गढ़वाली अनुवाद:डॉ. कविता भट्ट
आवा जजमान, कैकि अस्थि लाईं छन ? औण वळा कि जेब पर नजर डाळि क भौत दया जन्नि आवाज माँ मिट्ठि गिची करिक पंडा न बोलि।
पिताजी की ! जजमान न बोलि ।
अरे–अरे कबारि. . . कथगा बरसू का छा वु ? पीकदान म शोक पछतौ उगळी क पंडा न बोली ।
एक सौ द्वी बरसा का छा । वेन गर्व से बोलि ।
‘भौत भग्यान छैं भुला। तब त खुलिक दान कर।’ पंडा न वे तैं ज्ञान द्याई।
अस्थि- बगौंण से पैलि इक्कीस बानी का दान कन्न कु वचन यजमान मन लीक पंडा न आधा घंटा म यु काम निबटै द्याई। कुछ झिक झिक क बाद बि जजमान तैं ग्यारह सौ रुप्या दान–दक्षिणा क देण ही पड़िन । जजमान वेका जाळ से मुक्त होणौं तैं छटपटाण लगी ग्याई।
‘बही म नौं नी लिखौण क्य, त भोळ कु माँणलु कि तुम यख अपड़ा पिता जी की अस्थि लेक ऐ छा?’ पंडा न वे तैं आखिरी पटकनी दे ।
वु घबरै गे । जान्दु–जान्दु पंडा तैं एक सौ रुप्या बही म नौं लिखौंण क वे तैं हौर देण पड़ेन।
जजमानै की जेब म अब जयपुर क नजदीक अपड़ा गौं लौटण कु किराया मात्र बच्यूँ छौ। वु हरिद्वार बिटि दिल्ली पौंछि । जयपुरै की बस म बैठण से पैलि एक कप चाय पेणै की वेकी इच्छा ह्वे । जेब सँभाळि त पैसा गैब ।
जजमान की दु:खी आत्मा यु सोचदि ही रै गी कि असल म वेकी जेब कख कटे? दिल्ली म य फिर हरिद्वार म।
-0-