लघुकथा को ऑनलाइन पढ़ने – पढ़ाने की आदत डालने की शुरुआत करने वाले विद्वान् का नाम है – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’। 75 वर्षीय इस नौजवान लेखक के खाते में ढेरों ऐसी लघुकथाएँ दर्ज़ हैं< जो अपने समय में पर्याप्त चर्चित हुईं।
‘नवजन्मा’ इनकी ऐसी ही चर्चित लघुकथा है। जो वास्तव में रामेश्वर काम्बोज़ ‘हिमांशु’ जी की लघुकथा क्लासिक है। किसी भी लघुकथा को क्लासिकल का दर्ज़ा यों ही नहीं मिल जाता। इसके लिए लघुकथा को समय की पंगत में जाकर बैठना पड़ता है। लघुकथा को समय की पंगत में जगह यों ही नहीं मिल जाती। इसके लिए लघुकथाकार को उस काल / समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर बड़ी कार्यवाही करनी होती है। वह बड़ी कार्यवाही होती है शिल्प, संवेदना, कथानक और पात्रों के स्तर पर लघुकथा को ऊँचाइयों पर लेकर आना।परिश्रम सभी लघुकथाओं पर किया जाता है किन्तु निर्णय ‘काल’ लेता है कि कौनसी लघुकथा क्लासिक का दर्ज़ा हासिल कर सकेगी। वास्तव में इस बात से लेखक भी अनजान ही होता है कि उसकी कौन सी रचना ‘काल’ के बैरियर को तोड़ पाएगी।
नवजन्मा का मुख्य किरदार है जिले सिंह। लघुकथा का कथानक यों है कि जिले सिंह की पत्नी एक बच्ची को जन्म देती है। समस्या यहीं से शुरू होती है। दादी नाराज़, ननद परेशान। दादी इसलिए कि अब न जाने किसके पैरों में पगड़ी रखनी पड़े। ननद इसलिए कि अब नेग नहीं मिलेगा। लड़का होता तो ज़्यादा मिलता। वे जिले सिंह को भी प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। जिले सिंह जब अपनी पत्नी और नवजन्मा को देखने कमरे में जाते हैं तो, पत्नी शर्मिंदा होती दिखती हैं। जिले सिंह घर से बाहर चले जाते हैं। जब लौटते हैं तो ढोल वाला साथ होता है। वे उसे ढोल बजाने को कहते हैं। ढोल बजता है और वे नोट निकालकर बच्चे पर वार-फेर करते है। इस तरह लघुकथा सन्देश देती है कि भाई, लड़का-लड़की एक समान।
लघुकथा में मुख्य किरदार है जिले सिंह। पत्नी है मनमीत। एक दादी हैं, एक बहिन हैं जिनका नाम है फूलमती। माँ भी है। लघुकथा के हिसाब से किरदारों की संख्या अधिक है पर मज़ाल है जो एक भी पात्र अधिक लगता हो। शुरू में जिले सिंह की एंट्री होती है। वह घर में घुसता है तो सन्नाटा पसरा हुआ होता है। यहाँ दादी की एंट्री होती है। वो बच्ची के जन्म लेने पर उदास है। तभी बहिन फूलमती आती है। वह भी बच्ची के जन्म लेने पर कमेंट करती है। माँ की एंट्री अब तक हो चुकी है; लेकिन वह कुछ बोलती नहीं। जिले सिंह तमतमाया हुआ अपनी पत्नी मनमीत के कमरे में घुसता है। मनमीत बोलती नहीं लेकिन बच्ची पैदा होने पर उसे भी अपराधबोध- सा है। इस तरह लघुकथा अभी आधे तक भी नहीं पहुंची और पांच चरित्र प्रवेश कर गए हैं जिनमें से तीन के पास बाक़ायदा अपने डायलॉग हैं। इनमें से एक भी चरित्र ऐसा नहीं है जिसे ज़बरन घुसाया गया हो अथवा लेखक की मर्ज़ी अथवा बिना मर्ज़ी के लघुकथा में ज़बरदस्ती घुसा हो। इनमें से कोई पात्र ऐसा नहीं है जिसकी भूमिका ख़त्म की जा सके। दादी को हटाते हैं, तो पाठकों को दी जा रही यह सूचना भी हटानी पड़ेगी कि तत्कालीन समय में स्त्री के जन्म के वक़्त खुद घर की औरतें तक कितनी दुखी होतीं थीं। बहिन को हटाते हैं, तो नेग जैसी परंपरा तक पाठक कैसे पहुँचेंगे जो लड़के के जन्म लेने पर भाई अपनी बहिन को देता था। बहिन का डायलॉग दादी को नहीं दिया जा सकता, गोकि नेग छोटों को मिलता था, बड़ों को नहीं।
लघुकथा में एक सिख परिवार का वातावरण है। काल वह मानिए जब सौ का नोट ढोलक वाले को ज़्यादा खुश होने पर दिया जाता था।
