यमुना के पास एक बूढ़ा संत छोटी सी झोपड़ी में अकेला रहता है। उस झोपड़ी के आगे कच्चा रास्ता है जिस पर पास के गांव के लोग खेतों की तरफ जाते हैं। कोरोना विषाणु के चलते आजकल वह संत नित्य अपनी झोपड़ी में मुंह पर गमछा बांधे बैठा दिखाई देता है। आगे खेतों में काम करने वाला एक किसान वहां से गुजरते हुए हर रोज संत की तरफ देख इस प्रकार मुस्कराता है जैसे वह कोई अजूबा हो। एक दिन किसान से रहा नही गया तो उसने संत से पूछ ही लिया- ‘बाबा जी आप तो यहां विराने में अकेले रहते हो, कोई आप के पास आता भी दिखाई नहीं देता, कोरोना भीड़ में एक दूसरे को होता है, फिर सारा दिन ये गमछा क्यों मुंह पर बाँधे रहते हो?’
‘बेटा मुझे पता है मुझ अकेले को कोरोना नहीं होगा, पर मेरे गमछा बाँधने से रास्ते पर जाने वालों को इस महामारी से बचने के लिए मुँ ह ढकने की प्रेरणा तो मिलेगी।
किसान को संत की बात सुन कुछ शर्म सी महसूस हुई, तो उसने झट अपने गले में पड़े गमछे से मुँह ढक लिया।
-0-