कोई दस दिन पहले की ही तो बात थी, जब कम्मो ने पोंछा लगाते हुए देखा था कि कैसे, आईने के सामने खड़ी पिंकी बेबी ने, अपनी बाँह पर गुदे उस नाम को अलग-अलग कोण से निहारा था। फिर कैसे उसे सहलाया था – और फिर कैसे एकाएक बाँह उठाकर चूम लिया था उसे।
-‘‘हाय, कितना प्यारा गोदना था! कितनी सुंदर लिखावट थी!’’ कम्मों अपलक देखती रह गई थी। उसे लगा था कि कोई उसकी कलाई गुदगुदा रहा है।
लेकिन आज! पिंकी की बाँह से वह नाम ऐसे नदारद है, मानो वहाँ कभी था ही नहीं। कम्मो हैरान है कि ऐसी गाढ़ी पक्की स्याही से बनी निशानी, यूँ गायब कैसे हो गयी भला?
‘‘आपका वह टट्टू कहाँ गया बेबी?’’ उससे रहा नहीं गया तो पूछ बैठी।
‘‘टट्टू नहीं टैटू’’ पिंकी खिलखिलाकर हँस पड़ी -‘‘अरे कम्मो आंटी, वह क्या है न कि हमारा ब्रेकअप हो गया है – तो मैंने वह टैटू रिमूव करवा लिया – आई मीन हटवा दिया।’’
‘‘हाय राम! -’’ कम्मों के मुँह से सिसकी निकल गई – ‘‘उसमें तो बड़ा दर्द हुआ होगा?’’
‘‘अरे आजकल कोई दर्द-वर्द नहीं होता आंटी’’- पिंकी ने लापरवाही से कंधे उचकाए -‘‘लेज़र बीम से आसानी से मिट जाता है, बस थोड़ा-सा हर्ट होता है; लेकिन देखो, निशान तक नहीं बचता।’’
कम्मो चुपचाप पोंछा लगाने लगी। उसे ऐसा महसूस हुआ, मानों सैकड़ों चींटियाँ उसकी कलाई में रेंग रही हों।
‘‘अरे आंटी मैं कई दिनों से पूछना चाह रही थी कि आपकी रिस्ट पर यह स्कार – आई मीन – यह दाग़ कैसा है?’’
पिंकी के इस सवाल पर कम्मों पहले तो सकपका गई, फिर एकाएक हँस पड़ी -‘‘वह क्या है न बेबी कि हमारा भी हो गया था बरेकअप! तो हमने भी उसका नाम मिटा दिया था। बरसों पहले गाँव के मेले में गुदवाया था उसे। लेकिन कमबख्त धोखेबाज़ निकला, तो उसी रात चूल्हे से जलती लकड़ी निकालकर अपनी कलाई पर रख ली थी -हाय ! पूछो मत बेबी-कित्ता दर्द हुआ था !’’
सहसा उसकी हँसी फीकी पड़ने लगी -‘‘काश, हमारे ज़माने में भी यह मुई लेज़र-फेज़र होती। देखो, नाम तो मिट गया, पर निशान रह गया। कभी-कभी यह कमबखत बहुत टीसता है बेबी!’’