जून 2026

दस्तावेज़पंजाबी मिन्नी कहानी का हिन्दी लघुकथा से तुलनात्मक अध्ययन     Posted: February 1, 2025

आरम्भ

 पंजाबी मिन्नी कहानी की यात्रा बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से आरम्भ होती है। विक्रम सोनी द्वारा हिंदी में सम्पादित लघुकथा-संकलन ‘लावा’(1987) में प्रकाशित अपने लेख ‘पंजाबी मिन्नी कहानी की यात्रा’ में मैंने लिखा था –“देखा जाए तो 1950 के आसपास से पंजाबी की पत्रिकाओं में इस रूप को स्थान मिलने लगा था। ‘पंज दरया’(लुधियाना), ‘जीवनप्रीत’(चंडीगढ़) और ‘कँवल’(अमृतसर) आदि पत्रिकाएँ तब से अब तक (यानी 1987 तक) मिन्नी कहानियाँ प्रकाशित कर रही हैं।”  डॉ.अनूप सिंह ने जसवंत सिंह कँवल की पुस्तक ‘जीवन कणियाँ’(1944) और बिशन सिंह उपासक की पुस्तक ‘चौभां’(1956) में मिन्नी कहानी के लक्षणों का उभार बताया है। डॉ.हरप्रीत सिंह राणा ने ‘आरसी’ के अप्रैल 1970 अंक में प्रीतम सिंह पंछी की तीन लघुकथाओं के प्रकाशन का उल्लेख किया है। मेरे मत में रोशन फूलवी द्वारा सम्पादित और ओमप्रकाश गासो द्वारा चयनित मिन्नी कहानियों के संकलन ‘तरकश’(1973) को मिन्नी कहानी के इतिहास का प्रस्थान-बिंदु इसलिए माना जाना चाहिए, क्योंकि इसमें 48 मिन्नी कहानीकारों की रचनाएँ हैं। इसमें ओमप्रकाश गासो,अजमेर सिंह औलख,गुरबचन सिंह भुल्लर,रामसरूप अणखी जैसे मुख्यधारा के कथाकारों की मिन्नी कहानियाँ भी शामिल हैं। इसका अर्थ है कि मिन्नी कहानी तब तक लेखक-वर्ग के बीच सुपरिचित हो चुकी थी,जबकि लिखी वह पहले से जा रही थी। कब से? -यह शोध का विषय है।

  इसके बरक्स हिंदी में मुख्यधारा के अनेक लेखकों ने सन 1950 से पहले लिखना शुरू कर दिया था। विष्णु प्रभाकर के अनुसार उनकी पहली लघुकथा जनवरी 1939 में ‘हंस’ में प्रकाशित हुई थी। हरिशंकर परसाई और रावी ने 1947 से लघुकथाएँ लिखना शुरू कर दिया था। तब तक इसे ‘लघुकथा’ कहने के प्रमाण नहीं मिलते। संरचना की दृष्टि से प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की अनेक रचनाएँ ‘लघुकथा’ की श्रेणी में आती हैं ,जो सन 1920 से 1935 के बीच लिखी गई हैं। इससे भी पीछे जाएँ,तो भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तक ‘परिहासिनी’(1876) में संकलित दो श्रेष्ठ लघुकथाएँ – ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ बहुचर्चित रही हैं। किन्तु पहली बार आनंद मोहन अवस्थी के संग्रह ‘बन्धनों की रक्षा’(1950) में लघुकथा शब्द का प्रयोग मिलता है। पंजाबी में जो महत्त्त्व ‘तरकश’(1973) को प्राप्त है, वही ऐतिहासिक महत्त्त्व हिंदी में रमेश जैन और भगीरथ द्वारा सम्पादित लघुकथा-संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर’(1974) को प्राप्त है।

नामकरण

     पंजाबी की मिन्नी कहानी का नाम शुरू से ही स्थिर हो गया था। सन 1970 में ‘प्रीतलड़ी’ में प्रकाशित प्रीतम सिंह पंछी की तीन रचनाएँ ‘मिन्नी कहानी’ नाम से आई थीं। हिंदी में भी ‘लघुकथा’ नाम ही चलन में आया,फिर भी लघुकथा और लघु कहानी का द्वंद्व सन 1980 तक बना रहा। यह द्वंद्व 22 नवंबर 1980 को होशंगाबाद के लघुकथा सम्मेलन में दूर हुआ और केवल ‘लघुकथा’ शब्द के प्रयोग पर सहमति बनी। 1972 में भगीरथ द्वारा सम्पादित ‘अतिरिक्त’ पत्रिका में लघुकथाएँ ‘लघु कहानियाँ’ नाम से छपा करती थीं। ‘सारिका’ 1967 से ही ‘लघुकथा’ शब्द का प्रयोग करने लगी थी। उसमें पहली बार सितम्बर 1967 में रावी की रचना ‘कंटककाट’ लघुकथा के अंतर्गत छपी थी। इन दोनों भाषाओं के अतिरिक्त बांग्ला में ‘अनुगल्प’ नाम से लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। वहाँ  भी आरम्भ से ही यह नाम स्थापित है। उर्दू में इसके लिए ‘अफसांचा’ नाम शुरू से चलन में रहा। कई भाषाओं में लघुकथा के लिए ,विभिन्न कारणों से, एक से अधिक नाम प्रचलित हैं। तेलुगु में दो (चिन्न कथा,कथानिका), मैथिली में दो (लघुकथा,बीहनि कथा),मराठी में तीन(कथिका,अनुभव कथा,लघुतम कथा) और मलयालम में चार (कुरुंकथा,चेरिया कथा,तीरे चेरिया कथा,लघुकथा) नाम लिए जाते हैं। इनके पीछे इस रूप का लोकप्रिय धारा के तौर पर न उभर पाना, सजग आलोचक का न होना, व्यक्तिगत महत्त्त्वाकांक्षा आदि कारण विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त भी अनेक भारतीय भाषाओं में लघुकथाओं जैसी रचनाएँ लिखी जा रही हैं,किन्तु उनका अलग से कोई नाम दिया गया है या नहीं और यदि दिया गया है तो वह क्या है – इसकी जानकारी सामने नहीं आ पाई।

आकार का प्रश्न  

किसी गद्य-रचना के लिए शब्द-संख्या कोई पैमाना नहीं है। विधा का निर्धारण भी उसकी संरचना ही होती है। फिर भी आकार की लघुता के कारण इस कथा-रचना के आकार अथवा शब्द-संख्या पर भी विचार होता रहा है। पंजाबी मिन्नी कहानी में इस पर चर्चा नहीं होती,किन्तु वहाँ  इसका आकार भी लगभग स्थिर रहा है। लगभग एक पृष्ठ तक मिन्नी कहानी लिखने की परिपाटी-सी बन गई है। सुरिंदर कैले द्वारा सम्पादित ‘अणुरूप’(त्रैमासिक) के जुलाई 1972 से लेकर अनेक अंक इस सन्दर्भ में देखे जा सकते हैं,जिनमें सुरिंदर कैले की ‘अंतर’(जुलाई 1972),जगजीत सिंह दाद की ‘भोग’ और दविंदर दीदार की ‘क्रांतिकारी’(दोनों नवंबर 1972) आदि ऐसी ही मिन्नी कहानियाँ हैं। इधर पंजाबी की कुछ मिन्नी कहानियाँ अंतर्वस्तु की आवश्यकता का अनुभव कर इस बाह्य आकार की लकीर पार कर गई हैं। इनमें सुरिंदर कैले की ‘भयानक बीमारी’, ‘पगली मर गई’ और ‘बस वैसे ही’ तथा डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की ‘शीशा’, ‘सपने की बुनियाद’ और ‘यादों के झरोखे’ आदि अनेक मिन्नी कहानियाँ आती हैं। यह लोचशीलता लगभग पांच सौ शब्दों तक पहुँची है। बहुत-सा यथार्थ इससे आगे जाकर भी व्यक्त किया जा सकता है। यह आकार कहानी के सीमान्त तक निर्विवाद रूप से पहुँच सकता है,बशर्ते उसका निर्वाह लघुकथा, मिन्नी कहानी अनुगल्प जैसा हो।

