पुस्तक समीक्षा
आधुनिक जगत का आईना है फ्लैट नंबर इक्कीस/मुकेश पोपली
राम मूरत ‘राही’ पिछले चालीस वर्षों से भी अधिक समय से साहित्य से जुड़ा हुआ नाम है। ‘धीरे धीरे रे मना…..’ की तर्ज़ पर चलते हुए उन्होंने बाल कहानियाँ लिखी, ग़ज़लों और कविताओं के साथ व्यंग्य, समीक्षा और संस्मरण विधाओं को भी उन्होंने अपने लेखन में शामिल किया। अंततः उन्हें लघुकथा विधा अपने लेखन के बेहद नज़दीक लगी। वर्ष 2019 में उनका पहला लघुकथा संग्रह ‘अंतहीन रिश्ते’ आया। उसके बाद ‘भूख से भरा पेट’ 2021 में और ‘इंजेक्शन’ 2022 में प्रकाशित हुआ। इस बीच 2022 में ही एक ग़ज़ल संग्रह ‘तेरे शहर में’ भी उन्होंने अपने पद्यप्रेमियों पाठकों के लिए रचा। वर्ष 2024 में एक बार फिर से वह अपनी प्रिय विधा लघुकथा में ‘फ्लैट नंबर इक्कीस’ ले कर साहित्य जगत में उपस्थित हुए हैं।
अपने चौथे लघुकथा संग्रह के आत्मकथ्य में लेखक ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इसमें अधिकतर सकारात्मक संदेश वाली लघुकथाएँ हैं और वह अपने पाठकों को नकारात्मकता से बचाना चाहते हैं। यद्यपि उनके अनुसार लघुकथा लिखने वालों की बाढ़ सी आई हुई है और वह स्वयं ही यह भी कहते हैं कि कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला जानने वाला ही सही मायने में लघुकथाकर होता है। पुस्तक की भूमिका में लघुकथाकार सन्तोष सुपेकर ने भी लेखक की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा है कि राही जी द्वारा ‘देखन में छोटे लगे घाव करे गम्भीर’ दृष्टिकोण को अपनाया गया है और इन लघुकथाओं में भाषा की सरलता, प्रांजलता और बोधगम्यता पर विशेष ध्यान दिया गया है। वह यह भी लिखते हैं कि यह लघुकथाएँ बौद्धिकता से अधिक भावनात्मक शैली में लिखी गई हैं।
‘फ्लैट नंबर इक्कीस’ संग्रह में ‘एक सुर में’ लघुकथा में मनुष्य के बदलने की दास्तान पर रोचक अंदाज़ में कटाक्ष किया गया है तो ‘टाइम पास’ में बुजुर्गों की व्यथा पर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। ‘दर्पण’ लघुकथा मनुष्य के चेहरे और चरित्र में फ़र्क़ दर्शाने वाले दार्शनिक अंदाज़ में सामने आती है तो ‘बुढ़ापे में’ लघुकथा में एक किशोर द्वारा धूम्रपान जैसे घातक व्यसन से अपने पिताजी को बचाने के लिए वृक्षों की फसल काटने में लगने वाले समय पूछने का अंदाज़ भी निराला है। ‘मैं ही ग़लत क्यों’ लघुकथा मानवीय मजबूरी और सरकारी ख़ज़ाने भरने की नीतियों पर व्यंग्य कसती है तो ‘लेखक नहीं’ में एक आशावादी दृष्टिकोण अपनाया गया है जिसमें व्यक्ति के बुरे और विरोधी होते हुए भी उसकी रचना की सार्थकता को सराहा गया है। ‘अंकुश’ में संयुक्त परिवार की प्रथा का सबसे बड़ा लाभ बताया गया है कि इस बहाने मनुष्य में बुराइयाँ नहीं पनपती तो इसी तरह एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और सही दिशा में कदम उठाने का उदाहरण बनी है ‘समझदार’ लघुकथा। ‘तुम्हारी तरह’ रचना में गंगा की व्यथा प्रकट की गई है और मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में