मोहल्ले में दस-साढ़े दस बजते ही सन्नाटा पाँव पसारने को आतुर हो उठता था| परन्तु मैं ठहरी उल्लू बिरादरी की। रात के ग्यारह-बारह बज रहे थे। मजदूरी करके लौटते चप्पलों की आवाजें, तो कभी-कभार कार-बाइक की साँय-साँय का शोर सड़क पर पसरे नीरवता को रह-रहकर भंग कर देता था। उन आवाजों को सुनकर लगता कि कोई तो है जो मेरे साथ जाग रहा है।
अभी कुछ दिन पहले मोहल्ले में एक स्त्री की चीखती हुई आवाज सन्नाटे को चीरती हुई कहीं शून्य में गुम हो गयी थी। यदि वातावरण में कुछ बचा था, तो वे थीं उसकी सिसकियाँ। मेरी सोच के तार अब तक उस दिन की घटना से तारतम्य नहीं बैठा पाये थे| क्यों- किसके घर से आई थी वह आवाज, सोच ही रही थी कि आज फिर चीख-चिल्लाहट की आवाज कान से आ टकराई। न चाहते हुए भी मैं बालकनी में खड़ी होकर उस आवाज का पीछा करने लगी।
मैंने देखा कि सड़क के दाहिने छोर पर चिकचिक के बीच पति ने पत्नी के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया था, जो लगभग चार साल के बच्चे का हाथ पकड़े उसके पीछे चल रही थी।
“महिलाओं की स्थिति न कल बदली थी, न ही आज बदली है।” बरबस ही मेरे मुँह से निकला। मैं दुखी होकर कमरे में जाने वाली थी कि चटाक की आवाज फिर से आई।
”आह! सहना तो हम स्त्रियों की नियति है!” कहते हुए मैंने पलटकर देखा| पत्नी बच्चे से हाथ छुड़ाकर पति के गाल पर तमाचे जड़ती जा रही थी। “चटाक…! चटाक…!”
“अहा! तू तो शेरनी निकली। हम मध्यमवर्ग की स्त्रियाँ तो इतनी हिम्मत जुटा ही नहीं पाईं!” मायूसी के बीच मेरे चेहरे पर अनायास ही खुशी बिखर गई।”
मैंने देखा, अब पति, बच्चे का हाथ पकड़ सिर झुकाए सड़क पर चप्पल घिसटते हुए बढ़ा जा रहा था। बड़बड़ाती हुई उसकी पत्नी ऐंठ में उसके बराबर से चली जा रही थी।