जून 2026

देशपेंशन     Posted: March 1, 2023

“अम्मा तुम भी ना.. कर दी ना देर. तुम्हें तो समझाना बेकार है. एक दिन घंटी नहीं डोलाती, तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता.. जानती हो ना बैंक में कितनी लंबी लाइन लगी रहती है, तो भी बैठ गई भोग लगाने।”

       माँ तो बस दम साधे निर्विकार भाव से बैंक की सीढ़ियों पर एक हाथ को रेलिंग के सहारे और दूसरे हाथ को अपनी छोटी-सी लाठी का सहारा देती हुई अपने को ऊपर की ओर ढकेलती हुई किसी तरह चढ़ी जा रही थी।

     कई बार सिर उठाकर ऊपर बड़ी उम्मीद से बेटे को देखती। शायद चार कदम पीछे उतरकर उसे पकड़ ले; लेकिन वह जानती थी, हर बार की तरह आज भी यह उम्मीद करना बेकार है।

       सचमुच आज बैंक में बहुत भीड़ थी। सोमवार का दिन था और कई दिनों के बाद बैंक खुला था, तो भीड़ होना जायज़ भी था।

       घंटों लाइन में खड़े होने के बाद रुपये मिले। माँ उन रुपयों को जीभर देख लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाई।

     संज्ञा-शून्य- सी न जाने वह कब तक खड़ी रहती। बेटे की बातों ने जैसे उसे नींद से जगाया-  “ये बीस रुपये रख लो माँ। बस पकड़ लेना। इधर- उधर मत चली जाना,कथा,कहानी बतियाने। कंडक्टर से बोल देना ,अच्छे से चढ़ा देगा और उतार भी देगा। दस रुपये से ज्यादा भाड़ा मत दे देना पिछली बार की तरह और दस रुपये के बताशे ले लेना पोते के लिए। पैसे गिरा मत देना। तुम तो एकदम से सठिया ही गई हो।”

     माँ समझ गई थी हर बार की तरह,आज भी उसकी पेंशन से बहू और बच्चों की फ़रमाइशें पूरी होंगी!

उसके घिसटते हुए पैर बस स्टैंड की ओर बढ़े जा रहे थे।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine