राधेश्याम हर रोज सैर करने जाता था। एक दिन उसका मित्र बलराम भी उसके साथ हो लिया। बलराम ने देखा कि राधेश्याम ने पार्क के मुख्यद्वार को झुक कर प्रणाम किया। बलराम ने कहा-‘यहाँ मन्दिर तो दिखाई नहीं देता, फिर किसे तुम प्रणाम कर रहे हो?’
राधेश्याम ने कहा-‘सामने देखो, कितने वृक्ष हैं, उन पर चहकते पक्षी भी, सैर करने के लिए कितना सुन्दर रास्ता बना हुआ है, सैर करते हुए लोग कितने अच्छे लग रहे हैं। यहाँ सैर करने से मैं ‘ाारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता हूँ। मैं इस पार्क को मन्दिर से कम नहीं समझता। यह प्रकृति माँ का मन्दिर है। इसलिए इसे प्रणाम न करूँ तो किसको करूँ।’
यह कहकर राधेश्याम ने बलराम की तरफ देखा। बलराम ने अपने दाएँ हाथ से मुख्यद्वार की धरती को छूआ और अपने माथे से लगा लिया।