मेरी उम्र सात वर्ष से कम ही रही होगी, जब मैंने क्रान्ति के लिए प्रार्थना की।
उस सुबह भी मैं रोज़ की तरह नौकरानी की उँगली पकड़कर प्राथमिक स्कूल की ओर जा रहा था। पर मेरे पाँव इस तरह घिसट रहे थे जैसे कोई जबरन मुझे जेल में खींचकर ले जा रहा हो। मेरे हाथ में कॉपी, आँखों में उदासी व दिल में सब कुछ चकनाचूर कर देने वाली अराजक मन: स्थिति थी। निक्कर के नीचे नंगी टाँगों पर ठंडी हवा बरछियों की तरह चुभ रही थी।
स्कूल पहुँचने पर बाहर का दरवाजा बंद मिला। गेटकीपर ने गंभीर शिकायती लहजे में कहा, “प्रदर्शनकारियों के धरने के कारण आज भी क्लासें रद रहेंगी।”
खुशी की एक जबरदस्त लहर ने मुझे बाहर से भीतर तक भिगो दिया।
अपने हृदय की भीतरी गहराइयों से मैंने इंकलाब के जिंदाबाद होने की दुआ माँगी।
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