आइए यजमान, किसकी अस्थियाँ लाए हैं ? नजरें आगंतुक की जेब पर डालते हुए करुणामिश्रित मीठी जुबान में पंडा बोला ।
पिताश्री की ! यजमान ने कहा ।
अरे–अरे कब . . . कै बरस के थे वे ? पीकदान में शोक संवेदनाएँ उगलते हुए पंडा बोला ।
एक सौ दो बरस के । उसने गर्व से कहा ।
‘बड़े भाग्यवान हो भैया । फिर तो खुलकर दान करो।’ पंडे ने उसे ज्ञान दिया।
अस्थि- प्रवाह से पूर्व इक्कीस प्रकार के दान करने का वचन यजमान से लेकर पंडे ने आधे घंटे में उक्त कार्य को निबटा दिया। कुछ हील–हुज्जत के बाद भी यजमान को ग्यारह सौ रुपये उसे दान–दक्षिणा के देने ही पड़े । यजमान उसके चंगुल से मुक्त होने को छटपटाने लगा ।
‘बही में नाम लिखाई नहीं कराओगे ,तो कल कौन मानेगा कि तुम यहाँ पिता श्री की अस्थियाँ लेकर आये थे?’ ।पंडे ने उसे आखिरी पटकनी मारी ।
वह घबरा गया । जाते–जाते पंडे को एक सौ रुपये बही में नाम लिखाई के उसे और देने पड़े।
यजमान की जेब में अब जयपुर के निकट अपने गांव लौटने का भाड़ा मात्र बचा था । वह हरिद्वार से दिल्ली पहुंचा । जयपुर की बस में बैठने से पूर्व एक कप चाय पीने की उसकी इच्छा हुई । जेब सँभाली तो पैसे गायब ।
यजमान की दु:खी आत्मा यह सोचती ही रह गई कि असल में उसकी जेब कटी कहाँ ? दिल्ली में या फिर हरिद्वार में ।
-0-मुरलीधर वैष्णव,ए–77,रामेश्वर नगर,बासनी प्रथम,जोधपुर–342005 मो. 9460776100