विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी। प्राचार्य बहुत दुःखी थे। उनका अन्तर्मन आहत था। विद्यार्थियों को सहलाते हुए उन्होंने आहिस्ता.आहिस्ता अपनी समझाइश शुरू की-‘‘आप लोग हड़ताल क्यों कर रहे हैं ? मेरे पास आकर पहले बात तो कर लेते । मैं इस महाविद्यालय की प्रगति के लिए क्या नहीं कर रहा हूूँ ? आप लोगों के लिए क्लासरूम कम पड़ते थे। क्या मैंने चार नये क्लास रूम नहीं बनवाये ?
‘‘यस सर, बनवाये हैं।’’ छात्रों ने हामी भरी।
‘‘मैंने इतनी लिखा-पढ़ी करके कॉलेज को ढाई लाख रुपये की यू.जी.सी. ग्रांट नहीं दिलवाई’’?
‘‘यस सर’’।
‘‘क्या मैंने प्रयोगशाला में नये उपकरण नहीं मँगवाए हैं’’?
‘‘यस सर’’।
‘‘क्या मैंने फर्नीचर की कमी को दूर नहीं किया’’?
छात्र हामी भरते रहे।
‘‘मैं इस महाविद्यालय की प्रगति के लिए चौबीस घण्टे सोचता रहता हूँ, चाहे घर पर हूँ या कॉलिज में । मैं सभी तरह की सुविधाएँ जुटा रहा हूँ, मगर आप हैं कि….’’।
‘‘मगर सर, क्लासेज़ भी लगनी चाहिए न ? क्लासेज कभी लगती ही नहीं ”- छात्रों ने बात काटते हुए कहा ।
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देशप्रगति Posted: July 1, 2017
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