लघुकथा में पात्रों द्वारा बोली गयीं भाषा उनकी अपनी भाषा है। वे सहज और प्रवाहमय हैं। लेखक द्वारा ठूसें हुए नहीं हैं। उनमें मौलिकता है।
लघुकथा के एक पात्र का ज़िक्र नहीं हुआ, वह है सन्तु ढोलिया। वह मूक पात्र है। बस उसकी ढोलक बोलती है। मज़े की बात है कि ढोलक लघुकथा का पात्र न होने के बावज़ूद खूब बोलती है। लेखक उससे बुलवाता भी खूब है। ज़िले सिंह को नचाना जो होता है। ढोल पर जिले सिंह ही नहीं नाचता, हर वह आदमी नाचता है, जिसके घर लड़की ने जन्म लिया होता है।
इस तरह यह लघुकथा आज भी प्रासंगिक है। बेशक़ आज लड़कियों के जन्म पर स्यापा न दिखता हो, बेशक़ आज उनका जन्मदिन मनाया जाने लगा हो; लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर लिखी गयी रचना को परिस्थितियाँ बदलने पर भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। हालाँकि परिस्थितियां सर्वत्र बदली हों, ऐसा नहीं लगता।
जब भी ‘जिले सिंह’ का ज़िक्र होगा, नवजन्मा लघुकथा याद आएगी और दुनिया के सत्पुरुषों को अपनी मूछें उमेठने का मौका मिलेगा।
इनकी ऐसी ही एक ऊँची लघुकथा है – ऊँचाई। इनकी इस लघुकथा में संवेदना और भाषा का सुन्दर समन्वय मिलता है। पिताजी अपने विवाहित पुत्र के घर बिना सूचना के आ गए तो पुत्र व बहू के हाथ – पाँव फूल गए। फिर घर में क्या – क्या होता है, इस स्थिति पर एक रोचक और संवेदनशील लघुकथा लिखी है काम्बोज जी ने।
इनकी एक अन्य लघुकथा है – कमीज। पिता हरीश की कमीज की जेब से पैसे निकल गए तो पत्नी से पूछताछ होती है। पता चलता है पैसे पुत्र ने निकाले थे। क्यों निकाले थे, इसपर पूरी संवेदनशीलता के साथ भिगोया है काम्बोज जी ने।
‘चक्र’ ऐसी ही एक और संवेदित कर देने वाली लघुकथा है, जो एक पिता के पुत्र-प्रेम को दर्शाती है। मोना की कारगुज़ारियों से तंग आकर पापा उसके ऊपर हाथ उठा देते हैं और फिर शुरू होता है दोनों के मध्य सुलह का सिलसिला।
‘धारणा’ इनकी एक और प्यारी लघुकथा है। ‘पिघलती हुई बर्फ’ पति – पत्नी के संबंधों पर एक रोचक और चर्चित लघुकथा है। ‘प्रदूषण’ एक विचारोत्तेजक लघुकथा है, जो पाखंड पर व्यंग्य करती है। व्यंग्य पर तो इनकी बहुत लघुकथाएँ हैं। ‘संस्कार’ लघुकथा में घर के पालतू कुत्ते और घर के चिराग के मध्य एक काल्पनिक बातचीत है। यह लघुकथा व्यंग्य की सारी हदें पर करती दिखती है। लघुकथा ‘शाप’ का व्यंग्य चकित करता है। महाभारत के पात्रों के साथ एक और व्यंग्य शैली की लघुकथा है – वफ़ादारी।
बिम्ब और प्रतीकों का सुन्दर समन्वय मिलता है काम्बोज जी की कुछ लघुकथाओं में। ‘उड़ान’ ऐसी ही एक लघुकथा है।
काम्बोज जी बेहद मृदु भाषी हैं। इस लिहाज़ से इनकी अधिकतर लघुकथाएँ सॉफ्ट होनी चाहिए; परंतु संवेदना वाली लघुकथाओं को अलग कर दें, तो हमें इनकी बहुत सी लघुकथाओं में व्यंग्य शैली का प्रयोग मिलता है। ये समाज में भ्रष्टाचार और विडंबनाओं पर तंज के साथ लिखी गईं हैं। ये अतिरिक्त रूप से नम्र हैं। यूँ कहिए कि ईमानदारी से नम्र हैं। इनकी कतिपय लघुकथाओं में बेईमानी पर व्यंग्य कसा गया है, पूरी ईमानदारी के साथ।
इनमें से बहुत सी लघुकथाएँ काफी पूर्व लिखी गई हैं; लेकिन आज भी ये उसी तल्लीनता के साथ पढ़ी जाती हैं। रचना में पठनीयता होती है ,तो वह कभी पुरानी नहीं होती। इनकी कतिपय लघुकथाएँ कभी पुरानी नहीं होंगी। बेशक समय बदल जाए; लेकिन लघुकथाएँ नई रहेंगी। इनमें जीवन के जिस मर्म को छुआ गया है, वह उन्हें कभी पुरानी होने नहीं देगा।
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