  हिंदी भाषा देश के दस राज्यों तक फैली हुई है,जिस कारण उसमें लेखन की विविधता का मिलना स्वाभाविक है। हिंदी में लघुकथाएँ एक वाक्य से लेकर सात-आठ सौ शब्दों तक फैली हुई हैं। ऐसी लोचशीलता बांग्ला में भी मिलती है। हिंदी में एक वाक्य की लघुकथाएँ रमेश बत्तरा की ‘कहूं कहानी’ और नासिरा शर्मा की ‘पनाह’ आदि चर्चित रही हैं,जो स्वयं में पूर्ण हैं। मणिपुरी में लन्चेन्बा मीते की ‘विलाप’ ऐसी ही श्रेष्ठ रचना है। हिंदी में ‘सारिका’ के सन 1973 के लघुकथा अंक के प्रभाव से बहुत समय तक दो-ढाई सौ शब्दों तक के सांचे में ही, मुख्य रूप से, लघुकथाएँ लिखी जाती रहीं। आवश्यकतानुसार इस बाह्य आकार का अतिक्रमण होना ही था। प्रमाणस्वरूप सन अस्सी के बाद की हिंदी लघुकथाएँ देखी जा सकती हैं। तब इसके बढ़ते बाह्य आकार को लेकर डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी आदि ने इसका तीव्र विरोध किया। यथार्थ को अर्थगर्भी रूप में व्यक्त करने के लिए चाहे जितनी युक्तियों का प्रयोग कर लें, रचना के बाह्य आकार का विस्तार लेखक को अभिव्यक्ति के अधिक अवसर प्रदान करता है। इसीलिए जहाँ हिंदी की मुख्य धारा के लेखकों ने इस आकार को विस्तार दिया,जैसे विष्णु प्रभाकर की ‘तर्क का बोझ’,हरिशंकर परसाई की ‘बदचलन’, चित्रा मुद्गल की ‘पाठ’, राजेन्द्र यादव की ‘हनीमून’,असगर वजाहत की ‘शेर’, रवीन्द्र वर्मा की ‘कोई अकेला नहीं है’, मुकेश वर्मा की ‘आग’, बलराम की ‘रुकी हुई हंसिनी’ आदि, तो वहीं अन्य लघुकथा-लेखकों ने भी इसको विस्तार देते हुए विषय के साथ न्याय किया है, जैसे युगल की ‘दोजख’, अर्चना वर्मा की ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’, कमल चोपड़ा की ‘मारा किसने’, बलराम अग्रवाल की ‘शहर और आदमी’, विकेश निझावन की ‘आचार संहिता’, सुकेश साहनी की ‘बालीवुड डेज’, अशोक भाटिया की ‘लगा हुआ स्कूल’, भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की ‘पढ़े-लिखे’, संजीव शर्मा की ‘नंगा’, स्नेह गोस्वामी की ‘वह जो नहीं कहा’,छवि निगम की ‘लिहाफ’ आदि। और अरुण मिश्र की ‘पॉवर विंडो’ तो एक हजार शब्दों तक जाती है। ऐसी ही आकारगत लोचशीलता, कुछ सीमा तक, बांग्ला की अनुगल्प में भी है,जो उसे अधिक समर्थ बनाती है।

 यहाँ, मुख्य रूप से, पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथा की स्थिति पर तुलनात्मक दृष्टि से कुछ विमर्श करना अपेक्षित है। यद्यपि पंजाबी मुख्य रूप से पंजाब की भाषा है और हिंदी दस राज्यों के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों में भी आधार रखती है। फिर भी,पंजाबी मिन्नी कहानी की निरंतर सक्रियता को देखते हुए दोनों के लघुकथा-साहित्य की तुलना से कुछ अनिवार्य,उपयोगी और प्रासंगिक निष्कर्षों तक पहुंचा जा सकता है।

राजनीति के टेढ़े-मेढ़े रास्ते

      राजनीति के निरंतर पतनशील होते जाने की स्थिति चिंताजनक है। पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथा – दोनों में इस पक्ष पर बहुत कम लिखा गया है। हिंदी में तो कई स्थलों पर राजनीति के विद्रूप को जलाकर उसकी राख पर लघुकथा लिख दी है। ऐसे स्वघोषित प्रतिमानक लघुकथाकारों की तथाकथित रचनाएँ बाह्य सौन्दर्य की लीपापोती कर एक भ्रम पैदा कर रही हैं। उनके भीतर वह ताप,या कहें, तड़प और बेचैनी गायब है, जो ऐसी विद्रूप स्थितियों को देखकर उत्पन्न होती है। राजनीतिक यथार्थ से आंख मूंदकर सुरक्षित यथार्थ की पतली गली में उतर जाना लघुकथा की एक कमजोरी ही कही जाएगी। इसके बावजूद राजनीति पर बेहतर लघुकथाओं की एक क्षीण धारा पंजाबी और हिंदी दोनों में अवश्य मिलती है।

 पंजाबी में सुरिंदर कैले की राजनीतिक यथार्थ के अनेक पक्षों पर लिखी मिन्नी कहानियाँ विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं। ‘पितर भू’(पुरखों की भूमि) और ‘जलूस’ जैसी इनकी रचनाएँ राजनीतिक यथार्थ के एक पक्ष को पूर्णता और विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘पितर भू’ में सरकारी शह पर जल।जंगल,जमीन पर हो रहे कब्जे और इसके लिए बस्तियों को फूंकने की बात सुनकर नौजवान बदला लेने को हथियार उठाना चाहते हैं। लेखक का मत है कि इससे समाधान नहीं होगा –‘अपना निशाना अन्याय के पंख काटने का है।’ इसी तरह ‘जलूस’ मिन्नी कहानी में औरतों को नंगी करके घुमाने और उन पर ज़ुल्म ढाने के प्रसंग हैं। यह एक प्रकार से सत्ता का जलूस है।

