जीवन में सब कुछ था आज्ञाकारी ,शालीन, समझदार पति , दोनों की पेंशन ,स्वस्थ, सुयोग्य, आत्मनिर्भर संतान ,अपना घर ,फिर भी कुछ कमी सी थी। जीवन जैसे दाल- भात- सा ठहरा सा था । एक रूटीन सा था। न कोई उमंग न कोई तरंग । कोई ठहरी हुई नदी में कंकर फेक जाता तो जल्द ही सयंमित नदी खुद को समेट फिर ठहर जाती।
एक दिन उसने कहा बस बाकी तो सब मिला, प्रेम नहीं किया । कभी- कभी सोचती हूँ प्रेम भी करके देख लेते, तो पता चल जाता प्रेम कैसा होता है। शादीशुदा स्त्री की वर्जित फल खाने की इच्छा जैसे ईश्वर सुन रहा था । अचानक पति को बुखार आया टेस्ट हुए, तो टाइफाइड बताया । दस दिन तक बुखार न उतरा, तो कोरोना पॉजिटिव आने पर हॉस्पिटलाइज करना पड़ा । ठीक होकर घर आने की इच्छा लिये हुए पति अस्पताल से सीधे श्मशान पहुँचे । सूरत तक न देख पाए । घर में अंतिम क्रिया, नहलाना ,कपड़े पहनाना कुछ न हुआ । बस फोन पर अंतिम शब्द घर आना चाहता हूँ और साँस उखड़ जाना याद रह गया । ज्यादा दिन नहीं जी पाऊँगी । किसी भी चीज में मन नहीं लगता अब। खाना जबरदस्ती बहू दे जाती है । एक साल मुश्किल पकड़ूँगी उसने कहा। अब वह प्रेम क्या होता है, महसूस कर चुकी थी।
-0-डॉ पुष्पलता मुजफ्फरनगर, pushp.mzn@gmail.com