अब तक पढ़ी हुई लघुकथाओं में से दो का चयन दुष्कर कार्य है। लघुकथा से मेरा परिचय 1994 में हुआ जब बिहार शिक्षा बोर्ड के नवीं कक्षा में स्वर्गीय भवभूति मिश्र की लघुकथा बची- खुची संपत्ति पढ़ी। पर यह क्रम जारी न रह सका। 2017 में पुनः यह क्रम जुड़ा। शनैः शनैः श्रेष्ठ लघुकथाओं को पढ़ने के साथ -साथ लेखन कार्य भी प्रारंभ हुआ। लघुकथा को अधिक से अधिक जानने और समझने की जिजीविषा बनी।
मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में सर्वश्री भवभूति मिश्र की ‘बची खुची सम्पत्ति’, रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘ऊँचाई’, सुकेश साहनी की ‘बैल’ और ठंडी रजाई’, अशोक भाटिया की ‘तीसरा चित्र’, युगल की ‘और द्रौपदी नंगी नहीं हुई’, बलराम अग्रवाल की ‘उसकी हँसी’, सतीश राज पुष्करणा की ‘मन का साँप’ , योगराज प्रभाकर की ‘एक अफगान की डायरी’ और कमल चोपड़ा की ‘बहुत बड़ी लड़ाई’ सहित अनेक लघुकथाएँ हैं।
यहाँ मैं दो कथाओ में भवभूति मिश्र की ‘बची खुची सम्पत्ति’ और कुमार गौरव की ‘निष्ठुर’ का चयन करना चाहूँगा।
भवभूति मिश्र से अधिकतर नवोदित कम ही परिचित होंगे। बहुत कम लघुकथाएँ उन्होंने लिखीं और उसमें से सभी हम सबके समक्ष उपलब्ध नहीं हैं।
‘बची खुची सम्पत्ति‘ स्वतंत्रता के प्रश्चात विभाजन का दंश झेल रही एक युवती की कहानी है, जो टीबी से ग्रस्त अपने पति के इलाज के लिये भीख माँग रही है। उस समय टीबी होने का मतलब लगभग मृत्यु हो जाना ही होता था, पर अपनी गरीबी के बावजूद वह पति को बचाने के लिये प्रयासरत है। इसी संदर्भ में उसकी भेंट एक युवा अमीर से होती है, जो पैसे के बदले उसके देह को पाना चाहता है। युवती स्पष्ट शब्दों में मना करते हुए कहती है कि विभाजन के फलस्वरूप वह अपनी सारी सम्पत्ति तो पहले ही गँवा चुकी है पर अपनी इज्जत नहीं गँवाएगी। कथाओं में स्त्री का इतना मजबूत चरित्र बहुत कम दिखता है। साथ ही उसे भारतीयों के भलमनसाहत पर भी यकीन है कि भीख से ही वह अपने पति का इलाज कराने में समर्थ हो सकेगी।
कथाकाल भले आज से सत्तर वर्ष से अधिक पुरानी हो, पर उसकी प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आयी है। भौतिकवादी और उपभोक्तावादी युग में जब ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है जो देह के बल पर भी हर सुख-साधन प्राप्त करने में भी परहेज नहीं करती हैं,अगर यह कहा जाय कि इसकी कथा की प्रासंगिकता बढ़ गयी है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक और खासियत यह है कि कथा खत्म होने के बाद भी पाठक के लिये खत्म नहीं होती।वह पाठक के मन में बैठ जाती है और लंबे समय तक चिंतन करने पर मजबूर कर देती है।
यही बहुत है।” कहती हुई वह शीघ्रता से बाहर निकल गई।
नयी पीढ़ी के लघुकथाकारों में कुमार गौरव अपना एक अलग स्थान रखते हैं। इनसे प्रभावित हुए बिना रहना मुश्किल है।
उनकी कथा ‘निष्ठुर’ अपने आप मे अनूठी है।
प्रचलित अवधारणा है कि माँ ही ममता, त्याग, समर्पण और करुणा की प्रतिमूर्ति होती है।
पिता के सीने में दिल नहीं होता। वह निष्ठुर होता है। साहित्य में पिता के अंदर के प्रेम ओर दया देखने की कोशिश बहुत कम हुई है। यह कथा एक ऐसे अभागे बाप का दर्द बयां करती है जिसने बिन माँ की बच्ची को कभी माँ की कमी महसूस नहीं करने दी लेकिन बेटी की स्वार्थपरता ने उसके दिल को जार जार कर दिया। बेटी की स्वार्थपरकता से अधिक उसे इस बात का दुख है कि बेटी अपने लिये सही पति नहीं चुन पायी। ऐसे युवक से प्रेम विवाह किया है जो बेरोजगार है और भविष्य के प्रति चिंतित नहीं है। बेटी से इतना प्यार करता है कि बेटी की बात टाल नहीं पाता और फिर भी बेटी को गलत नहीं कहता। अंतिम पँक्ति ‘हम तो निष्ठुर आदमी हैं’ किसी के आँख भर आने को पर्याप्त है।
न केवल निर्वहन के स्तर पर बल्कि शिल्प के स्तर पर भी यह कथा सामान्य कथा की भीड़ में अलग नज़र आती है। शीर्षक चयन भी लाजबाब है।
यह कथा संवेदनात्मक रूप से झकझोर देती है। कथा पढ़ने के बहुत देर बाद भी यह कथा पाठक के दिल में छायी रहती है।
बची- खुची सम्पत्ति
–भवभूति मिश्र
“अनन्त सौन्दर्य और अखण्ड रूप-माधुरी लेकर भी तुम भीख माँगने चली हो सुन्दरी!” कहते हुए धनी युवा की सतृष्ण आँखें उसके मुखमण्डल पर जम गई।
वह मुस्कराने लगा और साथ-ही-साथ विचित्र भाव-भंगिमा भी दिखलाने लगा। युवती के कोमल कपोल रोब और लज्जा से लाल-लाल हो उठे। उसकी आँखें, पैर के नीचे, भूमि में छिपे किसी सत्य के अन्वेषण में लग गई।
युवक ने पूछा, ” भीख माँगने में क्या मिलेगा? पैसा, दो पैसा या चार पैसा, इतना ही न? क्या तुम इतने से ही अपने पति को क्षयरोग से मुक्त कर लोगी? याद रखो, यह राजरोग है और इसकी चिकित्सा के लिए चाहिए रुपया, काफी रुपए, हाँ!”