लगे हाथ धर्म और साम्प्रदायिकता पर भी बात कर ली जाए। साम्प्रदायिकता स्वयं में एक विचार-दृष्टि है,जो किसी भी धर्म या संप्रदाय में हो सकती है। वर्तमान समय साम्प्रदायिकता के विस्फोट का समय है। जब राज्य-तंत्र ही साम्प्रदायिक होकर एक संप्रदाय के पक्ष में खड़े हो जाए,जिसमें प्रशासन और पुलिस भी पूरी बेशर्मी से साथ दे,तो इसकी भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता प्रशासन आदि की मशीनरी पर कब्जा कर उसे अपने लिए इस्तेमाल करती है। इस नाते यह पहले की साम्प्रदायिकता से भिन्न है। अब तो गाँवों में भी साम्प्रदायिकता घुस चुकी है,जहाँ  हँसी-ठट्ठा गायब हो चुका है। साम्प्रदायिकता हमेशा विवेक की बजाय उन्माद से संचालित होती है। सांप्रदायिक सोच हमेशा किसी-न-किसी शत्रु को मन में रखती है और उस को हानि पहुँचाने के अवसर की तलाश में रहती है। हरभजन सिंह खेमकरनी की ‘बहाना’ इसी मानसिकता को रेखांकित करती है। एक व्यक्ति को ततैये ने काट लिया,तो वह घर जाकर उनके छत्ते को आग लगाने लगा। उसका मत है कि -‘वो ततैया चाहे इसमें नहीं,लेकिन था तो इसी जाति का।’ तो ऐसी समाज-विरोधी सोच साम्प्रदायिकता के मूल में सक्रिय रहती है। ऐसी सोच आदमी को सामान्य रूप से जीने नहीं देती। सुरिंदर कैले की रचना ‘परछावां’ ऐसी ही स्थिति को सजगता से उठाती है। एक मुसलमान शाम को घर पर मीट ले जा रहा है। लेकिन आगे गली में हिन्दुओं को देखकर ठिठक जाता है। घबराया हुआ,लम्बे रास्ते से घर पहुँच स्थिति को बयान करता है। धर्म के बाहरी रूप और साम्प्रदायिकता ने समाज में भय और असहजता का वातावरण बनाया है। सुरिंदर कैले की ही ‘कामरेड का भगवान’ मिन्नी कहानी बताती है कि किसी भी रचना के लिए विस्तृत अध्ययन और विजन का होना क्यों जरूरी है। इसे पढ़कर इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा द्वारा ‘इतिहास-बोध’ पत्रिका के ‘धर्म:कल,आज,कल’ अंक का स्मरण हो आता है। इस लघुकथा में बताया है कि सयाने लोगों ने धर्म की कल्पना समाज को बेहतर बनाने के लिए की थी। धर्म-कर्म जरूरतमंदों की मदद,सामाजिक और आर्थिक बराबरी और संसार को शांति से जीने की राह दिखाता था। लेकिन धर्म के नाम पर दुकानदारियाँ कर ली गयीं और अपने घर भर लिए गए। इनकी ही ‘भयानक बीमारी’ धर्म के नाम पर जमीनें कब्जाए जाने की नीयत पर सवाल उठाती हैं। इसी संकीर्ण सोच को चन्द्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा ‘मेरा घर छिद्रों में समा गया’ बड़ी कलात्मकता के साथ उभारती है। साम्प्रदायिकता का ‘सूअर’(रमेश बत्तरा) धर्मस्थान में कब का घुस चुका है; उसे मारने का उपक्रम करना ही होगा। इस दृष्टि से सुरिंदर कैले की मिन्नी कहानी ‘वाघे दी वाड़’, डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति की ‘हद’ और ‘बॉर्डर अन्दर बॉर्डर’ जैसी राह दिखाती मिन्नी कहानियों का अध्ययन करना जरूरी है। डॉ. दीप्ति की ‘शवगृह’ मिन्नी कहानी में दंगों और हिंसा से मरे दो व्यक्तियों के शव बतियाकर सवाल करते हैं –“ जो सुकून मरकर है,वह जिन्दा रहकर क्यों नहीं?” रामेश्वर काम्बोज ‘हिमाँ शु’ की लघुकथा ‘धर्म-निरपेक्ष’ में एक कुत्ता ऐसे दंगाइयों पर पेशाब कर उनकी औकात बता देता है। साम्प्रदायिकता की समस्या पर डॉ. कमल चोपड़ा ने ‘आयुध’(1986) पुस्तक सम्पादित की, तो युगल ने सांप्रदायिक सद्भाव पर ‘फूलों वाली दूब’(2009) स्वतन्त्र लघुकथा-संग्रह प्रकाशित कराया। पंजाबी में ऐसी पुस्तक का आना अभी बाकी है। 

  हिंदी में राजनीति पर लिखी लघुकथाओं के लिए विशेष रूप से असगर वजाहत, विष्णु नागर,भगीरथ, हरभगवान चावला और चन्द्रेश कुमार छतलानी के नाम लिए जा सकते हैं। ज्ञानदेव मुकेश की ‘ढलान’ बताती है कि प्रशासन में ‘पतन का मार्ग अपनाने की होड़-सी लगी है।’ हरभगवान चावला की ‘मोहल्ला-द्रोह’ इधर नए रूप में उपजी राजनीतिक और धार्मिक संकीर्णता की बखिया उधेड़ देती है। चैतन्य त्रिवेदी की ‘ईश्वर के साथ सपने’ में धर्म के जरिये जनता पर नियंत्रण की कवायद को कलात्मक ताने-बाने के साथ उकेरा गया है। इनकी ही ‘खून पीने के कायदे’ एक रूपक के साथ राजनीतिक शोषण को उजागर करती है।

प्रतिरोध का पक्ष

   प्रतिरोध विरोध का एक पक्ष है। पंजाबी मिन्नी कहानी में प्रतिरोध के साथ समाधान की दिशा भी सुझाई गई है। निरंजन बोहा की ‘नए दीखते’(नवें दिसहदे) मिन्नी कहानी बताती है कि दुनिया की गलत सोच का जवाब देना जरूरी है। विधवा निर्मला जब अंतरजातीय विवाह कर लेती है तो एक का कथन है कि उसकी बारह साल की बेटी के ब्याह में रूकावट आएगी। इस पर निर्मला का कथन है कि दुनिया में दविंदर(उसके पति) जैसे न जाने कितने और हैं।

नयी पीढ़ी का स्वार्थ कुलविंदर कौशल की ‘नयी बात’(नवीं गल्ल) मिन्नी कहानी में उभरता है। पंचायत में दोनों बेटे अपने बाप से अलग होने और बंटवारे की बात करते हैं। बाप का कथन देखें –“फैसला करता हूँ मैं,इन दोनों लड़कों को निकालो घर से बाहर। छह महीने बारी-बारी मेरे पास आकर रहें और छह महीने कहीं और इंतजाम करें,जायदाद का मालिक मैं हूँ मैं।” इसी प्रकार डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की मिन्नी कहानी ‘दिन रात का फर्क’ में विधुर पिता बड़ी उम्र में शादी करने का निर्णय करता है,तो बेटा आपत्ति जताता है। इस पर पिता का उत्तर है कि उसने नहीं कहा कि वह उसके लिए माँ  ला रहा है।

सामाजिक धरातल पर कुछ मिन्नी कहानियाँ प्रतिरोध की प्रवृत्ति के कारण ध्यान खींचती हैं। डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की कहानी ‘स्वागत’ दूसरे शहर में दफ्तरी काम से आई कल्पना के कमरे में उसका बॉस बुरी नीयत से आता है। तब वह वेटरों के सामने उसे तमाचा जड़ देती है। सुरिंदर कैले की मिन्नी कहानी ‘‘उपाय, अन्धविश्वास को व्यावहारिक स्तर पर उपेक्षित करने का कदम उठाकर दिशा देती रचना है।दाल को जल-प्रवाह किए बिना बच्चा ठीक हो जाता है। बलराज कुहाड़ा की मिन्नी कहानी ‘श्राद्ध’ एक सामाजिक विसंगति को शिद्दत से उभारती है। खाता-पीता वर्ग अंधविश्वासों में इस कदर डूबा है कि वह कामगार वर्ग के प्रति घोर असंवेदनशील हो उठा है। श्राद्ध के दिन पुरोहित तो खीर-हलवे से गले तक भर चुका है,लेकिन कामवाली को जूठ के साथ सूखी रोटी मिलती है। कामवाली का प्रतिरोध उसकी सोच में है –‘मुझसे तो कुत्ता ही अच्छा है,जिसे खीर रखी(लिबड़ी) रोटी डालकर आई है।’ जगदीश राय कुलरियाँ की मिन्नी कहानी ‘मुक्ति’ अन्धविश्वास पर प्रतिरोध के साथ तीखी चोट करती है। रुपयों के लालची पण्डे को खरी-खरी सुनाकर कथावाचक खुद ही गंगा में पिता के फूल डाल देता है और इस कर्मकांड की व्यर्थता पर मुहर लगा देता है। डॉ.नायब सिंह मंडेर की रचना ‘मकड़जाल’ राजनीतिज्ञों द्वारा वोटों की खातिर लोगों को उलटी पट्टी पढ़ाए जाने से समाज में फैलते अन्धविश्वास पर उँगली रखती है। रामसेतु कुदरती बना है,इसे मानने वाले अब न सिर्फ बदल रहे हैं,बल्कि ऐसा मानने वालों पर हमलावर भी हो उठे हैं। झूठ का प्रसार वर्तमान समय की एक बड़ी विडंबना(irony) है।

