{गढवाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट}
माँ बतांदी छाई कि, भुला जबारी चार बर्सो छौ, उबारि वे की फ्यूलियों सि लीक घुण्डौं तक पाग वळा घौ ह्वे गे छा। माँ वे का घौ अपड़ा आँसू न धोंदि छाई। वे का चिल्लांण कि आवाज मां माँ भोरिक घौ पर मलम लगांदी छाई। दसवीं की परिक्षा सि लीक नौकरी मिलण तक माँ बि आधी नींद सेंदि छाई।
नौकरी लगी, त माँ थैं लगि कि वींकी साधना पूरी ह्वे ग्याई। माँ सि सौवों किलोमीटर दूर रैण वाळु भुला, पैलि हर तीन मैना म माँ मिलण थैं आन्दु छौ। फिर छै मैना म… फिर एक बर्स भर म हर बर्स
… फिर… … …
भौत सारी बिमरियूँ सि लड़दी एकुली माँ थैं अफुम रखिक मि वीं कु इलाज करौंदु , ख्याल रखदु। जन्नि माँ थैं ठीक लगदु छौ वा वापस चली जांदी छाई।
एक बार मिन माँ थैं पूछी- “माँ ! जब तिन मेरी पढै-लिखै अर हौरि धाणी पाळण पोस्ण म मि म अर भुला म क्वी फरक नि कै, त मेरि दगड़ रैंण म त्वि थैं क्य परेसनि च?”
“नौना और नौनी म फरक नि त क्य ह्वे, नौना अर जवैं म त फरक छैं छ न ! मि अपड़ा जवैं क घौर जादा दिन तक कनक्वे रै सकदौं?”
“जवैं क घौर ? फीर मेरू… ?”
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