”नानू! ये ऑकरा है न? इसके अंदर इतने होल्स क्यूं होते हैं?” गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल आई छह वर्षीय नव्या अपने नाना के किचन गार्डन को देखकर सवाल पूछ रही थी।
“प्रकृति ने इसे ऐसा ही बनाया है” निर्मल जी ने जवाब दिया।
“ये देखो! ये खीरे की बेल है, कुकंबर की” निर्मल जी कुछ नया दिखाने के उद्देश्य से बोले।
“अच्छा! कुकंबर! पर ये बेल्ल तो नहीं है।”
“अरे बेल, मतलब क्रीपर।”
“ओ ! तो ऐसे बोलो न नानू”
“अच्छा नाऽनू..”
“अच्छा रुक जरा..नानू..वाली। वहां मुंबई में तुम्हारे इतने सवालों के जवाब कौन देता है?” निर्मल जी हॅंसते हुए पूछा।
“मम्मा..और कौन!” नव्या बेफिक्री से हाथ चमकाते हुए बोली।
“आपको पता है नानू…ट्रेन का इन्वेंशन कैसे हुआ? और एयरोप्लेन का?” नव्या ने ऑंखें बड़ी करते हुए होंठ को गोल बनाते हुए बोली।
“नहीं, मुझे तो नहीं पता” निर्मलजी ने उसी के जैसे मासूमियत से जवाब दिया।
“अरे! आपकी मम्मा ने आपको ये सब नहीं बताया क्या?” नव्या ने अपनी बायीं हथेली को माथे पर हल्के से ठोकते हुए कहा।
“मेरी मम्मा को तो सब पता है। मैं जो पूछती हूं उसका क्विक आंसर देती है। हाँ, कभी-कभी अटकती है फिर मोबाइल देखकर बता देती है।
‘ए नानू और नातिन! चलो नाश्ता कर लो।” नव्या की नानी आशा ये कहते हुए वहां आ पहुंचीं।
‘अरे ये नव्या तो बिल्कुल नूतन जैसी ही है। इतने सवाल पूछती है कि बस… मुझे नूतन का बचपन याद आ गया।” निर्मल जी ने हॅंसते हुए पत्नी से कहा।
“अच्छा! नूतन के सवाल तो खत्म ही नहीं होते थे। मॉं ! ये रोटी फूल कैसे जाती है? भिंडी की सब्जी में नमक पहले डाल देने से ये गलने क्यों लगती है? इतने सवाल…इतने कि…”
आशा जी की बात खत्म होने से पहले ही नव्या तुनक कर बोली – नहीं, मैं मम्मा जैसी बिल्कुल नहीं हूं।
निर्मल जी ने हॅंसते हुए पूछा – अरे क्यूं?
“मम्मा का तो पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था लेकिन मुझे पढ़ना पसंद है और मैं एस्ट्रोनॉट बनूंगी।” नव्या थोड़े गंभीर और गुस्से वाले लहजे से बोली
नव्या के नाना – नानी चौंक गए ।
“अरे नव्या को किसने कहा के उसके मम्मा को पढ़ने में मन नहीं लगता था?” आशा ने आश्चर्य से पूछा।
“मम्मा ने खुद बताया। मैंने एक बार सुना था मेरी क्लास टीचर और मम्मा बात कर रहे थे कि मम्मा अगर ग्रेजुएट होती तो उन्हें मेरे स्कूल में टीचर बना दिया जाता क्योंकि मेरी मम्मा मुझे घर में बहुत अच्छे से पढ़ाती है।फिर मैंने पूछा कि ग्रेजुएट क्या होता है और आप ग्रेजुएट क्यों नहीं हो? तब बताया था उन्होंने।” नव्या बताती जा रही थी।
“क्या बताया?” निर्मल और आशा ने उत्सुकता से पूछा।
” यही कि उनका पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता था, इसीलिए आपने जल्दी से शादी करवा दी मैं कह देती हूं शादी नहीं करूंगी मुझे एस्ट्रोनॉट बनना है।”
निर्मल जी और आशा जी दोनों अवाक् से एक दूसरे का मुंह देख रहे थे।दोनों के कानों में एक ही घटनाक्रम गूंज रहा था और वही वाक्य।
” मुझे ग्रेजुएशन तो कर लेने दीजिए फिर कर दीजिएगा शादी।”
“क्या करना है ज्यादा पढ़कर? अभी तुम्हारे छोटे भाई के इंजीनियरिंग में इतना डोनेशन लग रहा है और फिर इतना अच्छा रिश्ता रोज-रोज नहीं आता।और फिर पढ़-लिखकर भी तो घर-गृहस्थी ही संभालनी है।” दोनों अपनी ही आवाज की प्रतिध्वनि सुन रहे थे।
बरामदे की तरफ नजर गई तो देखा अंदर से आती नूतन ” नव्या…नव्या” पुकार रही है। निर्मल जी और आशा जी को लगा कि दरवाजे पर खड़ी नूतन की आंखों के अंधेरे पर नव्या के उजाले चढ़ रहे थे। इस उजाले ने उनके प्रायश्चित के घाव पर मरहम लगाए।
भारती कुमारी-अज़मान ,यूएई
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