हिंदी में अंधविश्वास के विरुद्ध प्रतिरोधजन्य लघुकथाओं में ‘फूली’(भगीरथ), ‘आत्मा’(विकास नारायण राय),’कुंडली’(अशोक भाटिया), ‘देवी’(हरभगवान चावला), ‘अपशकुन’(गोकुल सोनी), ‘अनोखा मुकदमा’(संदीप तोमर) आदि प्रमुख हैं। 

राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिरोध की कुछ मिन्नी कहानियाँ मिलती हैं। दर्शन सिंह बरेटा की कहानी ‘बगावत’ में तीन बार से विधायक बन रहे भ्रष्ट पिता को पहली बार वोट देने वाला बेटा पिता को वोट न डालने का निर्णय करता है, हालाँकि बेटा धार्मिक प्रवचन ही सुनता है। इस पर सवाल उठता है कि क्या धार्मिक प्रवचन सुनने वाले ईमानदार ही होते हैं? फिर भी यह रचना हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘फैसला’ की याद दिला देती है।

हिंदी लघुकथा में,एक सीमा तक,प्रतिरोध की एक संस्कृति विकसित हो गई दीखती है। परिवार,समाज,राजनीति,स्त्री-पक्ष,दलित सन्दर्भ -प्रतिरोध के सभी पक्ष यहाँ मिल जाते हैं। देश के अधिकांश लोगों की भाषा होने के कारण हिंदी में इस विस्तार का होना स्वाभाविक ही है। हिंदी लघुकथाओं में प्रतिरोध का स्त्री-पक्ष पूरी शक्ति के साथ उभरकर सामने आया है। उनमें रूढ़ियों के रूप में बनाई गई वर्जनाओं को तोड़ने का निर्भीक उपक्रम मिलता है। वह अब शरीर को पवित्र मंदिर न मानकर इन वर्जनाओं को तोड़ती हुई अपनी इच्छाओं और लालसाओं के साथ लघुकथाओं में उतरती है। पुरुषों की बनाई अतार्किक बेड़ियों को तोड़ने का उपक्रम संध्या तिवारी की ‘जन्म-जन्मान्तर’,कमल कपूर की ‘आधुनिका’ और ‘वीरांगना’ ,कुमार संभव जोशी की ‘पवित्रा’,शमीम शर्मा की ‘पीहर’,शुक्ला चौधरी की ‘सवाल’,महेश दर्पण की ‘रोज़ी’, सुभाष नीरव की ‘धर्म-विधर्म’,योगराज प्रभाकर की ‘फक्कड़ उवाच’,पूनम डोगरा की ‘समझदार’,उमेश महादोषी की ‘महिला विमर्श’, कांता राय की ‘रंडी’,पूरन सिंह की ‘रजस्वला’,कृष्ण चन्द्र महादेविया की ‘सजा’,उपमा शर्मा की ‘बोनसाई’,मृणाल आशुतोष की ‘रघुकुल रीत’,सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ की ‘मात से शाह’ आदि कितनी ही लघुकथाएँ हैं। यहाँ एक उदाहरण देना काफी है। विनीता राहुरीकर की लघुकथा ‘दहलीज के बंधन’ में पति दूसरी औरत को छोड़कर घर वापसी करना चाहता है।इधर पत्नी नयी नौकरी पर जाते हुए ननद के तर्कों का जवाब देती है –“जो लौट रहा है,वो इस घर का बेटा है,भाई है। मेरा रिश्ता तो उसी दिन ख़त्म हो गया,जिस दिन उन्होंने दूसरी औरत से रिश्ता जोड़ा और इस घर के बाहर पैर रखा। दहलीज़ के बंधन सिर्फ औरतों के लिए होते हैं क्या?” सामाजिक धरातल पर सौम्य प्रतिरोध देखना हो तो चित्रा मुद्गल की ‘बयान’ और चैतन्य त्रिवेदी की ‘जूते और कालीन’ प्रतिमानक रचनाएँ है। विस्तार के लिए मेरी पुस्तक ‘लघुकथा में प्रतिरोध की चेतना’ को देखा जा एकता है।

पंजाबी मिन्नी कहानी में स्त्रीजन्य प्रतिरोध बहुत कम मिलने के दो प्रत्यक्ष कारण हैं। एक तो इसमें महिला-लेखिकाओं का बहुत कम होना,और दूसरे पंजाब में स्त्री-समाज का कुछ बेहतर स्थिति में होना।

दलित सन्दर्भ

भारत का इतिहास एक तरह से कठोर जातिवाद का इतिहास रहा है। और दलितों के लिए तो भारत सदियों से खुला यातना-शिविर रहा है। इनकी स्थिति वास्तव में नीग्रो से भी बदतर ठीक ही कही गई है। दलित सन्दर्भों की हिंदी लघुकथाएँ मुख्य रूप से प्रतिरोध की संस्कृति की ही रचनाएँ हैं। वे सवाल खड़े करती हैं। हिंदी में रामकुमार घोटड़ ने ‘दलित समाज की लघुकथाएँ’(2008) पुस्तक सम्पादित की थी। इन लघुकथाओं में लेखकों की प्रतिबद्ध सोच रेखांकित होती है। पूरन सिंह की ‘प्रतिज्ञा’, ‘कुतर्क’ और ‘वचन’, सूरजपाल चौहान की ‘उद्धार’,मालती बसंत की ‘अदला-बदली’, बलराम की ‘बहू का सवाल’,विद्या लाल की ‘वर्ण व्यवस्था’ कृष्ण चन्द्र महादेविया की ‘प्रहार’ ऐसी कितनी ही प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। पंजाबी मिन्नी कहानी में दलित सन्दर्भ मुख्य रूप से चित्रण के रूप में है,या समझाइश के रूप में। इसके उदाहरण क्रमशः हरभजन खेमकरनी की ‘थिंदा घड़ा’(चित्रण के रूप में) और डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की ‘हिम्मत’(समझाइश के रूप में) देखे जा सकते हैं। हिंदी में अरुण कुमार की ‘गाली’ भी चित्रण के रूप में प्रभाव छोड़ जाती है। हरभजन खेमकरनी की ‘चिकना घड़ा’(थिंदा घड़ा) जातीय संकीर्णता को शिद्दत के साथ रेखांकित करती है। पीरों-फकीरों की धरती पंजाब लम्बे समय तक जात-पात के विरुद्ध आवाज़ उठाती रही है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। यहाँ भी जातिवाद का उभार हो चुका है। डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति की ‘हिम्मत’ मिन्नी कहानी में दलित लड़के का स्कूल में रहना तक मुश्किल कर दिया जाता है।

रिश्ते और पंजाब की संस्कृति

  पंजाब रिश्तों की गर्माहट से संचालित रहा है। किन्तु बदलते समय के साथ परिवारों में यहाँ भी कुछ स्तरों पर कृत्रिमता आ गई है। जमीन बेचकर विदेश जाने का रुझान पंजाब और हरियाणा में बढ़ता जा रहा है,जिससे रिश्तों में स्वार्थ और कृत्रिमता का रुझान बढ़ा है। मनुष्य का परिवार से अलगाव बढ़ा है।