न घबराने की प्रेरणा प्रदान की गई है तो ‘आश्वस्त’ लघुकथा हमारे देश के बुजुर्गों को आश्वस्त करती है कि सभी घरों में बुजुर्गों की उपेक्षा नहीं की जाती है और अभी भी अपने माँ-बाप के प्रति श्रद्धा और स्नेह रखने वाले बच्चे मौजूद हैं। ‘चारों धाम’ में भी माता-पिता के प्रति कृतज्ञ भाव दिखाई देता है। ‘उसी पल से’ में एक बच्चे की अपने दादा के प्रति सम्मान की कोमल भावना दर्शाई गई है। ‘माँ हूँ कि दुश्मन’ में भी जैसे को तैसा वाली कहावत सिद्ध होती दिखाई पड़ती है। ‘हमारी देवी’ में भी एक बच्चे की बात से सबकी आँखें खुल जाती हैं। ‘परवाह’ भी ऐसी ही एक लघुकथा है। ‘छोटी सोच’, ‘ठिठुरते हुए’ और कुछ अन्य लघुकथाएँ दांपत्य जीवन में सामंजस्यता के प्रति गम्भीरता पर प्रकाश डालती दिखाई देती हैं।
‘फ्लैट नंबर इक्कीस’ लघुकथा संग्रह को लेखक ने देश के किसानों, जवानों और वैज्ञानिकों को समर्पित किया है। अक्सर देखा जाता है कि समाज में एक हाशिए पर खड़े इन व्यक्ति को या तो कोई पूछता नहीं हैं और या फिर उनके काम के प्रति हम सब कोई आदर नहीं दिखाते। ‘शाबाश बेटा’ में इन्हीं किसानों, जवानों और वैज्ञानिकों को अपना मॉडल मानने की बात को पुरज़ोर अंदाज़ में उठाया गया है। ‘सौभाग्य’ लघुकथा में भी एक जवान की विधवा के लिए नकारात्मक बात कहने पर उठे विवाद का मानवतावादी दृष्टिकोण से समाधान किया गया है।
आधुनिक समाज की बात करें तो इस संग्रह में बहुत सी लघुकथाओं में इसका वर्णन है और वर्तमान समय की विचारधाराओं से भी यह अवगत कराती हैं। ‘निश्चित है’ लघुकथा में पेड़ों का महत्त्व दर्शाते हुए उन्हें संरक्षण प्रदान करने का बीड़ा उठाने का आह्वान किया गया है। हमें प्रकृति से हमेशा कुछ न कुछ मिलता ही है लेकिन हम उसके महत्त्व को लगातार नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। ‘बहुत-बहुत धन्यवाद’ भी एक ऐसी ही लघुकथा है। ‘इच्छा’ में घर की बहू का भी मान रखने को प्राथमिकता प्रदान करने की बात उठाई गई है। ‘पढ़ेगा कौन’ लघुकथा में चकाचौंध की दुनिया और पुस्तकों की दुनिया के बीच का अंतर दर्शाया गया है।
शीर्षक कहानी ‘फ्लैट नंबर इक्कीस’ का कथ्य तो सही है, लेकिन लघुकथा का अंतिम वाक्य अनावश्यक रूप से वहाँ मौजूद है।
लघुकथा संग्रह ‘फ्लैट नंबर इक्कीस’ में छियासी लघुकथाएँ हैं। यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि इन लघुकथाओं में संदेश प्रचुर मात्रा में हैं। कुछ लघुकथाएँ अनावश्यक रूप से विस्तारित की गई हैं जिससे बचा जा सकता था। बहुत सी लघुकथाओं में भाषा की ख़ूबसूरती पर तो ध्यान दिया गया है; लेकिन व्याकरण और वाक्य विन्यास की दृष्टि से पुस्तक की सामग्री अनेक स्थानों पर अखरती है। पुस्तक को अंतिम रूप देने से पहले कम से कम एक बार और प्रूफ रीडिंग की जानी थी।
पुस्तक का नाम: फ्लैट नंबर इक्कीस, विधा: लघुकथा, लेखक: राम मूरत ‘राही’, पृष्ठ: 112 मूल्य: 299.00 रुपये, प्रकाशक: स्वतंत्र प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली