भैया-भाभी और चीनू के आ जाने से ही घर भरा-भरा लगने लगा है। बहुत दिनों बाद आए हैं…लगभग कुसुम की शादी के बाद। अम्मा और पिताजी खुश हुए कि चलो, बड़ा आया तो सही-भले ही अम्मा की बीमारी की तार पहुँचने पर।
खाना खाते-खाते एकाएक चीनू की फ्रॉक पर दाल गिर जाती है। भैया डाँटते हैं, ‘‘चीनू, इतनी बड़ी हो गई हो…ढंग से खाना भी नहीं खा सकती हो!’’
‘‘सॉरी पापा…’’ चीनू कहती है, फिर खाने लग जाती है।
‘‘क्यों डाँट रहा है उसे! बच्ची ही तो है अभी।’’ अम्मा बीमार पड़ी, खाट पर लेटे-लेटे स्नेहिल स्वर में कहती हैं।
भैया क्षण भर अम्मा को देखते हैं।
‘‘कुसुम कब से नहीं आई?’’ थोड़ी देर बाद भैया ने पूछा।
‘‘साल भर से ऊपर हो गया। ससुराल वाले भेजना ही नहीं चाहते उसे।’’अम्मा खाट पर ही उठकर बैठ गई।
‘‘क्यों?’’ भैया ने पूछा।
‘‘पता नहीं क्यो?’’ अम्मा थोड़ी देर के लिए रुकती हैं, ‘‘एक बार कुसुम की चिट्ठी आई थी। उसने लिखा था कि दमाद कह रहे थे कि हमारे खूँटे से एक गाय भर ही बाँध दी है।’’ कहते-कहते अम्मा का स्वर भर्रा जाता है। उन्हें कुसुम की याद आ जाती है और जब-जब उन्हें कुसुम की याद आती है, तब-तब वे रोने लगती हैं। इस घर की इकलौती बेटी जो थी।
‘‘और क्या-क्या करें…जितनी हमारी हैसियत थी, उससे ज्यादा ही किया षादी में….अभी तक उसी खर्च को पूरा कर पाया मैं।’’
‘‘यही तो तेरा अहसान है बेटा हमारे ऊपर। अम्मा का स्वर गिड़गिड़ाहट से भरा था।
मैं भीतर-ही-भीतर सुलग उठता हूँ..पता नहीं क्यों?….पता नहीं किसके ऊपर?’’…
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