 पंजाबी मिन्नी कहानी में रिश्तों की महक बरकरार है। वह परिवार,स्त्री-पुरुष सम्बन्ध,समाज – हर क्षेत्र में मौजूद है और ऐसी मिन्नी कहानियों में पंजाब की संस्कृति बोलती है। इनमें व्यक्त संबंधों का लगाव,खिंचाव,तड़प और बेचैनी पाठक को निरपेक्ष नहीं रहने देती और अपने साथ बहाकर ले जाती है। पंजाबी के सुप्रसिद्ध कहानीकार गुरबचन सिंह भुल्लर की मिन्नी कहानी ‘भांज’ को पढ़कर उसकी कहन-शैली का मुरीद हो जाना स्वाभाविक है। दलीप सिंह वासन की रचना ‘रिश्ते का नामकरण’ में उजाड़-से स्टेशन पर सांझ के समय बैठी नयी मास्टरनी कथावाचक के घर रुकती है। रात को –“मेरे विच मर्द जाग रिहा सी। पर उस विच वसदी औरत घूक सुत्ती पई सी।” अत्यंत स्वाभाविक और सटीक संवादों के क्रम में वह कहती है –अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपने उनींदे नहीं रहना था।” तब कथावाचक उसके सर पर हाथ फेर देता है। पंजाबी मिन्नी कहानी में रिश्तों का सौन्दर्य यथार्थ की खूबसूरत पगडंडियों से होकर परवान चढ़ता है। सुलक्खन मीत की मिन्नी कहानी ‘रिश्ता’ पंजाब की संस्कृति के उभार के कारण भुलाए नहीं भूलती। जंगीरा चोर एक गाँव में चोरी करने जाता है। मालकिन ने रौशनी की तो चोर अपने गाँव का निकला। पहचान के बाद उसे चाय पिलाई जाती है और वह भी भाई का फर्ज़ अदा करते हुए दस का नोट उसकी हथेली पर रख देता है। जब वह जाता है तो –“गाँव में अभी भी बिलकुल चुप्पी छाई थी। कहीं भी किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ नहीं आ रही थी।” कलात्मक सौन्दर्य इस मिन्नी कहानी के यथार्थ और पंजाब की संस्कृति को नयी ऊँचाइयों पर ले जाता है।

  अब ज़रा सामजिक धरातल पर रिश्तों की मिठास को महसूस कर लिया जाए। डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति की रचना ‘रिश्ता’ मानवीय धरातल की सुंदर रचना है,जो संकीर्ण सोच पर भी सौम्यता के साथ उँगली उठाती चलती है। लम्बे सफर की बस में एक यात्री अपने गाँव के नजदीक बस रोकने को कहता है। कंडक्टर को मनाने के लिए वह युक्तियाँ भिड़ाता है। कभी दोनों के ‘जट्ट’ होने का,तो कभी ‘सिख भरा’ होने का हवाला काम नहीं आता देख वह कह बैठता है –“इंसान ही इंसान की दवा होता है।” ड्राइवर उसे पूरे गौर से देखकर ब्रेक लगा देता है। कंडक्टर द्वारा क्रोधित होने पर ड्राइवर कहता है –“कोई बात नहीं,एक नया रिश्ता निकल आया था।” ऐसे लोग बिरले होते हैं,जिस कारण उसे गौर से देखने और ब्रेक लगाने को मजबूर होना पड़ा। यहीं जगदीश राय कुलरियाँ की मिन्नी कहानी ‘रिश्तों की नींव’ पर विचार कर लिया जाए। घर में मजदूर लड़के से भारी और बहुत महँगा शीशा उठाते हुए टूट जाता है। उसे घबराया देख सख्त स्वभाव का मालिक उसे पट्टी बाँधते हुए कहता है –“बेटा,चीज़ें तो फिर बन जाती हैं…इंसान जीवित रहने चाहिए।”

     इसके बरक्स हिंदी लघुकथा में परिवार और समाज –दोनों स्तरों पर रिश्तों की ऐसी जीवन्तता और गर्माहट कम ही मिलती है। निजी कंपनियों में नौकरी आदमी को सेल्स टारगेट,बोनस,मुनाफे और प्रमोशन की चक्की में पीसती रहती है,जिससे पारिवारिक जीवन नष्ट हो रहा है। मधु कांकरिया की कहानी ‘वे दस मिनट’ में पत्नी इसी घुटन के कारण आत्महत्या कर लेती है।

  किसान-जीवन के इर्द-गिर्द

इस घोर पूंजीवादी व्यवस्था में हमारा अन्नदाता किसान संकट के चौराहे पर लुटा-पिटा, अकेला और असहाय खड़ा है। सत्ता के वादों,बैंकों,बहुराष्ट्रीय कंपनियों,व्यापारियों और आढ़तियों ने मिलकर उसे निर्धन और कर्ज़दार बनाया।  

हिंदी साहित्य में कृषि-केन्द्रित यथार्थ से जुड़ा साहित्य निरंतर कम हो रहा है। यह एक तरह से रचना-जगत से भी किसान को विस्थापित करने जैसा है। हिंदी में केवल एक उपन्यास, संजीव का ‘फाँस’ ही किसानों की आत्महत्या पर लिखा गया है। लघुकथाओं की बात करें तो हिंदी में कम ही रचनाएँ ऐसी हैं,जो किसानी की पीड़ा को भी उकेरती हैं और उनमें कुछ कला-चेतना भी है। विषय की बहुआयामिता के साथ न्यूनतम कलात्मक सजगता का भी वहाँ  अभाव दिखाई देता है। डॉ.जितेन्द्र जीतू और डॉ.नीरज सुधांशु ने सम्पादित पुस्तक ‘लघुकथा में किसान’ नाम से हिंदी के साथ पंजाबी मिनी कहानियों को भी शामिल किया है।

शशिभूषण मिश्र की ‘एक और मौत’ रचना पाठक को खेत के बीचोबीच ले जाकर किसान के सामने खड़ा कर देती है और सघन चित्रण द्वारा किसान की चौतरफा पीड़ा को साकार कर देती है कि सुखनंदन क्यों मरा। बलराम की ‘माध्यम’ लघुकथा किसान के पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधुआ के रूप में शोषण,बेगार करने’ की जीवंत दास्तान है। किसानी से जुड़े श्रम-सौन्दर्य की एक लघुकथा देखनी हो तो प्रबोध कुमार गोविल की ‘पैरों पर खड़े श्रमिक’ को पढ़ना चाहिए। आज ‘मास्टर प्लान’(सुकेश साहनी) के नाम पर अनपढ़ किसानों को ठगा जा रहा है। ‘मंडी में रामदीन’(कमल चोपड़ा) की फसल के साथ लूट हमेशा होती आई है। कमलेश भारतीय की ‘किसान’ में भी यही दास्तान है। यहाँ कैलाश बनवासी की कहानी ‘बाज़ार में रामधन’ का स्मरण हो आता है,जिसमें नए समय में किसान के बैल फालतू हो गए हैं। गाँवों में बदलते मूल्यों के साथ अराजकता बढ़ रही है। खेती के सन्दर्भ में और समस्याएँ भी सामने आती हैं। खेमकरण सोमन की ‘अंतिम चारा’ में बारिश लेन के लिए स्त्रियों को नंगी होकर खेतों में हल चलाने को कहा जाता है,लेकिन वे इनकार कर देती हैं। चन्द्रेश कुमार छतलानी की ‘देशबंदी’ जैसी आदर्श रचनाएँ भी किसान के अन्नदाता रूप को उभारती हैं। असल सवाल यही है कि किसानों की सूनी आँखों के ‘ब्लैकहोल’ (सविता इंद्र गुप्ता) को कोई कब समझेगा?

 पंजाब कभी खेती और खेलों में पहले पायदान पर रहा,पर आज अनेक संकटों से जूझ रहा है। किसानी का संकट उनमें प्रमुख है। डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति और श्याम सुंदर अग्रवाल ने किसानी की पंजाबी मिन्नी कहानियाँ ‘मिट्टी दे जाए’ पुस्तक में संकलित की हैं। बलबीर परवाना की ‘किसान और उसकी बीवी’ संवेदना के कोमल तंतुओं से बुनी गई अत्यंत प्रभावशाली लघुकथा है। सुरिंदर कैले की ‘जिंदगी’ में किसान क़र्ज़ से,तो बेटा नशे से दुनिया से कूच कर जाता है। इनकी ही ‘सीरी’(साझीदार) लघुकथा में वर्ग-भेद और संवेदनहीनता से उपजी पीड़ा से साक्षात्कार कराया गया है। स्प्रे की दवा से साझीदार की मौत होने पर अपने बेटों से स्प्रे न कराने की सोच सामने आती है –“बेटे कौन-सा लाखों-हजारों में मिलते हैं।” सफाई करने वाली करमो का बेटा भी ऐसे ही मरा था। वह बोल उठती है –“जो मर गया,वह कौन-सा किसी माँ  का बेटा था,साझीदार ही तो था।”  कुलविंदर कौशल की ‘पुट्ठे दिमाग दा बंदा’ में किसान आन्दोलन से जुड़ने वाले बुज़ुर्ग की प्रतिबद्धता का प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

