धूल उड़ रही थी। सूखी, सशंक धूल, जैसे समय के पाँव रगड़ खाते हों धरती से। एक के पीछे एक, जैसे किसी अदृश्य व्यवस्था ने इन्हें बाँध रखा हो, ये बैलगाड़ियों की कतार बढ़ती जा रही थी। बैलों की आँखों में कोई प्रश्न नहीं था, केवल आगे बढ़ने का निश्चल आग्रह था। मानो वे नहीं जानते कि वे कहाँ जा रहे हैं; पर यह जानते हैं कि एक दूरी तय करने पर ही चारा मिलेगा।
हर बैलगाड़ी में एक घर बसा था, लटकती पोटलियाँ, लोहे के जीर्ण बक्से, झांकती आँखें, और एक अदृश्य थकान। कोई रो नहीं रहा था, कोई हँस भी नहीं रहा था। यह आत्मकरुणा का कोई लयबद्ध प्रस्थान था।
ऊँचाई से देखने पर यह एक रेखा थी, समय की, विस्थापन की, या शायद विभाजन की। और इस रेखा में कोई कोलाहल नहीं था, केवल गति थी, बढ़ना ही था। जैसे कोई मौन शंखनाद हुआ हो, और लोग चल पड़े हों उस ध्वनि की अनुपस्थिति में भी।
बीच में एक बच्चा था, अपनी माँ की गोद में उलझा हुआ। उसकी आँखों में न आँसू थे, न हँसी। केवल अचरज कि यह सब क्या है? शायद वही एक था, जो जानना चाहता था।
“हम कहाँ जा रहे हैं?”
माँ सपाट चेहरे से पोटली से सूखी रोटी निकालकर खिलाती रही। जवाब था, पर विलीन हो गया था।
और सबसे आगे चल ही बैलगाड़ी पर बैठे बूढ़े की कमर झुकी हुई थी, दुख रही थी; पर वह रुका नहीं, पीछे नहीं लौटा। वह जानता था-मुड़ने में मृत्यु है, आगे बढ़ने में बचे रहने की संभावना। देश साँस लेता जीव ही तो था, तलवार से दो हिस्से में काटा गया तो बहुत खून बहा।
“बोलो न? हम कहाँ जा रहे हैं?”
माँ ने कौर बच्चे के मुँह में देते हुए कहा-” हम जा रहे हैं, बेटा। इस पल का बस इतना- सा सच है। कहाँ? ये तो पहुँच जाएँ, तो समझो। ज़मीन से छूटी, उड़ती रेत, कहाँ टीला बनाएगी, ये तो वह भी नहीं जानती।”
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