बेटा जब रात ग्यारह बजे तक घर नहीं आया तो माँ परेशान होने लगी थी। वह कभी घर में अंदर जाती तो कभी बाहर दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती। कभी ड्राइंगरूम में आकर बहू से पूछती, “कब आएगा शांतनु, बहू।’’
सीरियल देख रही बहू को सीरियल में व्यवधान उत्पन्न होने लगता। बहू खिसियाने लगती, ‘आ जाएँगे, मम्मी। आप परेशान न हों। मैं करती हूँ फोन उन्हें…अभी।”
माँ फिर बाहर दरवाजे तक आती और दूर तक जाती सड़क को निहारती रहती। फिर थक हारकर अंदर बैठ जाती। तभी बाइक की आवाज आई।
“बेटा आ गया है शायद” होंठ बजते उसके और लपककर बाहर देखा- बेटा उसे देखे बगैर ही ड्राइंगरूम में चला गया। आफिस बैग एक ओर पटक पत्नी को अपनी बाहों में भर लिया।
रात को खाने की टेबुल पर। माँ खाना खाने से पहले बेटे को निहारती। सभी खाने पर टूट पड़ते। माँ आखिर पूछ ही लेती, “आज देर कैसे हो गई बेटा…कहीं कुछ…गड़बड़…सब ठीक तो है।”
बेटा ने माँ की ओर देखा। मुँह को ले जाता कौर हाथ में ही रोक लिया-“आप मेरे लिए परेशान न हुआ करें मम्मा ! अब मैं बड़ा हो गया हूँ। अब बच्चा नहीं हूँ मैं।”
“न जाने क्यों तू, मुझे अभी भी बच्चा ही लगता है”- माँ कहते-कहते रुक गई कि सोचती कहीं बेटा नाराज न हो जाए और चुपचाप सिर झुकाए रोटी का कौर तोड़ने लगी ।
-0-