बदलता समाज और नयी राहें

निरंतर बदल रहे समय और समाज से  हिंदी और पंजाबी के लघुकथाकार अछूते नहीं रहे। अनवंत कौर की ‘क्या?’ में तनख्वाह पढ़ी-लिखी बहू के हाथ रखने का निर्णय नये समय में नया और निर्णायक फैसला है। समय बदलने के साथ कलम भी नए यथार्थ को व्यक्त करती है। कर्मजीत सिंह नडाला की ‘पराली का सेंक’ में चावल-मिलों में बॉयलर लगने से पराली ढोने वाले बेकार हो गए हैं। यह मिन्नी कहानी संतोख सिंह धीर की पंजाबी कहानी ‘कोई एक सवार’ तथा कैलाश बनवासी की हिंदी कहानी ‘बाजार में रामधन’ का स्मरण करा देती है,जिनमें क्रमशः तांगा और बैल बेकार हो गए हैं। जसबीर ढंड की ‘कन्धा’ में जश्न तो बेटा होने पर मनाया जाता है,लेकिन बाप के शव को कन्धा बेटियाँ देती हैं। हरभजन खेमकरनी की ‘खुरदीयाँ पैड़ा’ में सास के शव को दामाद अग्नि देता है। तर्क आता है कि ‘जवाई(दामाद) भी गोद लिए जैसा ही होता है।’ बड़ी उम्र में विवाह पर डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति की ‘दिन रात डा फर्क’ और निरंजन बोहा की ‘नवें दिसहदे’ में बदलते समय की आहट के साथ प्रतिरोध की दृढ़ता देखते ही बनती है। ये रचनाएँ बदलते समाज के साथ बदलती सोच को सामने लाती हैं। बाजारवाद पर डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति की मिन्नी कहानी ‘शार्पनर’ छीलने-टूटने के प्रतीक से अपनी बात कहती है।  नए समय में अनेक वर्जित विषयों पर भी कलम चलाई गई है। सुरिंदर कैले की ‘मानव ते कुदरत’ में सृष्टि में केवल  दो प्राणी भाई और बहन बचे रह गए हैं। तो सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए माँ  उन दोनों को छोड़कर चल देती है। मंगत कुलजिंद की ‘फ्रीज़’ में अंडाणुओं को लैब में फ्रीज़ करवाकर बाद में इस्तेमाल करने के फायदे और नुकसान दिखाए गए हैं। माँ  के शोषण और संवेदनहीनता को लेकर जहाँ विकेश निझावन की ‘आचार संहिता’ एक ऊँचाई को छूती लगती है, वहीं बलदेव सिंह खहरा की ‘मम्मी का डे-केयर सेंटर’ सरल पगडण्डी पर चलती है। खहरा की ही ‘पीढ़ी अंतर’ नयी पीढ़ी की संवेदनहीनता को बहुत कम लफ्जों में चित्रित कर देती है। बुज़ुर्ग जीवन पर करीब एक दशक से हिंदी-पंजाबी दोनों भाषाओं में लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं,जो इस सन्दर्भ में संवेदनहीन होते जा रहे समाज और जंग लगते संबंधों पर प्रकाश डालती हैं। हिंदी में कमल चोपड़ा की ‘इतनी दूर’ और पंजाबी में प्रदीप कौड़ा की ‘बीस का नोट’ और श्याम सुंदर अग्रवाल की ‘टूटी हुई ट्रे’ जैसी अनेक प्रतिनिधि मिन्नी कहानियों का इस सन्दर्भ में उल्लेख किया जा सकता है। डॉ.श्याम सुंदर दीप्ति द्वारा बुज़ुर्ग जीवन पर पंजाबी और हिंदी के मिन्नी कहानीकारों की रचनाओं का संग्रह ‘पिछले पहरे’ निकालकर लेखकों का ध्यान इस समस्या की तरफ खींचा गया है। हिन्दी में इस तरह की किताब आनी अभी बाकी है।

हिंदी लघुकथा में बदलते यथार्थ को लघुकथा में रूपांतरित करने के प्रयास निरंतर हुए हैं। इनकी लम्बी सूची है,जिसके लिए यहाँ अवकाश नहीं है। महेश दर्पण की ‘जीवित मृत’ और अशोक भाटिया की ‘विलीन’ लघुकथाओं में दर्शाया गया है कि मोबाइल का प्रयोग संबंधों पर किस कदर भारी पड़ रहा है। रोबोट को लेकर विविधयामी लघुकथाएँ मिलती हैं। आने वाले समय में इस ए.आई.(कृत्रिम मेधा) के बढ़ते उपयोग से कई लोग फालतू हो जाएँगे। महेश दर्पण की ही ‘रोबोट’ में अखबार का मालिक  रोबोट से असहज महसूस करके उसकी प्रोग्रामिंग ठीक कराने का उपक्रम करता है। आनंद हर्षुल की ‘पहरे पर संतरी’ में रोबोट की भावहीनता और तयशुदा काम करने की सीमाओं का सजग कलात्मक चित्रण हुआ है। आनंद की ‘भूमंडलीकरण’ सहज ही करमजीत सिंह नडाला की ‘पराली का सेंक’ रचना की याद दिला देती है।

विषय-केन्द्रित लघुकथाओं के संकलनों के रूप में सुकेश साहनी द्वारा सम्पादित ये संग्रह लघुकथा के विषय वैविध्य की पुष्टि करने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं-स्त्री-पुरुष सम्ब्न्धों की लघुकथाएँ (1992 दूसरा परिवर्धित संस्करण-2018 ), महानगर की लघुकथाएँ 1993 दूसरा परिवर्धित संस्करण-2019 )और देह  व्यापार की लघुकथाएँ ( 1994) प्रमुख हैं।  लघुकथा डॉट कॉम के कॉलम  मेरी पसन्द से ‘मेरी पसन्द’ (सं. सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’) के 2011 से 2024 तक पाँच खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं।

यहाँ बाल -मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ(सं. सुकेश साहनी,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’-जनवरी 2013) और  ‘लघुकथाएँ :जीवन-मूल्यों की’(सं. सुकेश साहनी,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’-2009) पुस्तक का उल्लेख करना जरूरी है। बाल -मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ लघुकथा डॉट कॉम के नवम्बर विशेषंक का पुस्तक रूप है, जिसके दो संस्करण हो चुके हैं। ‘लघुकथाएँ :जीवन-मूल्यों की’ हिंदी और पंजाबी से चयनित ये लघुकथाएँ कहीं मानवीय धरातल को उभारती हैं,तो कहीं दिशा दिखाती हैं। मानवीय  मूल्यों पर आधारित इन लघुकथाओं में पाठक की संवेदना को समृद्ध करने, तो कहीं चेतना के द्वार पर दस्तक देने की सामर्थ्य है। Beyond Semblances: English Renderings of Hindi Laghukathas’ (2021) अंग्रेजी (कुँवर दिनेश सिंह), -लघुकथा डॉट कॉमः भाषान्तरः गढ़वाली अनुवाद-डॉ कविता भट्ट2024, अदहने क आखर (छोटकथा -संकलन -अवधी)-सम्पादक सविता मिश्र ‘अक्षजा’संस्करणः 2024,अवधी (सविता मिश्र) में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।

