजाले का सैलाब उमड़ पड़ा हो। उसने छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछा।

बाहर आकर जिलेसिंह ने वह नोट सन्तु ढोलिया को थमा दिया।

सन्तु और जोर से ढोल बजाने लगा-तिड़-तिड़-तिड़ तिड़क-धुम्म, तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!

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