शहर से दो किलोमीटर की दूरी पर वह पान की दुकान है, जहाँ दिन रात हुजूम लगा रहता है। वैसा पान शहर भर में कहीं नहीं मिलता। पान बनाने वाले के हाथ में पता नहीं कौन सा हुनर है कि दूर दूर से लोग उसकी दुकान पर सिर्फ पान खाने चले आते हैं। अनेक पान प्रेमी तो रात के नौ दस बजे भी वहाँ पहुंच जाते हैं।
चोपड़ा जी अपनी पत्नी के साथ किसी समारोह से लौट रहे थे। अचानक पान खाने की इच्छा प्रबल हो उठी ।गाड़ी को उस रास्ते पर मोड़ लिया। पत्नी ने हैरानी से पूछा –” इधर कहाँ चल रहे हैं ?”
“पान खाने । आज तुमको ऐसा पान खिलाता हूँ जैसा तुमने जिंदगी में कभी नहीं खाया होगा।” पत्नी चुप लगा गई।
पान की दुकान के सामने चोपड़ा जी ने गाड़ी रोकी और पान लेने चले गए । पत्नी गाड़ी के भीतर बैठी थी ।तभी दो छोटे बच्चे हाथों में मोगरे के फूलों के गजरे लिए आए—” आंटी ले लो ना सिर्फ दस रुपये में दो गजरे….” उनकी आँखों में याचना और मजबूरी के भाव देख पत्नी ने दो गजरे खरीद वहीं सीट पर रख दिए। चोपड़ा जी ने पत्नी के हाथ में कागज में लिपटा पान रखा और सीट पर बैठ गए। तभी गजरों पर नजर गई — “यह क्या है ? कितने के हैं ? क्यों लिये ?” पत्नी ने बताया गरीब बच्चे बार-बार आग्रह कर रहे थे। चोपड़ा जी दहाड़ उठे- “तुमने दान का ठेका उठा रखा है क्या ? पैसे कितने परिश्रम से कमाए जाते हैं, तुम्हें कुछ पता है ? इतने रद्दी फूलों पर दस रुपये बर्बाद कर दिए।”
पत्नी स्तब्ध रह गई। दस- दस रुपये का एक पान, दो तीन किलोमीटर का उल्टा चक्कर लगाकर पान की दुकान पर आना, रास्ते में दो सांध्य अखबार खरीदना, गुटके के पैकेट, सिगरेट…. क्या इन सब की तुलना में फूलों के दो गजरे खरीदना जुर्म या ज्यादती है ? पान खाने का उसका सारा उत्साह खत्म हो गया था।