“तो फिर और क्या करूँ बाबूजी?” दबे स्वर में युवती ने पूछा। युवक ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा, “और क्या करोगी? मुझी से पूछती है? यह सरस अधर, सुरीला कण्ठ-स्वर, कोमल बाँहें-किस दिन ये काम देंगे? कहता हूँ। हाथ फैलाओगी तो तांबे के टुकड़े पाओगी और बाँहों फैलाओगी तो पाओगी हीरे-जवाहरात।” इतना कहकर युवक ने अपनी तिजोरी खोल दी।
उस रमणी ने उन्हें देखा। आँखें उनके झिलमिल प्रकाश में न ठहर सकीं।
वह चुप रह गई। उसका सारा शरीर पीला पड़ गया। उसे लग रहा था, उसके ये शब्द सदा से अपरिचित हों।
कुछ देर तक वह इसी प्रकार स्तब्ध भीत-सी खड़ी रह गई। अन्त में
अपने बिखरे साहस को समेटकर उसने उत्तर दिया, “बाबूजी, इसी हिन्दुस्तान में आने के लिए अपनी सारी सम्पत्ति तो पाकिस्तान में गवा आई हूँ। क्या हिन्दुस्तान पहुँचकर भी अपनी बची-खची सम्पत्ति को गँवा दूँ? नहीं बाबू यह नहीं होने का। माफ कीजिए। यह बहुत बड़ा देश है। एक-एक पैसा तो मिल ही जाएगा। यही बहुत है।” कहती हुई वह शीघ्रता से बाहर निकल गई।
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1-निष्ठुर
कुमार गौरव
नीति ने ट्रेन में समय गुजारने के लिए बगल में बैठे अधेड़ से बात करना शुरु किया ” आप कहाँ तक जाएंगे अंकल। ”
” इलाहाबाद तक । ”
उसने ठिठोली की ” कुंभ लगने में तो अभी बहुत टाइम है। ”
” वहीं तट पर इंतजार करेंगे कुंभ का। बेटी ब्याह लिए , अब तो जीवन में कुंभ नहाना ही रह गया है । ”
” अच्छा! परिवार में कौन कौन है । ”
” अब तो कोई भी नहीं। बेटी थी पिछले हफ्ते उसका ब्याह कर दिया । ”
” दामाद क्या करता है । ”
” उ हमरे बेटी से पियार करता है “, कहते हुए उसने आंखें पंखे पर टिका दी ।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जब नीति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा ” दुख बांटने से कम होता है अंकल ” तो मानों भाखडा बांध के चौबीसो गेट एक साथ खुल गए । थोडा संयत होने के बाद उसने बताया ” बेटी ने कहा अगर उससे शादी नहीं हुई तो जहर खा लेगी । बिन मां की बच्ची थी उसकी खुशी के लिए सबकुछ जानते हुए भी मैंने हां कह दी और पूरे धूमधाम से शादी की व्यवस्था में जुट गया। जो कुछ मेरे पास था सब गहने जेवर और आवभगत की तैयारियों में लगा दिया । तभी ऐन शादी के एक दिन पहले समधी पधारे और दहेज की मांग रख दी । जब मैंने असमर्थता जताई तो बेटी ने कहा आपके बाद तो सब मेरा ही है। तब क्यों नहीं अभी दे देते हैं । हमने घर और जमीन बेचकर नगद की व्यवस्था कर दी । ”
” सबकुछ तो उसका ही था बेबकूफ लडकी, आपको मना करना चाहिए था। कह देते, आपके मरने के बाद सब बेचकर ले जाए “, नीति ने सीट पर जोर से घूसा मारा ।
अधेड़ मुस्कुरा उठा नीति के इस तर्क पर ” कोई बाप अपने सुख के लिए बेटी के गृहस्थी में क्लेश नहीं चाहता बेटा । ”
” हद है मतलब! उस लडकी के दिल में आपके लिए जरा भी प्यार नहीं । ”
” नहीं ऐसा नहीं है। विदाई के वक्त बहुत रोई थी । ”
“और आप ?”
उसने एक फीकी मुस्कान बिखेरी ” हम तो निष्ठुर आदमी हैं। सुधा जब उसको गोद में छोडकर अर्थी पर लेटी थी। तब भी हम रोने के बदले चुल्हे के पास बैठकर बेटी के लिए दूध गरम कर रहे थे । “
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-0-मृणाल आशुतोष,द्वारा– श्री तृप्ति नारायण झा,ग्राम+पोस्ट– एरौत
वाया–रोसड़ा,जिला–समस्तीपुर (बिहार)-848210
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