मैं चौक पर किसी सवारी की इंतज़ार में खड़ा था । कुछ फासले पर एक दिव्यांग भी शायद इसी उम्मीद में खड़ा हुआ था । मैले- कुचैले , गंदे से कपड़े पहने बैसाखियों के सहारे। मैं सोचने लगा कि इसे कौन अपने ऑटो में बिठाएगा ?
तभी एक ऑटो रुका । मैं पिछली सीट पर बैठ गया । वह ऑटो चालक उतरा और उस दिव्यांग को बड़े प्यार से अपने साथ वाली सीट पर बैठने में उसकी मदद करने लगा । मेरा भी हृदय पिघल गया । मैंने फैसला किया कि इसका किराया मैं ही चुका दूँगा ।
कुछ स्टॉपेज के बाद उसका स्टॉपेज आ गया । इससे पहले कि मैं कहता कि किराया मैं दूँगा ऑटो चालक ने उसे उतने ही प्यार से सहारा देकर उतारा और बैसाखियों के सहारे खड़ा कर दिया । और जैसे ही उस दिव्यांग ने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, ऑटो चालक ने बिना कुछ कहे ऑटो आगे बढ़ा दिया ।
मैं ऑटो चालक के इस पुनीत भाव को देखकर जैसे हैरान था और भौचक्का भी। … जैसे कहीं कोई बाँसुरी की मधुर धुन बजने लगी…या कहीं दूर मंदिर की घंटियाँ सुनाई देने लगीं…
-कमलेश भारतीय -9416047075