“माँ , तुम यहाँ अकेले चबूतरे पर? कोई घर में किसी ने कुछ कहा क्या? मैं तुम्हें कब से ढूँढ रहा था । घर चलो, सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं ।
आज तुम्हारा जन्मदिन है । मैं अभी बाजार से तुम्हारे लिए सिल्क की साड़ी और वाकर लेकर आया हूँ । आज ये सफ़ेद साड़ी और पुरानी लाठी, तुम्हें शोभा नहीं देती। तुम्हारे लिए एक पार्टी भी रखी है। केक, कोल्डड्रिंक , आइसक्रीम आदि सभी चीजों का इंतजाम हो गया है । बस तुम्हारे पहुँचने की देरी है ।
“ चल हट, मुझे पार्टी में नहीं जाना । इसलिए तो यहाँ भाग कर चली आई हूँ ।”
” किसने क्या कहा? माँ, तुम भी बहुत गुस्सा करती हो । घर की छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर दिया करो । इस अवस्था में अधिक गुस्सा होना ठीक नहीं होता । ” इतना कहकर वो मेरे पास चबूतरे पर बैठ गया और मनुहार करने लगा।
” पहले सुन ध्यान से, तब पता चलेगा तुम्हारी जननी क्यों दुखी है तुझसे ?
जब तेरा जन्म हुआ , तो नामकरण के दिन, तेरे नाना जी मुझसे बोले , “बेटी प्रकृति, मैं तुम्हारे बेटे का नाम ‘विज्ञान’ रखता हूँ । इसकी जन्मकुंडली मैंने पंडित जी से दिखाया है, बहुत ही होनहार बालक है । आगे जाकर बहुत नाम करेगा ।
यह सुनकर उस दिन मैं बहुत खुश हुई । बहुत कष्ट से मैंने तूझे पढाया …लायक बनाया ।
पर ! सब व्यर्थ! चढती जवानी के नशे में चूर , तूने जननी की ही सुध लेना छोड़ दी ! रे…अभागा, जिस पत्तल में खाया उसीमें छेद कर दिया! तुम्हारे चलते मैं कब श्वेत लिबास में लिपट गई तुमको पता भी नहीं चला ! मेरे संगी-साथी , सभी मुझे उलाहना देते हैं। देख ,तेरे बेटे ने क्या किया! जंगल कटवा कर अट्टालिकाएँ खड़ी कर दी ।
अब तो सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है । असंख्य पोलोथिन और बिखरे प्लास्टिक की बोतलों से मेरा दम घुट रहा है..! चारों ओर अनगिनत फैक्ट्रियाँ भी खुल गई हैं । सो नीला आसमान , अब काला दिखने लगा है । यही विषैली हवा फेफड़ो के अंदर जाती है और मैं रात भर खाँसती रहती हूँ । लेकिन, तू … अपने ही मद में चूर रहता है !
तू भी अब कान खोलकर सुन ले , कभी मैं, ‘प्रकृति-नटी’ के नाम से जानी जाती थी । लोग मेरी पूजा करते थे । पर… आज, देख, मेरी क्या हालत है ! मेरे आंगन में न कोयल की कूक सुनाई पड़ती , न ही मोर का नाचना और न चाँद-तारों की आँख मिचौली!
अरे.. किसका जन्मदिन मनाएगा तू ? इसी जिंदा लाश का ! ” एक ही साँस में मैंने अपनी सारी भड़ास निकला दी और टूटी लाठी के सहारे उठने की कोशिश करने लगी ।
तभी बिजली की तेज कौंध के साथ आकाश जोर- जोर से गरजने लगा। ऐसा …जैसै कुछ अनहोनी घटने वाली हो। विध्वंसकारी प्रलय की गर्जन अब दसों दिशाओं में गुंजायमान हो उठीं । मैं स्तब्ध सब देखती रही।
विज्ञान एकाएक मेरे चरणों में झुक गया और चिल्लाने लगा, “माँ… इस प्रलय से मुझे बचा लो ! मैं तुझे खोना नहीं चाहता !”