जून 2026

देशप्रकृति-नटी     Posted: June 1, 2019

   “माँ , तुम यहाँ अकेले चबूतरे पर? कोई घर में किसी ने  कुछ कहा क्या?  मैं तुम्हें कब से ढूँढ रहा था । घर चलो, सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं ।

आज तुम्हारा जन्मदिन है ।  मैं अभी बाजार से तुम्हारे लिए  सिल्क की साड़ी और वाकर  लेकर आया हूँ । आज ये सफ़ेद साड़ी और पुरानी लाठी, तुम्हें शोभा नहीं देती। तुम्हारे लिए एक पार्टी भी रखी है। केक, कोल्डड्रिंक , आइसक्रीम आदि  सभी  चीजों  का इंतजाम हो गया है । बस तुम्हारे पहुँचने की देरी है ।

“ चल हट,  मुझे पार्टी में नहीं जाना । इसलिए तो यहाँ भाग कर चली आई हूँ ।”  

”  किसने क्या कहा? माँ,  तुम भी बहुत गुस्सा करती हो । घर की छोटी-छोटी बातों  को नजरअंदाज कर दिया करो । इस अवस्था में अधिक गुस्सा  होना ठीक नहीं होता । ”   इतना कहकर वो मेरे पास चबूतरे पर बैठ गया और  मनुहार करने लगा। 

   ” पहले सुन ध्यान से, तब पता चलेगा तुम्हारी जननी क्यों दुखी है तुझसे ? 

जब तेरा जन्म हुआ  , तो नामकरण के दिन, तेरे नाना जी मुझसे बोले ,   “बेटी प्रकृति,  मैं तुम्हारे बेटे का नाम ‘विज्ञान’ रखता हूँ ।  इसकी जन्मकुंडली मैंने पंडित जी  से दिखाया है,  बहुत ही होनहार बालक है । आगे जाकर बहुत नाम करेगा । 

यह सुनकर उस दिन मैं बहुत खुश हुई । बहुत कष्ट से मैंने तूझे पढाया …लायक बनाया ।

पर !  सब व्यर्थ!  चढती जवानी के नशे में चूर , तूने जननी की ही सुध लेना छोड़ दी ! रे…अभागा,  जिस पत्तल में खाया उसीमें  छेद कर दिया!  तुम्हारे चलते मैं कब श्वेत  लिबास में  लिपट गई  तुमको पता भी नहीं चला ! मेरे संगी-साथी , सभी  मुझे उलाहना देते हैं। देख ,तेरे बेटे ने क्या किया!   जंगल कटवा कर अट्टालिकाएँ खड़ी कर दी । 

 अब तो सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है । असंख्य  पोलोथिन और  बिखरे प्लास्टिक की बोतलों से मेरा दम   घुट रहा है..! चारों ओर  अनगिनत  फैक्ट्रियाँ भी खुल गई हैं । सो नीला  आसमान , अब काला दिखने लगा है ।  यही विषैली हवा  फेफड़ो के अंदर जाती  है और मैं रात भर खाँसती रहती हूँ । लेकिन,  तू … अपने ही मद में चूर रहता है ! 

   तू भी अब कान खोलकर सुन ले ,  कभी  मैं,   ‘प्रकृति-नटी’  के नाम से जानी जाती थी । लोग मेरी पूजा करते थे । पर… आज, देख, मेरी क्या हालत है !  मेरे आंगन में न कोयल की कूक सुनाई पड़ती , न ही मोर  का नाचना और न चाँद-तारों की आँख मिचौली!

 अरे.. किसका  जन्मदिन मनाएगा तू ? इसी  जिंदा लाश का !  ” एक ही साँस में मैंने अपनी सारी भड़ास निकला दी और टूटी लाठी के सहारे  उठने की कोशिश करने लगी ।  

 तभी बिजली की तेज कौंध के साथ आकाश जोर- जोर से गरजने लगा। ऐसा …जैसै कुछ अनहोनी घटने वाली हो। विध्वंसकारी प्रलय की गर्जन अब दसों  दिशाओं में  गुंजायमान हो उठीं । मैं स्तब्ध सब देखती रही।

विज्ञान एकाएक मेरे चरणों में झुक गया और चिल्लाने लगा,  “माँ… इस  प्रलय से मुझे बचा लो  !  मैं तुझे खोना नहीं चाहता !”   

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