अपने मोबाइल पर एकाएक बेसिक शिक्षा अधिकारी का नम्बर देख प्राइमरी विद्यालय की प्रिंसिपल हड़बड़ा गईं। खड़े होकर फ़ोन रिसीव किया, “प्रणाम सर!”
बी.एस.ए. महोदय बोले, ‘‘कैसा चल रहा है विद्यालय?”
“सर हमारा रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा। अटेंडेंस भी टॉप रही। सर दाखिले भी पिछले साल से दोगुने हुए।”
“हम्म्म!”
“सर हम पब्लिक स्कूल से सिर्फ़ अंग्रेज़ी में पिछड़ते थे; पर हमने बच्चों के अंग्रेजी बोलने पर भी मेहनत की, जिससे हमारे बच्चे भी अब अंग्रेज़ी बोल रहे हैं। लोग अपने बच्चों को हमारे स्कूल में ख़ूब डाल रहे हैं।”
“हम्म्म”
“सर हम खेल और भाषण- प्रतियोगिता में ज़िला स्तर पर टॉप हुए हैं। कुछ बच्चे तो पब्लिक स्कूल छोड़कर हमारे यहाँ आए हैं सर। यही मेरा सपना था कि सरकारी विद्यालय पब्लिक स्कूल से बेहतर हों सर!”
“तो अब आप सपने से बाहर आ जाएँ।”
“समझी नहीं सर!”
“आपकी शिकायत मिली है कि आप क्षेत्र में वैमनस्य फैला रही हैं। पब्लिक स्कूल छोड़ने के लिए अभिभावकों पर दबाव बना रही हैं। कुछ लोगों पर हमले भी करवाए है आपने।”
“नहीं तो सर! सब बिलकुल झूठ है! हम कम पैसों में उत्कृष्ट शिक्षा दे रहे… पब्लिक स्कूल में फीस ऊँची है और पढ़ाई हमसे खराब इसलिए लोग बच्चों को यहाँ भेज रहे।”
“पब्लिक स्कूल किसका है पता है? नहीं न? इतने बड़े लोगों का स्कूल ठप्प करके नौकरी कर पाएँगी आप?”
“फिर हम क्या करें?”
“आप सिर्फ़ मिड-डे मील पर ध्यान दीजिए …बाकी आराम कीजिए!”
इसके बाद विद्यालय सिर्फ़ मिड-डे मील पर केन्द्रित हुआ।
प्रिंसिपल ने खाली समय में परचून की दुकान खोल ली।
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