मैं जिस कालोनी में रहता हूँ, वह अभी नई-नई आबाद हुई है। यहाँ अधिकतर घर गरीब मजदूर और नौकरीपेशा लोगों के हैं। कुछ लोगों ने मिलकर कालोनी के उत्थान के लिए एक कल्याण समिति बनाई। मैं भी उसका सदस्य हूँ।
सबसे पहले लोगों का विचार था कि कालोनी में एक मंदिर बनाया जाए। फिर आपसी विचार-विमर्श से यह तय हुआ कि मंदिर नहीं, एक विद्या-मंदिर की ज़रूरत है इस कालोनी को, जहाँ गरीब परिवारों के बच्चों को ज्ञान और शिक्षा सहज सुलभ करवाई जा सके। आपसी सहयोग से एक छोटे-से विद्या-मंदिर की इमारत तैयार की गई। फिर सुझाव आया कि क्यों न इसका उद्घाटन किसी नेता या मंत्री से करवाया जाए। इस पर भी खूब सोच-विचार किया गया और सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि यह नेक काम किसी नेता या मंत्री के हाथों नहीं, किसी शिक्षा-शास्त्री, समाजसेवी अथवा किसी वरिष्ठ लेखक के हाथों करवाया जाए।
अत: देश के जाने-माने प्रगतिशील विचारों वाले वरिष्ठ लेखक शास्त्री जी से सम्पर्क किया गया जो इसी शहर में रहते हैं। वह सहर्ष तैयार हो गए। उद्घाटन कार्यक्रम के दिन शास्त्री जी कार्यक्रम से दो घंटे पूर्व ही पहुँच गए। मैं उन्हें बस-स्टॉप पर लेने गया।
”चलिए, पहले मैं आपको अपने घर लिए चलता हूँ। कार्यक्रम शुरू होने में अभी काफी समय है।” नमस्कार करने के बाद मैंने उनसे कहा तो वह मान गए। बस स्टाप से मेरा घर समीप ही था। हम पैदल ही चल दिए। अभी आधे रास्ते में ही पहुँचे थे कि शास्त्री जी ठिठक कर खड़े हो गए।
”क्या हुआ शास्त्री जी ?”
”देखा नहीं भाई, अभी-अभी काली बिल्ली रास्ता काटकर गई है। अपशकुन होता है। थोड़ा रुको अब…।”
मैं हैरान था कि इतना विद्वान और प्रगतिशील विचारों वाला लेखक…
तभी मैंने कुछ सोचते हुए उनसे कहा, ”चलिए, आपको विद्या-मंदिर ही लिए चलता हूँ। समीप ही है।”
”क्यों भाई ? आप तो मुझे अपने घर ले जा रहे थे ?”
मैंने सच्चाई बयान कर देना ही उचित समझा, ”आदरणीय, बात दरअसल यह है कि मेरे घर में कई बिल्लियाँ हैं। रोज न जाने कितनी बार आते-जाते हमारा रास्ता काटती हैं। आपको परेशानी होगी, बिल्लियों वाले घर में।”
मेरा उत्तर सुनकर वे गहन सोच में पड़ गए।
”चलिए, विद्या-मंदिर का रास्ता उधर से है…” मैंने उनकी मौन तंद्रा को तोड़ते हुए अनुरोध किया।
उन्होंने एक पल मेरी ओर देखा। फिर मुस्कराते हुए बोले, ”नहीं, अब तो मैं पहले आपके घर ही चलूँगा।”
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