” अब बस भी करो बेटा , पिछले तीन घंटों से लगातार मोबाइल पर गेम खेल रहे हो । आंखें तो खराब होंगी ही रिजल्ट भी खराब होगा।”
” कल मैथ्स के पेपर्स हैं और तुम्हारी यही पढ़ाई चल रही है ।” रीमा ने झुँखलाते हुए रचित को बोला ।
” मम्मी आप तो बस मुझे ही बोलती हैं । दीदी को तो बिलकुल नहीं डाँटती । वो भी तो कितनी देर से यू ट्यूब पर मूवी देख रही है । हाँ आप क्यों बोलेंगी वो तो लाडली जो ठहरी ।” बोलते – बोलते दस वर्षीय रचित के आँखों से आंसू निकलने लगे । रचित को अच्छी तरह पता था कि मम्मी किसी की आँखों में आँसू नहीं देख सकती ।
रचित के आँसू के इतिहास -भूगोल सभी से वाकिफ़ थी रीमा। रचित ही क्यों घर के सभी सदस्यों के आँसुओं से परिचित थी मगर फिर भी सबके लिए एक पैर पर खड़ी रहती थी। ऋषिका की दसवीं की परीक्षा सर पर थी और उसका फिल्में देखने का शौक बढ़ता ही जा रहा था । दो – चार बार रीमा ने प्यार से समझाया पर ऋषिका से हर बार यही सुनने मिलता ” मम्मी आप कुछ समझती ही नहीं है । मैं लगातार नहीं पढ़ सकती और मेरे लिए रिलैक्स करना बहुत ज़रूरी है ।”
सख्ती से पेश आना रीमा के स्वभाव में ही न था। उसका मानना था कि हम कभी भी कोई काम किसी से ज़बरन नहीं करवा सकते जब तक कि वह खुद उसे करने की इच्छा या जुनून न रखे । यही धारणा रखते हुए रीमा अपने बच्चों को थोड़े समय के लिए छोड़ देना ही उचित समझ रही थी ।
रात के बारह बजे तक अम्मा जी का टीवी देखना भी रीमा को उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं लगता था । मगर अम्मा भी कहाँ मानने को तैयार रहती थी ” बस बेटा थोड़ी देर और देखूँगी , नींद भी तो नहीं आती है और कौन सा मुझे सुबह स्कूल जाना है । ” रीमा के हाथों से दवा खाने के बाद अक्सर अम्मा जी बोल पड़ती ।
दिन भर के सारे काम ख़त्म करके जब रीमा बिस्तर पर जाती तो अक्सर रोहित के मुँह से आती शराब की बदबू उसे सोने नहीं देती । हफ़्ते में कम से कम चार दिन तो ऐसा ज़रूर होता था । खुद को रोकने की कोशिश जब नाकाम हो जाती, तो यदि कभी रीमा शराब का ज़िक्र भी करती, तो रोहित तुरंत बोल पड़ता- “रीमा प्लीज़ अब तुम मुझे लेक्चर देने मत बैठ जाना ।ऑफिशियल पार्टीज में कितना ज़रूरी होता है, यह सब तुम क्या जानो ? वैसे भी तुम पता नहीं दूसरों की ज़िन्दगी में दखल देने का क्या नशा पाल रखी हो ? ”
रीमा सोचती रह जाती कि वाकई में वह नशा में है या बाकी सब ।और जिस दिन उसका नशा उतर जाएगा, तो क्या यह घर, घर रह पाएगा ?
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