जून 2026

चर्चा मेंप्रतिनिधि लघुकताएँ     Posted: September 1, 2020

समकालीन हिन्दी लघुकथा-लेखन से जुड़कर सुकेश साहनी की रचनाधर्मिता अपने समय, सच एवं परिवेश से सीधा साक्षात्कार करती है तथा समस्त विसंगतियों एवं दलित-पीड़ित मानसिकता से लोहा लेती हुई एक ऐसे मार्ग का संधान करती है, जहाँ मानवोत्थान एवं मानवीय संवेदना की भावना होती है। वास्तव में उनकी सृजनधर्मिता आज की अराजक भीड़ में खोए एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो सहज, स्निग्घ, ॠजु एवं छद्ममुक्त हो जाने की कोशिश में हर बार रीतता रहा है और क्षरित होकर भी नव सर्जन की आशा में आस्था का सूत्र कभी छोड़ना नहीं चाहता। अपने बहुआयामी रचना-संसार में सुकेश साहनी बारी-बारी सभी दिशाओं की परतों को खोलता है, विश्लेषित करता है और सार की वस्तु को न पाकर आगे बढ़ जाता है…उसे हर कहीं तलाश होती है- मनुष्य की गरिमा को अपनी सम्पूर्णता में प्रतिष्ठित करने वाली उस लुकाठी की, जो नाना झंझावातों में भी प्रज्वलित हो मनुष्यता का मार्ग प्रशस्त करती रहती है। उनकी  प्रायः सभी लघुकथाओं में इसी लुकाठी की ऊष्मा होती है, जिसकी आँच पाठक भी महसूस करते है और अपने को उनकी रचनाओं में विलीन पाते हैं। सुकेश साहनी की रचनाधार्मिता की कदाचित यही शक्ति उसे अपने समकालीनों से अलग करती है। उनकी शक्ति रचना की शक्ति है, जो मनुष्य को उसके छद्म में नहीं, मनुष्यता में मापती-सँवारती है।

डॉ. शिवनारायण

संपादक : नई धारा

वैज्ञानिक होने के नाते कथाकार सुकेश साहनी अपनी कुछ रचनाओं में अपने समय से आगे की बात करते हैं।यही वजह है कि उनकी अनेक लघुकथाओं  में आने वाले समय के संकट को महसूस किया जा सकता है। सुकेश साहनी  लघुकथा-जगत् के अकेले ऐसे रचनाकर हैं, जिनकी रचनाओं में विषय-वैविध्य और गहन चिन्तन, प्रस्तुति और प्रभाव एक साथ लघुकथा की शक्ति का एहसास कराते हैं। इनकी  लघुकथाएँ काल के कपाल पर उत्कीर्ण शिलालेख हैं, जिनके बिना लघुकथा के मुकुट की कल्पना नहीं की जा सकती। ये  मनोरंजन की नहीं, बल्कि गहन आस्वाद  की रचनाएँ  हैं , जिनका भावबोध  और अर्थबोध पर्त -दर पर्त खुलता है।मानव जीवन में जो भटकाव आया है, उसकी वापसी का आह्वान करती हैं ये लघुकथाएँ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

संपादक : लघुकथा.कॉम

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

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