अनुवाद-कार्य        

पंजाबी मिन्नी कहानी के क्षेत्र में हिंदी और विभिन्न विदेशी भाषाओं की लघुकथाओं की निरंतर प्रस्तुति होती रही है। विभिन्न विषयों पर डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति और श्याम सुंदर अग्रवाल द्वारा ‘मेहमान मिन्नी कहानियाँ’, ‘विदेशी मिन्नी कहानियाँ’, ‘मर्द दी माँ ’ आदि अनेक अनूदित पुस्तकें पंजाबी साहित्य को दीं। सम्पादित मिन्नी कहानियों की पुस्तकों में हिंदी लघुकथाओं को हमेशा साथ रखा गया। हर वर्ष सालाना सम्मेलन में किसी विषय पर केन्द्रित ‘मिन्नी’ के विशेषांक के साथ उसकी पुस्तक निकालने की एक परम्परा-सी बन गई थी।  स्वतन्त्र रूप से श्याम सुंदर दीप्ति और श्याम सुंदर अग्रवाल ने हिन्दी में भी पंजबी की अनूदित लघुकथा-संग्रह प्रस्तुत किए, जिनमें पंजाबी लघुकथाएँ 1994,  बीसवीं सदीःपंजाबी लघुकथाएँ जनवरी 2005 प्रमुख हैं। हिंदी में सम्पादित लघुकथा-पुस्तकों में पंजाबी मिन्नी कहानी को अभी अपेक्षित स्थान नहीं मिला; हालाँकि पंजाबी की मिन्नी कहानियाँ अलग से हिंदी में अनूदित रूप में सहज उपलब्ध हैं।

इन दोनों के बाद अनुवाद का काम अब ‘लघुकथा कलश’ के संपादक योगराज प्रभाकर ने और जगदीश राय कुलरियाँ ने सम्हाल लिया है। योगराज तो पंजाबी-हिंदी दोनों के बीच आवाजाही करते हुए इस विधा के मजबूत पुल बन चुके हैं, जिन्होंने 2019 से अब तक मिन्नी कहानी/लघुकथा की एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का अनुवाद कर स्वयं प्रकाशित भी किया है।

हिंदी के व्यापक पासार को देखते हुए इसमें दूसरी भाषाओं से लघुकथा के अनुवाद-कार्य कम ही हुए हैं। पंजाबी से सुभाष नीरव ने ‘प्रयास’ नामक चक्रमुद्रित पत्रिका का पंजाबी लघुकथा अंक 1988 में निकाला था।  1990 में ‘श्रेष्ठ पंजाबी लघुकथाएँ’ नाम से मेरी अनूदित-सम्पादित पुस्तक आई। इनके अतिरिक्त 1994 में पंजाबी लघुकथाएँ,  2005 में ‘बीसवीं सदीःपंजाबी लघुकथाएँ- दोनों के सम्पादकः डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति और श्याम सुन्दर अग्रवाल  और  पंजाबी लघुकथाएँ अनेक सम्पादित पुस्तकों में पंजाबी सहित देश-विदेश की अनूदित लघुकथाएँ भी शामिल की गई हैं। इनमें  ‘लघुकथा:देश-देशांतर’ (2013,सुकेश साहनी-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु‘)और ‘देश-विदेश से कथाएँ’(2017,अशोक भाटिया) सजग चयन के कारण विशेष उल्लेखनीय हैं। लघुकथा डॉट कॉम भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ अंग्रेज़ी  अनुवाद भाषान्तर के अन्तर्गत निरन्तर प्रकाशित कर रहे हैं, जिनमें पंजाबी प्रमुख है।

   हिंदी-पंजाबी से इतर,अन्य भाषाओं की लघुकथाओं के कुछ उदाहरण देना यहाँ समीचीन होगा। उर्दू अफ़सांचे(लघुकथाएँ) लिखने में मंटो का कोई सानी नहीं है। ‘सियाह हाशिए’ के अलावा उनके 23 और अफ़सांचे मिलते हैं। भारत-पाक विभाजन की त्रासदी और उससे सम्बद्ध अन्य विषयों को बहुत छोटे आकार में,वस्तुपरक दृष्टि और व्यंग्य की तीखी मार से व्यक्त करती ये रचनाएँ साहित्य की थाती बन गई हैं। ‘करामात’ रचना अन्धविश्वास के रोग का खुलासा करती है। लूट का माल बरामद करने के लिए पुलिस के छापे पड़ते हैं,एक आदमी शक्कर की बोरी कुँए में डालते हुए खुद भी साथ चला गया। उसे निकला तो वह मर गया। अगले कुँए से पानी निकाला गया तो वह मीठा था –“उसी रात से उस आदमी की कब्र पर दिए जल रहे हैं।” यह लोगों की मानसिकता में पैठे धर्म-रोग का सटीक उदाहरण है। बहुत कम शब्दों में, ठोस रूप में सहज ढंग से बात कहने की मंटो की कला समूची भारतीय लघुकथा-परम्परा में निराली है।

  वरिष्ठ गुजराती कथाकार मोहनलाल पटेल की ‘विदाई’ लघुकथा समाँ तर शैली में कई सवाल खड़े करती है। भैंस को बेचने के बाद वह एक नहीं, तीन बार वापिस बचपन के बाड़े में लौट आती है। कुंवर उसकी पीठ पर हाथ फिराकर, रोतेरोते हुए कहती है –“एक ढोर की आवभगत कर रहे हैं ,उतनी बेटी के लिए नहीं कर सके। आश्रय की मारी वह तीन बार घर छोड़कर आई थी, लेकिन हमने ही उसे डरा-धमका के वापिस भेज दिया।”

 गनपत का संवाद रचना का केन्द्रीय वाक्य है –“हत्यारे तो हम हैं कुंवर! ‘ससुराल ही उसका घर’ कहकर घर आई बेटी को अन्दर न आने दिया।” रचना सवाल उठती है कि क्या प्राणपण से पाली बेटियों का मायके पर कोई हक नहीं? और क्या ‘कन्यादान’ शब्द इस सन्दर्भ में उचित भी है? दान तो वस्तुओं और पशुओं का किया जाता है,इंसानों का नहीं। और फिर दान की गई वस्तु पर दानदाता का कोई अधिकार नहीं रह जाता। इस भावप्रधान लघुकथा के पीछे चिंतन की लम्बी प्रक्रिया मौजूद है।

  तीसरी लघुकथा तेलुगु लेखक कान्ड्रेगुल श्रीनिवास राव की ‘स्पर्श’ है। लॉरी में सफर कर रहे शेषगिरी की कमजोरी है- स्त्री-सौन्दर्य को आँखों से पी जाना। साथ की सीट पर युवती के बैठते ही उसकी यह कमजोरी उभर आती है। लेकिन लॉरी की टक्कर होने पर घायल शेषगिरी का सिर वह युवती अपनी गोद में रख, उसके माथे का खून साफ करके उसके घाव को हथेली से दबा देती है। कोमल स्पर्श पाकर वह आँखें खोलता है। रचना की अंतिम और केन्द्रीय पंक्तियाँ हैं –“माँ की छाती पर सिर रखकर थकान मिटाने जैसा सुख उसने महसूस किया और बालकों-जैसी दृष्टि से आभारपूर्वक उसे निहारते हुए सहसा अचेत हो गया।” स्त्रियोचित संवेदना की इस प्रकार सधे हुए ढंग से अभिव्यक्ति पाठक को सोचने और महसूस करने की नयी जमीन दे जाती है।

 निष्कर्ष

पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथा को आमने-सामने रखकर कुछ नतीजों पर पहुँचा जा सकता है।

पंजाबी में मिन्नी कहानी का सहज आन्दोलन अधिक सुगठित और केन्द्रित है। मिन्नी कहानी पर केन्द्रित पत्रिका ‘मिन्नी’ के अब तक 140 अंक आ चुके हैं और ‘अणु’ में लगभग पचास वर्षों से निरंतर मिन्नी कहानियाँ छप रही हैं। हिंदी में कभी विक्रम सोनी के सम्पादन में ‘लघु आघात’(त्रैमासिक) 1981 से 1989 तक निकलता रहा। अब हालाँकि लघुकथा डॉट कॉम ई-मासिक सन 2000 से निकल रहा है। प्रिंट में अब एकमात्र पत्रिका ‘लघुकथा कलश’(अर्धवार्षिक) ही योगराज के सम्पादन में नियमित रूप से निकल रही है।  पंजाबी मिन्नी कहानी मंच जैसी सरगर्मियाँ हिंदी में गायब हैं। यह मंच 1990 से ही पंजाबी-हिंदी को संयुक्त रूप से साथ लेकर चला है, चाहे वे रचनाएँ हों या सम्मेलन हों।

