बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में माँ के साथ नाना के गाँव आता था।
कितना सुंदर गाँव है हमारे नाना का, एक लाइन में साफ सुथरे लिपे- पुते मिट्टी के घर। नाना के घर के सामने चबूतरे पर नीम का पेड़ था। पेड़ के नीचे नाना जी बैठे- बैठे गाँव वालों की समस्याओं को सुलझाते रहते। हम लोग सभी भाई -बहिन खेलते रहते, मामा के बेटा- बेटी भी तो हमारे ही भाई- बहिन थे। गोधूलि बेला में गायों के गले में बँधी घंटी की टुन- टुन की आवाज दूर से ही आने लगती।
कभी- कभी नाना के साथ खेत खलिहान देखने जाता था। पतली सी पगडंडी अमराई में विलुप्त हो जाती। आम चूसते, दौड़-भाग करते, कुएँ पर चलते रहट को एकटक देखते कब दोपहर हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था।
अब नाना नहीं हैं, मामा का गाँव, सिक्स लाइन सड़क से जुड़ गया है, तो आज अपनी कार से आया हूँ।
एक आम के पेड़ के नीचे गाड़ी रोक दी।
“शायद यह वही जगह है, जहाँ अमराई थी, पर कहाँ गई वह अमराई…, कहाँ गई? “
मेरी कातर आवाज सुन एक पेड़ से जवाब आया, “जिस सड़क पर तुम खडे़ हो, वहीं अमराई थी। मेरे सभी भाई इस सड़क के नीचे दफन हो गए हैं।”
“और वह कुआँ कहाँ गया?”
“पानी देते – देते सूख गया था बेचारा, तो उसमें कचरा डाला जाने लगा, अब मिट्टी से पाट दिया गया है, वह देखो वहाँ।”
“नाना के वह हरे- भरे खेत कहाँ गए?”
“सामने देख नहीं रहे हो? प्लाट कट गए हैं, नई कालोनी बन रही है, सभी खेत बिक गए हैं।”
“तब तो मामा मालामाल हो गए होंगे! “
“हाँ, पैसा तो बहुत मिला था, जितना कभी देखा नहीं, पर पैसों के साथ दुर्गुण भी तो साथ आते हैं।”
“तो क्या हुआ, करोड़ों मिले होंगे?”
“अय्याशी, जुआ और शराबखोरी में सब उड़ गए। अब खटिया से लग गए हैं तुम्हारे मामा।”
“उन्हें देखने ही तो आया हूँ।”
“मैं तुम्हारे नाना का साथी हूँ, मेरी बात मानो बेटा, लौट जाओ।”
“क्यों नाना?”
“तुम्हारी स्मृतियों में जो गाँव बसा है, उसे जिंदा रहने दो।”