
दिन सुहावना था। सुबह के यही कोई दस बजकर तीस मिनट का समय था। एक महिला भीड़ को चीरते हुए आर्मी हॉस्पिटल के साइकेट्रिस्ट डॉक्टर के सम्मुख अपनी पर्ची रखते हुए बोली- “पिछले कुछ समय से मेरे बालों की सफ़ेदी बढ़ती जा रही है। जीवन में कोई समस्या नहीं। मन शांत है, फिर भी…?”
“आप अपनी दिनचर्या के साथ-साथ अपना मानसिक डाइट प्लान बताइए?” डॉ. ने पर्ची पर पेपर वेट रखते हुए पूछा।
“मानसिक डाइट प्लान ? ” महिला ने अनभिज्ञ भाव से वाक्य दोहराया।
“स्वतः मिलने वाला या जो मैं फॉलो करती हूँ वह?” महिला ने विनम्र भाव के साथ डॉ. से जानना चाहा।
“स्वतः मिलता है वह, हम जानते हैं। आप जो फॉलो करती हैं, वही बताए।” डॉ. ने सहज भाव से कुछ लिखते हुए कहा।
महिला, डॉ. को मौन दृष्टि से घूरती रही। डॉ. ने विश्वास जताते हुए कहा- “मेरा आर्मी हॉस्पिटल में पिछले बीस वर्ष का अनुभव रहा है। यहाँ! सैनिकों से मानसिक डाइट प्लान फॉलो करवाए जाते हैं। वहीं मैं समझ सकता हूँ, समाज में उनकी पत्नियों से उसका निर्वहन करवाया जाता है।”
महिला मौन थी। अपनी साँस गटकते हुए ‘ठीक है ‘ के भाव के साथ गर्दन से सहमति जताते हुए बोली- “परंतु पिछले कुछ समय से मुझे लग रहा है कि मेरे क़दम बड़ी तेज़ी से बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो रहे हैं। मेरी आत्मा देह से विरक्त हो रही है।” महिला ने अनमने भावों से फिर अपनी बात रखी।
“इस पगडंडी पर खुली हवा का अभाव रहता है। आप स्वतः मिलने वाले मानसिक डाइट प्लान के ऑवर डॉज से परहेज़ करें।” डॉ. ने कुछ स्पलीमेंटस लिखते हुए कहा।
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