    यदि एक पुस्तक में पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथाओं के सम्पूर्ण दृश्य की झलक पानी हो, तो क्रमशः डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति द्वारा सम्पादित ‘मिसाली मिन्नी कहानियाँ’ और अशोक भाटिया द्वारा सम्पादित ‘निर्वाचित लघुकथाएँ’ पुस्तकें ध्यान खींचती हैं। पंजाबी मिन्नी कहानी का काल-क्रम से अध्ययन करना हो तो सुरिंदर कैले द्वारा सम्पादित ‘अणु कहाणीयाँ’2013) इसका रचनात्मक इतिहास प्रस्तुत करती हैं। ‘अणु’ में प्रकाशित मिन्नी कहानियों से चयन करके इस पुस्तक में दशकवार विभाजित कर, टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किया गया है। हिंदी में ऐसी पुस्तक आनी अभी बाकी है।

किसान जीवन और नशे पर पंजाबी मिन्नी कहानी में पर्याप्त साहित्य मिलता है। ये दोनों पंजाब के ज्वलंत विषय हैं। आदिवासी समाज, विकलांग समाज, किन्नर समाज पर दोनों भाषाओं की लघुकथाओं में न के बराबर लिखा गया है।

वर्तमान में जो आक्रामक धर्मान्धता का माहौल बना दिया गया है, उस पर पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथा – दोनों में बहुत कम लिखा गया है। राजनीतिक धरातल की परिपक्व लघुकथाएँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। साम्प्रदायिकता का क्षेत्र भी कमोबेश ऐसा ही है। इन पर लेखकों की चुप्पी उनसे भी खतरनाक है,जो सत्ता से लाभ उठाने के लिए पाला बदल चुके हैं। सत्ता और धर्म का गठजोड़, लोकतंत्र की परत के नीचे छिपी तानाशाही पर बहुत कम लिखा जा रहा है। पूँजीवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सत्ता के साथ गठजोड़ और उसके विनाशकारी परिणामों पर भी दोनों भाषाओं में न के बराबर लघुकथाएँ लिखी गई हैं। अन्धविश्वास को लेकर दोनों भाषाओं में बहुत कम लघुकथाएँ मिलती हैं। जो हैं भी, उनमें भी बहुत कम में अपेक्षित प्रखरता और मारकता के दर्शन होते हैं। इसका कारण हमारे लेखकों की ऐसी सोच न होना और इनके खिलाफ कोई तड़प और बेचैनी का न होना ही है। कई जगह तो लेखक ही सांप्रदायिक सोच को आगे बढ़ाने का कलात्मक अपराध कर गर्वित हो रहे हैं। अन्धविश्वास सहित अनेक विसंगतियों के खिलाफ डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति की पुस्तक ‘तर्क दे खंभ’(तर्क के पंख) जैसी पुस्तक हिंदी में उपलब्ध नहीं है।

यथार्थ यथातथ्यता का पर्याय नहीं होता। इसीलिए लेखक कई बार रचनात्मक कल्पना के साथ शैल्पिक युक्तियों का प्रयोग कर यथार्थ की गहन परतों को उभारता है। लघुकथा में प्रयोगों का उद्देश्य रचना को अपने कथ्य को सटीक रूप में पाठक तक पहुंचाना, अर्थगर्भी बनाना है, ताकि वामन में विराट के दर्शन हो सकें। हिंदी में ऐसे प्रयोगों की लम्बी सूची है। ‘अणुरूप’ के जून 1987 में छपी अवधनारायण सिंह की हिंदी लघुकथा के अनुवाद ‘मुखौटे’ में चार मुखौटे उन्हें पहनने वालों की दो-दो परस्पर विरोधी खूबियाँ बताते हैं –स्मगलर और देश-भक्त,संत और रंडीबाज, हत्यारा और डॉक्टर, लाल और नेता। पंजाबी में प्रयोगात्मक मिन्नी कहानियाँ बहुत कम मिलती हैं। इनके पीछे प्रयोग की जरूरत महसूस न होना, यथार्थ को व्यक्त करने के लिए तयशुदा ढांचे-सांचे तक सीमित रहना, लघुकथा/मिन्नी कहानी के कहानी बन जाने का खतरा महसूस करना आदि कारण हो सकते हैं। यह सोच यथार्थ के बहुत से अनभिव्यक्त भाग तक पहुँच नहीं पाती। हिंदी में प्रयोगों के अनेक बेहतर उदाहरण मिलते हैं। हिंदी लघुकथा में इधर ‘कला, कला के लिए’ की तर्ज़ पर ‘प्रयोग के लिए प्रयोग’ की बाढ़-सी आ गई है, जो वस्तु के दबाव की अपेक्षा प्रयोग को ही साध्य मानकर लिखी जा रही हैं। इस फैशन में पूरी-पूरी पुस्तकें आने लगी हैं, जो लघुकथा में ‘प्रयोगवाद’ के खतरे की दस्तक हैं। पंजाबी मिन्नी कहानी में प्रयोग ही बहुत कम हुए हैं।   

 दोनों भाषाओं की लघुकथाओं में व्यक्ति पर और संबंधों पर कलम अधिक चलाई जा रही है,मुद्दों पर कम लिखा जा रहा है। दोनों भाषाओं की लघुकथाएँ यथार्थ के बाहरी आवरण तक अधिक सिमटी हुई हैं; उसे भेदकर नया आलोक रचने का उपक्रम बहुत कम देखने में आ रहा है।

बड़ा लेखक अपनी दृष्टि और परिप्रेक्ष्य की स्पष्टता, संवेदना और कलात्मक प्रौढ़ता के कारण अपनी रचनाओं में समय के सच को रचने में समर्थ होता है। इस दृष्टि से पंजाबी में गुरबचन सिंह भुल्लर की ‘भांज’, वरियाम सिंह की ‘काली धूप’ जैसी मिन्नी कहानियों और हिंदी में हरिशंकर परसाई की ‘जाति’, चित्रा मुद्गल की ‘गरीब की माँ’ और ‘मिट्टी’, रमेशरमेश बत्तरा की ‘बीच बाज़ार’ और रवीन्द्र वर्मा की ‘कोई अकेला नहीं है’ जैसी लघुकथाओं से प्रेरणा लेने की जरूरत है। अभी दोनों भाषाओं की लघुकथाओं में कल्पना,व्यंग्य,काव्य आदि के तत्त्वों का अविरल प्रयोग होना बाकी है। जैसे, चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा ‘धर्म-पुस्तक’ वास्तव में एक धर्म-पुस्तक का काम करती है। ऐसी रचनाओं से ही हिंदी और पंजाबी का लघुकथा-संसार समृद्ध होगा।

 पंजाबी मिन्नी कहानी की भाषा में स्थानीयता की रंगत उसे पाठकों से अधिक जोडती है। मालवा,दोआबा  और माह्जा की शब्दावली उसे अपने अंचल से जोड़े रखती है। हिंदी लघुकथा में ऐसी रंगत बहुत कम मिलती है।

कुल मिलाकर पंजाबी मिन्नी कहानी और हिंदी लघुकथा अपने समय के विविध आयामों को एक सीमा तक व्यक्त करने में सफल रही हैं; लेकिन न्यूनतम कलात्मक जरूरत की दृष्टि से देखें, तो प्रकाशन के अनुपात में बहुत कम रचनाएँ ऐसी मिलेंगी, जो साहित्य में अपना स्थान बनाए रख सकें। इस लेख में अधिक विस्तार- भय  के कारण बहुत कुछ समाविष्ट नहीं हो सका, जिसका उल्लेख आगामी लेखों में करने का प्रयास रहेगा। (22-12-24 को पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना में प्रस्तुत)       

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