लंच का समय होने जा रहा था। एक-एक कर सभी अपना-अपना काम छोड़कर खड़े हो गए। हॉलनुमा कमरे के दायीं ओर खिड़की के पास हीटर पर सबके लंच बॉक्स रखे थे। सब उस तरफ़ ही बढ़ रहे थे। वे सब एक खाली टेबल के गिर्द खड़े होकर एक साथ लंच किया करते थे।
“अरे राकेश, अब छोड़ भी काम… खाना ठंडा हो रहा है।” सहकर्मी चड्ढ़ा ने ऊँची आवाज़ में कहा।
“अरे यार, आ भी जा… बहुत ज़ोर की भूख लगी है।” गुप्ता अपना टिफिन खोलता हुआ बोला।
“तुम लोग शुरू करो, मैं बाद में कर लूँगा।” राकेश ने अपनी सीट पर बैठे-बैठे कहा।
“अब आ भी जा पेट में चूहे कूद रहे हैं।” कुलकर्णी ने खीझते हुए कहा।
“मैं इस फाइल को निपटा लूँ जो बहुत ज़रूरी है।” फाइल में गड़े राकेश का उत्तर था।
उसके सामने खुली फाइल दफ्तर के चपरासी हरिदत्त की थी जो पिछले बीस दिनों से अस्पताल के बैड पर पड़ा था। एक शाम दफ्तर से घर लौटते समय भीषण सड़क दर्घटना का शिकार हो गया था। घर में उसके बूढे माता-पिता थे, पत्नी थी और दो छोटे-छोटे बच्चे। राकेश दफ्तर के कुछ लोगों के साथ उससे मिलने गया था। कुछ पैसे भी इकट्ठा करके राकेश ने उसको दिए थे। आज सुबह हरिदत्त ने किसी के हाथ फंड से कुछ पैसा निकलवाने की दरख्वास्त भिजवाई थी।
“ऐसा भी क्या है यार?” चड्ढा खीझा।
“आज तीन बजे तक यह फाइल कैश अनुभाग में भिजवानी ज़रूरी है।” राकेश ने फाइल का काम पूरा कर उठते हुए कहा।
“एक दिन लेट हो जाएगी तो कौन-सा पहाड़ टूट जाएगा?” कुलकर्णी ने मुँह में बुरकी डालते हुए कहा। राकेश ने एक बार अपने सहकर्मियों की ओर देखा। फिर फाइल उठा साहब के केबिन की ओर उनके दस्तखत के लिए बढ़ते हुए बुट्बुदाया, “तुम अकेले अपने एक पेट की सोच रहे हो, मुझे पाँच पेटों की चिंता है!”
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